केरल में चुनाव आयोग के पत्र पर भाजपा की मुहर का मुद्दा गर्म ही था कि चुनाव आयोग अपने ‘एक्स’ के खाते से तृणमूल कांग्रेस को ‘दो टूक’ सुना जाता है। बंगाल में पक्ष-विपक्ष का राजनीतिक संघर्ष चाहे कितना भी विषाक्त हो, आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वह देश की जनता के प्रति निष्पक्ष दिखे। संविधान में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी जनता व जनतंत्र को लेकर तय की गई है। लेकिन पिछले लंबे समय से चुनाव आयोग हर मंच, हर संवाद व हर गतिविधि से सत्ताधारी दल के सहयोगी के रूप में नजर आने लगता है। पिछले चुनावों में देखा गया था कि चुनाव आयोग पर विपक्ष का कोई आरोप लगते ही सत्ताधारी दल के नेता चुनाव आयोग को पाक-साफ बताने के लिए प्रेस कांफ्रेंस करने आ जाते थे। बंगाल में मतदान की तारीखें तय हैं और 27 लाख लोग इस बार वोट देने से वंचित होंगे। भारी अनियमितताओं के बीच देश के नागरिकों को साबित करना पड़ रहा है कि वे योग्य मतदाता हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार उठ रहे सवालों पर अपने सवाल उठाता बेबाक बोल।
चुनाव आयोग की तृणमूल कांग्रेस को दो टूक
पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव:
भय रहित, हिंसा रहित, प्रलोभन रहित, छापा रहित, बूथ एवं सोर्स जामिंग रहित होकर ही रहेंगे।
‘एक्स’ पर यह पोस्ट चुनाव आयोग की है। चुनाव आयोग भारत की एक संवैधानिक संस्था है। इसका बुनियादी काम भारत में निष्पक्ष चुनाव करवाना है। इस पोस्ट की भाषा देखिए। क्या इसमें कहीं से भी निष्पक्षता दिख रही है? ऐसा लग रहा है कि बंगाल विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल ने सत्ताधारी दल को लक्षित करते हुए यह पोस्ट लिखी है। इस पोस्ट के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त की अपने दो अन्य सहयोगियों के साथ हंसती हुई तस्वीर भी है। जैसे बंगाल में सार्वजनिक जगहों पर भाजपा के नेता अपनी तस्वीर के साथ तृणमूल कांग्रेस को चुनौती देते हुए पोस्टर लगा रहे हैं, चुनाव आयोग की यह पोस्ट उन पोस्टरों से अलग नहीं दिख रही है। अभी कुछ दिनों पहले केरल में चुनाव आयोग का एक पत्र भाजपा की मुहर के साथ प्रसारित हुआ तो उसे चुनाव आयोग ने गलती बताया था। इस गलती के लिए चुनाव आयोग के एक अधिकारी को निलंबित भी किया गया था।
केरल में अगर चुनाव आयोग के पत्र पर भाजपा की मुहर गलती थी तो ‘एक्स’ पर चुनाव आयोग की इस पोस्ट को कैसे देखा जाए? सभी जानते हैं कि बंगाल में भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी है। बंगाल में भाजपा तृणमूल पर ऐसे ही आरोप, ऐसी ही भाषा में लगाती है जो चुनाव आयोग की पोस्ट में है। किसी को भी पहली नजर में गलतफहमी हो सकती है कि बंगाल भाजपा की किसी पोस्ट को चुनाव आयोग ने गलती से नकल कर अपने खाते पर चिपका दिया है। हालांकि यह ‘दो टूक’ शब्द तो चुनाव आयोग का दस्तखतशुदा तकिया कलाम हो चुका है।
वहीं, बंगाल के सत्तारूढ़ दल के नेता चुनाव आयोग पर कोई और ‘दो टूक’ बोलने का आरोप लगा रहे हैं। डेरेक ओ ब्रायन का आरोप है कि चुनाव संबंधी बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ने तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमंडल की बातें नहीं सुनीं और सात मिनट की बातचीत के बाद उन्हें कहा-‘गेट लास्ट’। वैसे यह ‘गेट लास्ट’ जैसा दो टूक चुनाव आयोग विभिन्न भावार्थों के साथ बार-बार कह रहा है। बिहार में भी पहले उसने आधार जैसे दस्तावेज को खारिज करते हुए वहां के मतदाताओं से कहा था कि दफा हो जाओ। बिहार में जब तक विपक्ष अदालत नहीं पहुंचा था, तब तक मतदाताओं के प्रति आयोग की भाषा दफा हो जाओ वाली ही थी। उत्तर प्रदेश और बंगाल से जब बूथ स्तरीय अफसरों की खुदकुशी की खबरें आने लगीं तो इस संवेदनशील मुद्दे पर चुनाव आयोग ने ‘दो टूक’ कहने की भी कोशिश नहीं की, सीधे अपने मुंह और कान बंद कर लिए।
बूथ स्तरीय अफसरों की पीड़ा जनसंचार माध्यमों में न जाने कितनी बार और कितनी तरह से दर्ज की गई। बूथ स्तरीय अफसरों के लिए सबसे बड़ी समस्या समय की कमी थी। लोकतंत्र के इतने बड़े अभियान को आनन-फानन में निपटाने की क्या मजबूरी हो सकती है? जबकि बाद में आपको तारीखें बढ़ानी ही पड़ी थीं। लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत में समय-सीमा के तनाव को लेकर बूथ स्तरीय अफसरों को जितनी परेशानियां हुईं उसका जिम्मेदार कौन होगा।
