पारंपरिक समाज में बुजुर्ग पीढ़ी को परिवार की नींव माना जाता रहा है। विशेष रूप से भारतीय समाज में तो यह धारणा रही है कि जिस घर में बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद होता है, वहां हमेशा समृद्धि और खुशहाली का वास होता है। मगर पिछले कुछ वर्षों से कई मामलों में बुजुर्गों को जिस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, उसे देखकर तो ऐसा नहीं लगता कि आज भी लोग ऐसा सोचते या मानते हैं। बुजुर्ग माता-पिता को अकेला छोड़ देने या फिर उन्हें वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर कर देने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।
ऐसे में सवाल है कि क्या आज के समय में माता-पिता केवल बच्चों का पालन-पोषण और समाजीकरण करने तक ही सीमित रह गए हैं, क्योंकि जब वे वृद्ध हो जाते हैं तो बच्चे उन्हें बोझ समझ कर उपेक्षित करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि बच्चों को अपने अभिभावकों से केवल संपत्ति चाहिए होती है, उनका प्यार या आशीर्वाद नहीं। इस उम्र में वे उनके किसी काम नहीं आ सकते, इसलिए उन्हें हाशिये पर धकेल दिया जाता है।
बुजुर्गों के लिए काम करने वाली एक गैर-सरकारी संस्था की सर्वेक्षण रपट के अनुसार, देश में वृद्ध महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के मामलों से जुड़ी 49 फीसद घटनाओं में उनके बेटे ही शामिल होते हैं। इसके बाद दुर्व्यवहार करने वालों में पति और बहुएं आती हैं। बुजुर्गों की स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की अनदेखी और उन्हें समय पर एवं पोषक भोजन न देने समेत अन्य जरूरतों पर ध्यान न देना वास्तव में हमारे सामाजिक और मानवीय मूल्यों के गिरते स्तर को दर्शाता है। भारत में हर बीस में से एक बुजुर्ग को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। युवा पीढ़ी यह भूल जाती है कि वे भी बूढ़े होंगे और उनकी नई पीढ़ी भी उनके साथ इसी तरह का व्यवहार कर सकती है। इसलिए वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और उनकी उचित देखभाल की व्यवस्था करने की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
समाज में इस तरह की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए तेलंगाना सरकार ने हाल में बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त कानून का प्रावधान किया है। इसके तहत अगर कोई सरकारी या निजी कर्मचारी अपने माता-पिता की अनदेखी करता है, तो उनके मासिक वेतन में 10-15 फीसद या दस हजार रुपए की कटौती कर सीधे माता-पिता के खाते में भेज दी जाएगी। इसे सरकार का एक सराहनीय कदम कहा जा सकता है, जिसका मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों को वित्तीय सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन देना है। यह नियम सरकारी और निजी कर्मचारियों तथा जनप्रतिनिधियों, सभी पर समान रूप से लागू होगा। अगर कोई कर्मी अपने बुजुर्ग माता-पिता को भोजन, दवा या उचित देखभाल प्रदान नहीं करता है, तो इसके लिए जिला कलेक्टर के पास शिकायत दर्ज करनी होगी, जिसके बाद जांच कर उनके वेतन से कटौती की जाएगी।
