भारत की ऊर्जा नीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उपलब्धियों के चमकदार आंकड़े और वितरण की जमीनी वास्तविकताएं साथ-साथ दिखाई देती हैं। पिछले एक दशक में देश ने बिजली उत्पादन, ग्रिड विस्तार और अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

मगर किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए असली प्रश्न केवल यह नहीं होता कि वह कितनी बिजली पैदा कर रहा है, बल्कि यह भी होता है कि उस बिजली का लाभ किसे और कितनी समानता के साथ मिल रहा है।

इसी बिंदु पर उत्पादन और वितरण, उपलब्धि एवं अधिकार और विकास तथा समानता के प्रश्न एक-दूसरे से टकराते हैं। ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में मिली सफलताओं को ऊर्जा न्याय में बदल पाना आज भारतीय ऊर्जा नीति की सबसे बड़ी परीक्षा है।

बिजली उत्पादन के मोर्चे पर उपलब्धियां निर्विवाद हैं। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण और विद्युत मंत्रालय के अनुसार, 31 जनवरी 2026 तक देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 5,20,511 मेगावाट तक पहुंच चुकी थी, जो वर्ष 2013-14 के लगभग 224 गीगावाट के स्तर की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। कुल स्थापित क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 52 फीसद से ऊपर पहुंच चुकी है और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता 273 गीगावाट के आस-पास है।

राष्ट्रीय ग्रिड अब रिकॉर्ड मांग संभालने में सक्षम

पिछले वित्तीय वर्ष के शुरुआती दस महीनों में 52,537 मेगावाट नई क्षमता जोड़ी गई, जिसमें अधिकांश योगदान अक्षय ऊर्जा का रहा। राष्ट्रीय ग्रिड अब 242 गीगावाट की रिकॉर्ड मांग को संभालने में सक्षम है। इन उपलब्धियों ने भारत को वैश्विक ऊर्जा संक्रमण के अग्रणी देशों में शामिल किया है, लेकिन क्या राष्ट्रीय ग्रिड की यह प्रचुरता हर नागरिक के लिए भी उतनी ही वास्तविक और विश्वसनीय है, जितनी वह सरकारी आंकड़ों में दिखाई देती है?

माना कि देश में सार्वभौमिक घरेलू विद्युतीकरण का लक्ष्य लगभग हासिल किया जा चुका है। मगर बिजली का मीटर लगा देना और गुणवत्तापूर्ण आपूर्ति एक ही बात नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में औसतन 23 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 21 घंटे बिजली उपलब्ध होने के सरकारी दावों के बावजूद जमीनी वस्तुस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

देश के अनेक सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों, आदिवासी अंचलों और पहाड़ी इलाकों में आज भी मामूली तकनीकी खराबी के बाद बिजली आपूर्ति लंबे समय तक बाधित हो जाती है। शहरों में ट्रांसफार्मर खराब होने पर मरम्मत अपेक्षाकृत तेजी से होती है, जबकि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में यही प्रक्रिया अधिक समय लेती है। कृषि क्षेत्र में बिजली की अनिश्चित उपलब्धता किसानों की उत्पादकता को प्रभावित करती है। अनेक राज्यों में कृषि और घरेलू फीडरों के पृथक्करण का कार्य अभी भी अधूरा है।

क्या ऊर्जा वितरण की चुनौतियां समाप्त हो गई हैं?

ऊर्जा क्षेत्र की यह विषमता वितरण व्यवस्था में और स्पष्ट दिखाई देती है। महानगरों और बड़े औद्योगिक केंद्रों में बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता अपेक्षाकृत बेहतर है। निजी वितरण कंपनियों के प्रवेश के बाद कई शहरों में उपभोक्ता सेवाओं, शिकायत निवारण और बिलिंग व्यवस्था में सुधार हुआ है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ऊर्जा वितरण की चुनौतियां समाप्त हो गई हैं।

हाल के वर्षों में बड़े महानगरों ने लागत से अधिक बिल वसूलने, भीषण गर्मी और चरम मौसम की परिस्थितियों में ग्रिड विफलताओं का सामना किया है। इससे स्पष्ट है कि ऊर्जा अवसंरचना को केवल दक्षता के आधार पर नहीं, आपदा-सहिष्णुता के आधार पर भी परखा जाना चाहिए। इस स्थिति को समझने के लिए उन वितरण कंपनियों को भी देखना होगा, जिन पर बिजली को अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

