मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस बार देश में मानसून कमजोर रहेगा। इसका प्रमुख कारण अल-नीनो का प्रभाव बताया जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक, यह स्थिति वर्ष 1876-78 की उस घटना जैसी हो सकती है, जब दुनिया के कई हिस्सों में सूखे और अकाल की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो गई थी। अल-नीनो हर दो से सात साल के अंतराल में आता है और लगभग नौ से बारह महीने तक सक्रिय रहता है। इसके प्रभाव से दुनिया के एक हिस्से में भयंकर सूखा पड़ सकता है, तो दूसरे हिस्से में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।
अल-नीनो प्रशांत महासागर में होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक गर्म हो जाता है। इस बदलाव के कारण हवाओं का रुख और वायुमंडलीय दबाव का संतुलन गड़बड़ा जाता है, जिससे पूरी दुनिया में मौसम का चक्र प्रभावित होता है। अल-नीनो का सीधा असर भारतीय मानसून पर पड़ता है। जब यह सक्रिय होता है, तो भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होती है, जिससे सूखे जैसे हालात पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है।
अल-नीनो स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘छोटा बच्चा’। दक्षिण अमेरिकी देश पेरू और इक्वाडोर के मछुआरों ने सबसे पहले लगभग 400 साल पहले इस घटना को देखा था। पिछले माह विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि जून और अगस्त के बीच भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में अल-नीनो की स्थिति बनने की संभावना 80 फीसद है और इसके कम से कम नवंबर तक बने रहने की आशंका है। इससे पहले अमेरिकी नेशनल ओशियैनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने मई और जुलाई के बीच अल-नीनो के उभरने की संभावना 82 फीसद बताई थी और अनुमान लगाया था कि इसके 2026-27 की सर्दियों (उत्तरी गोलार्ध में) तक सक्रिय रहने की संभावना 96 फीसद है।
अल-नीनो का संबंध आमतौर पर दुनिया भर में बढ़ते तापमान, कई इलाकों में औसत से कम बारिश, कुछ इलाकों में बहुत ज्यादा बारिश और मौसम की चरम स्थितियों की संभावना से जोड़ा जाता है। हालांकि, अल-नीनो की कोई भी दो घटनाएं एक जैसी नहीं होतीं। इसका असर उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र के गर्म होने की प्रक्रिया के स्वरूप, वायुमंडल की स्थिति और प्राकृतिक जलवायु परिवर्तनशीलता पर निर्भर करता है।
इस वर्ष संभावित अल-नीनो और पिछली घटनाओं (खासकर 1876-78 वाली घटना) के बीच मुख्य अंतर वह माहौल है, जिसमें यह घटना होगी। मानवीय गतिविधियों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन ने समुद्र और वायुमंडल दोनों को गर्म कर दिया है। यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, धरती अब 1850-1900 की औद्योगिक क्रांति से पहले के समय की तुलना में लगभग 1.4 डिग्री अधिक गर्म है। इससे अल-नीनो के प्रभाव और भी बढ़ सकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया एग्रीकल्चर एंड नेचुरल रिसोर्सेज में इंस्टीट्यूट फॉर वाटर रिसोर्सेज के मौसम विज्ञानी डैनियल स्वैन ने पिछले हफ्ते कहा था कि गर्मी के आखिर तक बनने वाले अल-नीनो के बहुत मजबूत होने की संभावना अधिक है।
सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि अल-नीनो का प्रभाव पूर्वी अफ्रीका और एशिया के कुछ हिस्सों में बाढ़, बीमारी और सूखे का खतरा पैदा कर सकता है। इसका असर समाज के कमजोर तबके पर सबसे ज्यादा पड़ेगा। इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी के मुताबिक, केन्या, युगांडा, सोमालिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान उन देशों में शामिल हैं, जिन्हें अल-नीनो के प्रभाव से सबसे अधिक खतरा है। इनमें से कुछ देश पहले से ही चल रहे मानवीय संकटों से जूझ रहे हैं।