जनता की छोड़िए, विपक्ष के नेताओं की छोड़िए, आरोप है कि बंगाल के संदर्भ में तो आइएएस अधिकारी तक को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बागी तेवर अपनाने पड़ गए। मीडिया में आई रपटों के मुताबिक उत्तर प्रदेश सरकार में प्रमुख सचिव रैंक के अधिकारी अनुराग यादव बतौर चुनाव पर्यवेक्षक आयोग की बैठक में शामिल हुए थे। आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की भाषा पर आइएएस अधिकारी ने कहा-आप हमारे साथ ऐसा बर्ताव नहीं कर सकते। नतीजतन अनुराग यादव को पर्यवेक्षक के पद से हटा दिया गया।
बिहार में जब एसआइआर की प्रक्रिया शुरू की जा रही थी तब आरोप लगाए गए थे कि अभी तो यह झांकी है, बंगाल बाकी है। यानी बंगाल चुनाव में आयोग मतदाता सूची को लेकर और कठोर होगा। उस समय के लगे यह आरोप सही साबित हो रहे हैं, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद पश्चिम बंगाल में लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। ये हटाए गए मतदाता राज्य के कुल मतदाताओं के लगभग 12 फीसद हैं।
राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य के मतदाताओं पर इस तरह से अव्यावहारिक सख्ती कर चुनाव आयोग कौन सा ‘दो टूक’ संदेश देना चाहता है? कुछ वर्षों पहले तक चुनावों में बूथ लूट और हिंसा की चिंता होती थी। लेकिन अब हर तरफ विलोपित मतदाताओं की चिंता है। भारत में चुनाव हमेशा से लोकतंत्र का उत्सव रहा है। गरीब-अमीर-स्त्री-पुरुष-उम्रदराज-दिव्यांग सभी नीली स्याही के साथ एक नागरिक के रूप में समानुभूति का अहसास करते हैं। मतदान के दिन देश में किसी भी तरह का भेदभाव मिटता सा दिखता है। कुछ समय के लिए ही सही, उम्मीद बंधती है कि इस देश के भाग्यविधाता हम भारत के नागरिक ही हैं।
बंगाल के 27 लाख लोग मतदान नहीं कर पाएंगे
लोकतंत्र के उत्सव की तारीख तय है, और बंगाल के 27 लाख लोग इसमें भागीदारी नहीं कर पाएंगे। इसकी वजह यह है कि नई मतदाता सूची बनाने की प्रक्रिया समय से पूरी नहीं हो पाई और लाखों लोगों की पात्रता अधर में लटकी है। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि देश का आम नागरिक कैसे विभिन्न तरह के भ्रष्टाचार से जूझते हुए देश का नागरिक बने रहने की जिम्मेदारी निभाता है। अभी तो हाल यह है कि अस्सी करोड़ जनसंख्या अपने जीवनयापन के लिए सरकार से मुफ्त राशन पर निर्भर है। पिछले दो दशकों में रोजी-रोटी की समस्या ने इतना विकराल रूप धारण किया है कि हर तरफ पलायन की स्थिति है।
चाहे देश के अंदर एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन हो, या बाहर के देशों में पलायन। चाहे कोविड महामारी का दौर हो या एलपीजी सिलेंडर की कमी, आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के रेलवे स्टेशनों पर उत्तर प्रदेश और बिहार लौटने वाले प्रवासियों की भीड़ देखिए। जिस देश की जनता की हालत यह है कि सिलेंडर की कमी से उसे अपने गांव लौटना पड़ रहा है, वहां संवैधानिक संस्था उसकी मुश्किलों को दरकिनार करते हुए उससे ‘दो टूक’ संवाद करेगी तो लोकतंत्र के प्रति आस्था कैसे बचेगी। कुपोषण से इकहरा हुआ शरीर, बदन पर मामूली कपड़े के बाद भी मतदाता के रूप में जब वह अपनी उंगली पर नीला निशान दिखाता है तो लोकतंत्र पोषित और पल्लवित होता है। बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम जनता से आप शून्य गलती वाले दस्तावेजों की दरकार रखते हैं।
संविधान उम्मीद करता है कि उसकी संवैधानिक संस्थाओं का देश के नागरिकों के साथ भरोसे का रिश्ता हो। आम आदमी को पूरा भरोसा हो कि इस संस्था के अधिकारी हमारे अभिभावक की तरह काम करेंगे। चुनाव आयोग पर लंबे समय से विपक्ष को लेकर सौतेला व्यवहार करने के आरोप लग रहे हैं। आयोग से अपील है, कृपया अपनी ‘दो टूक’ छोड़ कर जनता को पूरा समय देकर संवेदनशीलता से संवाद करे।
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UP SIR Final List 2026 PDF: उत्तर प्रदेश में मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) खत्म हो गई है और चुनाव आयोग ने अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है। अंतिम मतदाता सूची में उत्तर प्रदेश में कुल 13,39,84,792 (13 करोड़ 39 लाख 84 हजार 792) मतदाता हैं। प्रदेश के कुल मतदाताओं में 7 करोड़ 30 लाख 71 हजार 61 (54.54 फीसदी) पुरुष जबकि 6 करोड़ 9 लाख 9 हजार 525 (45.46 फीसदी) मतदाता महिला हैं। इसके अलावा 4206 थर्ड जेंडर मतदाता हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