वर्षों तक घाटे और बढ़ते कर्ज से जूझने के बाद कई सरकारी बिजली कंपनियां अब बेहतर वित्तीय प्रदर्शन कर रही हैं। तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान में कमी आई है। बकाया राशि के प्रबंधन में भी सुधार हुआ है। मगर किसी वितरण कंपनी की सफलता केवल उसके बही-खाते से नहीं आंकी जा सकती। उसकी वास्तविक कसौटी यह है कि वह आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक कितनी गुणवत्तापूर्ण बिजली पहुंचा पा रही है।

वित्तीय सुधारों के बावजूद कई राज्यों में सबसिडी भुगतान में देरी, जर्जर स्थानीय अवसंरचना, राजनीतिक हस्तक्षेप और कमजोर वसूली प्रणाली जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं।

सेवा की गुणवत्ता अब भी असंतोषजनक

नतीजा यह कि राष्ट्रीय औसत में सुधार के बावजूद अनेक क्षेत्रों में सेवा की गुणवत्ता अब भी असंतोषजनक है। दरअसल, सेवा गुणवत्ता में यही असमानता उस बड़े नीतिगत प्रश्न की ओर संकेत करती है कि आखिर ऊर्जा व्यवस्था का उद्देश्य केवल बिजली बेचना है या उसे एक सार्वजनिक अधिकार के रूप में उपलब्ध कराना भी है? यहीं ऊर्जा न्याय का संवेदनशील प्रश्न सामने आता है।

जब बिजली की मांग उपलब्धता के बराबर पहुंचने लगे या आपूर्ति पर दबाव बढ़े, तब प्राथमिकता किसे मिलनी चाहिए? बड़े उद्योगों को, जो आर्थिक विकास और रोजगार का आधार हैं या ग्रामीण अस्पतालों, स्कूलों, सिंचाई प्रणालियों और छोटे कस्बों को, जिनके लिए बिजली विकास ही नहीं बल्कि जीवन और आजीविका की बुनियादी आवश्यकता है?

व्यावहारिक स्तर पर राज्य और उसकी संस्थाएं प्राय: उन क्षेत्रों को प्राथमिकता देती हैं, जो आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक उत्पादन और राजस्व सृजन में अधिक योगदान करते हैं। इसके अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन केवल आर्थिक उत्पादकता के आधार पर ऊर्जा का वितरण सामाजिक न्याय की कसौटी पर हमेशा उचित नहीं ठहराया जा सकता।

शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, रोजगार और गरिमापूर्ण जीवन के लिए बिजली एक बुनियादी शर्त है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा न्याय को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक लक्ष्यों के रूप में देखना होगा। यदि ऊर्जा व्यवस्था का पूरा ढांचा केवल लाभ, राजस्व और बाजार दक्षता के मानकों से संचालित होगा, तो समाज के वे हिस्से अनिवार्य रूप से पीछे छूट जाएंगे, जिनके लिए बिजली विकास का नहीं, जीवन का प्रश्न है।

नई ऊर्जा व्यवस्था भी पुरानी असमानताओं को दोहरा सकती है

भारत की सौर ऊर्जा क्षमता दुनिया के सबसे बड़े अक्षय ऊर्जा कार्यक्रमों में शामिल है, लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हरित ऊर्जा का लाभ केवल बड़े निवेशकों और चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित न रह जाए। यदि इस ऊर्जा का लाभ दूरस्थ क्षेत्रों तक नहीं पहुंचा, तो नई ऊर्जा व्यवस्था भी पुरानी असमानताओं को दोहरा सकती है।

यह आशंका भी बनी रहेगी कि जीवाश्म ईंधन आधारित व्यवस्था की खामियों का स्थान हरित ऊर्जा की नई कमियों से न भर दिया जाए। भारत की ऊर्जा यात्रा सुरक्षा से शुरू हुई थी। अब उसकी अगली मंजिल ऊर्जा न्याय होनी चाहिए। ऊर्जा केवल अर्थव्यवस्था का र्इंधन नहीं, बल्कि समान अवसर, सामाजिक गरिमा और विकास की आधारशिला भी है।

(विजयशंकर चतुर्वेदी का लेख)