यह विडंबना ही है कि भारतीय घुड़सवारी महासंघ (ईएफआइ) ने एक ऐसे व्यक्ति को अहम जिम्मेदारी सौंप कर टीम के साथ जार्डन भेज दिया, जो बलात्कार जैसे गंभीर अपराध का आरोपी है। गौरतलब है कि ‘इंटरनेशनल टेंट पेगिंग फेडरेशन’ (आइटीपीएफ) विश्वकप क्वालीफायर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए जो भारतीय दल जार्डन गया है, उसमें बलात्कार के आरोपी कर्नल (सेवानिवृत्त) तरसेम सिंह वरैच को प्रबंधक और कोच के रूप में भेजा गया है। स्वाभाविक ही इसे लेकर तीखा विवाद खड़ा हो गया है कि ऐसे अपराध के आरोपी को इस हैसियत कैसे भेजा गया।
सवाल है कि वहां भेजने के फैसले से पहले क्या ईएफआइ ने एक बार यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि इसका खिलाड़ियों पर क्या असर पड़ेगा और इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि किस स्तर पर प्रभावित होगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक प्रतियोगिता में भेजे जाने वाले दल में किसी व्यक्ति को शामिल करने से पहले क्या उसके बारे में कोई पड़ताल नहीं की जाती? अगर ईएफआइ को तरसेम सिंह वरैच पर लगे आरोपों और कानूनी मामले के बारे में जानकारी थी, तो उसे भारतीय दल के साथ भेजने का क्या आधार था?
मामले की गंभीरता को देखते हुए ही आइटीपीएफ ने ईएफआइ से तुरंत उचित कार्रवाई करने और साथ ही प्रतियोगियों की सुरक्षा तथा खेल की गरिमा कायम रखने के लिए की गई कार्रवाई की जानकारी देने को कहा। हैरानी की बात यह है कि अपराध की गंभीरता और तथ्यों के मद्देनजर ही जो आरोपी व्यक्ति जमानत पर बाहर है, उसे खेल अधिकारियों ने भारतीय दल का प्रतिनिधित्व करने के लिए देश से बाहर जाने की अनुमति भी दे दी।
जबकि इससे पहले भी तरसेम को झूठी पहचान बनाकर फायदा उठाने से संबंधित एक अन्य मामले में महासंघ ने 2022-24 तक के लिए निलंबित कर दिया था। क्या इस तरह के फैसले को खेल की गरिमा और देश की छवि को चोट पहुंचाने की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए? जहां किसी भी खेल में खिलाड़ियों से लेकर कोच या प्रबंधक आदि के दल में चुने जाने के लिए उसकी स्वच्छ छवि को एक शर्त के तौर पर देखा जाना चाहिए, वहां इस पहलू की अनदेखी करने को किस तरह देखा जाएगा!
