India Trade deficit 2026: भारत के विदेश व्यापार पर हाल ही में प्रकाशित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में व्यापार घाटा बढ़ने पर महत्त्वपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किए गए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की सितंबर 2026 की रिपोर्ट में भारत के बढ़ते व्यापार घाटे और उसके प्रभावों पर अहम विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।

सितंबर के पहले सप्ताह में रिजर्व बैंक की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) में भारत का चालू खाता घाटा (सीएडी) बढ़ कर 4.2 अरब डालर (जीडीपी का 0.5 फीसद) तक पहुंच गया है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि वस्तु व्यापार घाटे में 25 फीसद की उछाल दर्ज की गई है। वैश्विक संगठन ‘मैकिन्से ग्लोबल ट्रेड अपडेट’ सितंबर 2026 के अनुसार, मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल तथा कोयले की वैश्विक कीमतों में वृद्धि ने भारत के आयात बिल और व्यापार घाटे को रिकार्ड स्तर पर पहुंचा दिया है।

इसके अलावा, इलेक्ट्रानिक पुर्जों की बढ़ती मांग ने चीन से होने वाले आयात को और बढ़ा दिया है। गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2026-27 के तहत अप्रैल से अगस्त के दौरान भारत का वस्तु निर्यात करीब 15 फीसद बढ़ा है, लेकिन आयात में 19 फीसद से अधिक की तीव्र वृद्धि के कारण विदेश व्यापार घाटा ऊंचाई पर पहुंच गया है।

हाल ही में वाणिज्य मंत्रालय की ओर से जारी भारत के बढ़ते व्यापार घाटे के आंकड़े केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि रणनीति बदलने का अवसर है। व्यापार घाटे को कम करने के लिए आयात पर प्रतिबंध लगाने के बजाय आयात प्रतिस्थापन, निर्यात विविधीकरण और सेवा क्षेत्र के विस्तार की रणनीति के साथ हमें आगे बढ़ना होगा।

यदि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में हरित बदलाव लाता है, ढुलाई लागत घटाता है, उच्च-स्तरीय विनिर्माण को गति देता है और सेवा क्षेत्र को नए वैश्विक माडल पर ले जाता है, तो निश्चित रूप से व्यापार घाटा नियंत्रण में रह सकेगा। इस समय भारत का सबसे ज्यादा व्यापार घाटा चीन के साथ है। वर्ष 2026 की पहली छमाही जनवरी से जून के बीच चीन से भारत का आयात रिकार्ड स्तर पर पहुंचने से यह घाटा और चुनौतीपूर्ण हुआ है।

वर्ष 2026 की पहली छमाही में भारत और चीन के बीच कुल व्यापार घाटा 67.1 अरब डालर दर्ज किया गया है। दोनों देशों के बीच कुल कारोबार 91.72 अरब डालर रहा, जिसमें पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 23.6 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई। भारत ने चीन से 79.41 अरब डालर का सामान मंगवाया, जबकि चीन को केवल 12.31 अरब डालर का ही सामान बेचा गया।

चीन से लगातार बढ़ता आयात और उसकी तुलना में बहुत कम निर्यात ही इस व्यापार घाटे की मुख्य वजह है। भारत मुख्य रूप से चीन से बिजली उपकरण, मोबाइल के पुर्जे, कंप्यूटर उपकरण, सेमीकंडक्टर, बैटरी और औद्योगिक मशीनरी का आयात करता है। यदि हम भारत-रूस व्यापार पर नजर डालें, तो पाते हैं कि चालू वित्त वर्ष में अगस्त तक रूस से सबसे ज्यादा कच्चा तेल आया।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में रूस से भारत का आयात 52.59 फीसद बढ़ कर 23.61 अरब डालर तक पहुंच गया। आयात में इस वृद्धि का मुख्य कारण कच्चा तेल है, जिसकी खरीद में 55 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। तेल के अलावा भारत रूस से उर्वरक, पशु-वनस्पति चर्बी और कीमती पत्थरों का भी आयात करता है। ऐसे में व्यापार संतुलन पूरी तरह रूस के पक्ष में झुका हुआ है। पश्चिमी प्रतिबंधों और अमेरिका के राजनीतिक दबाव के बावजूद भारतीय तेलशोधक कंपनियों ने रूस से तेल की खरीद जारी रखी है।