अल-नीनो का असर दुनिया भर में महसूस किया जाता है, जिससे अक्सर कुछ इलाकों में भारी बारिश, तो कुछ में कम बारिश होती है। पूर्वी अफ्रीका में इस घटना का मतलब आमतौर पर साल के बीच में सूखा पड़ना और उसके बाद अक्तूबर से दिसंबर तक बहुत ज्यादा बारिश होना है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल हिंद महासागर में गर्मी बढ़ने की प्रक्रिया से संबंधित एक हलचल की वजह से यह असर और तीव्र हो सकता है।
सोमालिया में इस साल भारी बारिश के कारण राजधानी मोगादिशु के कुछ हिस्सों में बार-बार बाढ़ आ चुकी है। अमेरिका की ओर से वित्तपोषित पूर्व चेतावनी संस्था एफईडब्ल्यूएस नेट (FEWS NET) ने अनुमान जताया है कि अगर इस साल के आखिर तक बाढ़ की स्थिति वैसी ही रही, जैसी 1997 या 2023 में बनी थी, तो बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो सकता है। उस दौरान लाखों लोग बेघर हो गए थे।
बांग्लादेश में जुलाई की शुरुआत से भूस्खलन और बाढ़ के कारण कई लोगों की मौत हो चुकी है और दस हजार से ज्यादा लोग बेघर हो गए हैं। पाकिस्तान भी सूखे और बाढ़ जैसी दोहरी स्थिति का सामना कर रहा है, वहां औसत से कम बारिश होने का अनुमान है। जबकि उत्तरी पहाड़ों में हिमनदों के पिघलने से अचानक बाढ़ आने का खतरा भी बना हुआ है। विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि अगर अल-नीनो पूरी तरह से विकसित होता है, तो चावल की पैदावार में पांच फीसद तक की कमी आ सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत अल-नीनो के प्रभाव से पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार है? सरकार का दावा है कि देश में ऐसी किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए हरसंभव उपाय किए जा रहे हैं। अल-नीनो के प्रभावों को कम करने के लिए सरकार ने देश के 240 से अधिक संवेदनशील जिलों के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं। कहने के लिए बढ़ती महंगाई को रोकने के वास्ते सरकार के पास 43 लाख टन दालों का बफर स्टॉक मौजूद है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि सब्जियों और अन्य खाद्य वस्तुओं की महंगाई बेकाबू हो चुकी है। देश में आपदा प्रबंधन की हालत खस्ता है। इसका ढांचा आज भी आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य तक ही सीमित रहता है, जबकि जोखिम न्यूनीकरण पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
व्यवस्था का हाल यह है कि जिला और स्थानीय निकायों के पास आपातकालीन योजनाओं को लागू करने के लिए पर्याप्त धन, तकनीकी क्षमता और स्वायत्तता का अभाव साफ नजर आता है। जल निकासी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक में कुछ घंटों की तेज बारिश से कई इलाके जलमग्न हो जाते हैं। ऐसे में अगर अल-नीनो के प्रभाव की वजह से भारी बारिश का दौर शुरू हो जाए, तो स्थिति किस तरह की होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अगर सूखे की स्थिति पैदा हो जाए, तो महंगाई आसमान छूने लगेगी। इन तमाम समस्याओं को तभी दुरुस्त किया जा सकता है, जब सरकार योजनाबद्ध तरीके से काम करे और प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त खामियों को दूर करने में गंभीरता दिखाए।
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पश्चिम एशिया में संघर्ष खत्म होने पर अभी अनिश्चितता के बादल छाए हुए हैं। इससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ रहा है। पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहराने लगा है। भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है। तेल की बढ़ती कीमतों ने जहां पहले ही चिंता बढ़ा रखी है, वहीं अब एक नई प्राकृतिक आपदा मुंह बाए खड़ी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