देश भर में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, लगभग 51.67 फीसद बुजुर्गों को घर में और 38.33 फीसद को समाज में मौखिक रूप से दुर्व्यवहार झेलना पड़ता है। जबकि, 40 फीसद बुजुर्ग खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस नहीं करते। इन सभी आंकड़ों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है कि इन घटनाओं के लिए बहुत हद तक परिवारों की संस्कृति जिम्मेदार है। भारतीय समाज में माता-पिता अपनी सारी जमा पूंजी बच्चों के पालन-पोषण और उनका भविष्य संवारने में लगा देते हैं, इस उम्मीद के साथ कि बुढ़ापे में वे उनका सहारा बनेंगे। मगर कई मामलों में देखा जाता है कि जब बच्चे खुद कमाने लगते हैं, तो वे अपने माता-पिता को अकेला छोड़कर देश, राज्य या शहर से बाहर जाकर अपनी नई दुनिया बसा लेते हैं। ऐसा लगता है कि आज की पीढ़ी के लिए परिवार का मतलब पति-पत्नी और उनके बच्चों तक सीमित हो गया है। उन्हें अपने माता-पिता या भाई-बहनों से शायद कोई सरोकार नहीं होता, या फिर वे मासिक खर्चा भेजकर अपने कर्तव्य को पूरा हुआ मान लेते हैं। आज के डिजिटल युग में भावनाओं का महत्त्व लगभग समाप्त हो चुका है।
बच्चों को अपने माता-पिता से केवल धन और संपत्ति चाहिए होती है, उनकी देखभाल की जिम्मेदारी को वे बोझ मानते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि माता-पिता ने उनके लिए जो भी किया है, वह उनका फर्ज था। मगर बच्चों को यह समझना होगा कि बुढ़ापे में माता-पिता का सम्मान और उनकी देखभाल जिम्मेदारी है, एहसान नहीं। उन्हें रिश्तों और व्यापार में अंतर करना आना चाहिए, रिश्ते प्यार और सम्मान पर टिके होते हैं और व्यापार लाभ पर आधारित होता है। जबसे मनुष्य ने रिश्तों को पैसों में तौलना शुरू कर दिया, तब से संबंधों की डोर कमजोर होती जा रही है। लोग एक-दूसरे से दूरी बनाने लगे हैं, केवल उन्हीं से संपर्क बनाए रखने की जरूरत महसूस की जाती है, जो आर्थिक रूप से संपन्न हों और जिनसे स्वार्थ सिद्ध होता हो। यह विचित्र विडंबना है कि आज के युवा सोशल मीडिया पर ऐसे-ऐसे संदेश और तस्वीरें साझा करते हैं, जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि वे रिश्तों के महत्त्व को गहराई से समझते हैं, लेकिन वास्तव में उनके पास अपनी बुजुर्ग पीढ़ी के लिए समय ही नहीं होता और न ही वे उनकी देखभाल की चिंता करते हैं। यानी रिश्तों के प्रति सम्मान और भावनाएं अब सिर्फ डिजिटल दुनिया में दिखाने तक ही सीमित है। उम्र के अंतिम पड़ाव में जब मनुष्य का मन और शरीर दोनों शिथिल होने लगते हैं, ऐसे में उन्हें अपने बच्चों के सहारे की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, विशेष रूप से भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।
मगर आज के उपभोक्तावादी समाज में संबंध, भावनाएं, प्रतिबद्धता और त्याग जैसे भाव अब शायद अर्थहीन हो चुके हैं। इनके स्थान पर भौतिक वस्तुओं का दिखावा युवा पीढ़ी पर इतना हावी हो गया है कि परिवार के बुजुर्ग और उनकी समस्याओं की उन्हें कोई चिंता नहीं होती है। माता-पिता की संपत्ति तो सभी बच्चों को चाहिए, पर उन्हें अपने साथ रखने और उनकी जिम्मेदारी उठाने को वे अपनी आजादी में व्यवधान मानते हैं। ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि क्या परिवार और विवाह जैसी हमारी सामाजिक संस्थाएं आज इस स्थिति में पहुंच गई हैं कि उन्हें कानून के हस्तक्षेप के बिना संतुलित नहीं रखा जा सकता? एक और पक्ष पर भी ध्यान केंद्रित किए जाने की जरूरत है कि इस तरह के कानून से शायद बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा तो प्रदान की जा सकती है, जिससे उनकी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे भोजन, उपचार और रहने की उचित व्यवस्था तो सुनिश्चित हो जाएगी, मगर क्या उन्हें बच्चों से भावनात्मक संबल, प्यार और देखभाल की गारंटी भी मिलेगी? जीवन जीने के लिए रोटी, कपड़ा और आवास के साथ-साथ आत्म-सम्मान तथा अपनापन भी उतना ही जरूरी होता है। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर सरकार से लेकर समाज के हर वर्ग को मिलकर सोचने की जरूरत है।