यह भी अहम है कि भारत का व्यापार घाटा संयुक्त अरब अमीरात, इराक, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और हांगकांग जैसे देशों के साथ भी बना हुआ है। अमेरिका में भारतीय वस्तुओं पर शुल्क बढ़ाने के बाद भी भारत से अमेरिका को निर्यात, वहां से आयात की तुलना में अधिक है और व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है। निस्संदेह, देश के बढ़ते व्यापार घाटे को कम करने के लिए हमें रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा। हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा।

कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए हरित हाइड्रोजन के उपयोग को भी बढ़ाना होगा। बीस फीसद एथेनाल वाले पेट्रोल के लगातार विरोध के बीच ई10 पेट्रोल लाने पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। हमें नवीकरणीय ऊर्जा का भी विस्तार करना होगा। सौर और पवन ऊर्जा के घरेलू उत्पादन को बढ़ा कर औद्योगिक ऊर्जा मांग को ग्रिड-आधारित हरित ऊर्जा में स्थानांतरित किया जा सकता है।

इससे तेल और कोयला आयात बिल में अरबों डालर की बचत होगी। सार्वजनिक और निजी परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने से पेट्रोलियम उत्पादों की घरेलू खपत घटेगी, जिसका सीधा असर आयात बिल में कमी के रूप में दिखेगा। वैश्विक मांग में नरमी के बीच निर्यात बाजार का विविधीकरण बेहद जरूरी है। केवल कुछ पारंपरिक बाजारों पर अत्यधिक निर्भरता भारत के निर्यात क्षेत्र के लिए जोखिम पैदा कर रही है। ऐसे में गैर-पारंपरिक बाजारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, मध्य एशिया और आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र) देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना होगा। साथ ही, स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाना होगा। चूंकि व्यापार घाटे का मुख्य कारण वस्तुओं का अधिक आयात और कम निर्यात है, लिहाजा इसे संतुलित करने के लिए कई क्षेत्रों में ठोस कदम उठाना जरूरी है। उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना का द्वितीय चरण भी आवश्यक है। पीएलआइ (उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन) योजना ने कुछ क्षेत्रों में सफलता पाई है, लेकिन अब इसका विस्तार उच्च मूल्यवर्धन वाले उद्योगों में करने की आवश्यकता है।

व्यापार घाटा कम करने के लिए सेवा क्षेत्र को घाटे की भरपाई का मुख्य हथियार बनाना होगा। वैश्विक कंपनियों को भारत में ही अपने अनुसंधान और क्षमता केंद्र खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। इससे एआइ (कृत्रिम बुद्धिमत्ता), डेटा विश्लेषण और उच्च-स्तरीय परामर्श सेवाओं का निर्यात भारत से बढ़ेगा, जिससे वीजा प्रतिबंध बेअसर हो जाएंगे। बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ीकरण करना होगा। बजटीय पूंजीगत व्यय को तेजी से धरातल पर उतार कर अवसंरचना को मजबूत करने की जरूरत है। बेहतर बुनियादी ढांचे से घरेलू उद्योगों की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और निजी निवेश आकर्षित होगा।

इन प्रयासों के साथ-साथ विदेश व्यापार घाटे को काबू में करने के लिए इलेक्ट्रानिक पुर्जों, दवा सामग्री और दुर्लभ खनिज के स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने की जरूरत है। गैर-जरूरी आयात पर कड़े शुल्क और नियंत्रण लागू कर विदेशी सामानों पर निर्भरता कम की जानी चाहिए। निर्यात के लिए कुछ विशिष्ट राज्यों और उत्पादों पर निर्भर रहने के बजाय नए राज्यों की भागीदारी बढ़ानी होगी।

आटोमोबाइल, रक्षा सामग्री और इंजीनियरिंग सामानों के निर्यात पर विशेष ध्यान केंद्रित करना होगा। मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का देशहित में प्राथमिकता देते हुए प्रभावी उपयोग करना होगा। यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौता लागू करने के प्रयास करने होंगे। भारत के हितों को सुनिश्चित करने वाले नए व्यापार समझौते भी करने होंगे।

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