अक्सर लेखों, भाषणों और किताबों में एक बात पढ़ने को मिलती है कि हमें अपनी शर्तों पर जीवन जीना चाहिए। ये शर्तें क्या हैं, क्यों हैं, कैसी हैं, किसलिए हैं, कोई नहीं बताता। अगर इसे जीवन के तमाम पक्षों पर घटित किया जाए, तो पता चलता है कि ऐसी बातें सिर्फ मन मोदक की तरह ही हैं। जैसे कि जिस किताब को आप पढ़ रहे हैं, उसे किसी और ने लिखा है। किसी ने छापा है।
लेखक ने अपनी पसंद की किताब लिखी है, या हो सकता है प्रकाशक ने लिखवाई हो। किसी वाणिज्यिक वेबसाइट या किसी दुकान से खरीदी गई है। यह ठीक है कि इसे पाठक की रुचियों के हिसाब से ही तैयार किया गया हो, लेकिन जरूरी नहीं कि सभी को पसंद आए। यानी कि जब हम इसे पढ़ रहे हैं, तो रुचि, अरुचि तो हो सकती है, लेकिन शायद वे शर्तें इस पर लागू न हों, जो हमारी हों।
इसी तरह जब कोई कहीं भाषण देने गया है, तो उसे किसी और ने बुलाया होता है। मंच किसी संस्थान का है, माइक किसी और का। कुर्सियों और पानी का इंतजाम भी। भाषण देने वालों में जो लोग होंगे, वे भी वही नहीं बोलेंगे, जो हम चाहते हैं। बोलने का समय कितना है, इसे किसी और ने ही तय किया होता है। बोलने का विषय भी बताया गया है। ऐसे में जो बोलने वाला है, उस पर पहले से ही बहुत कुछ थोपा गया है।
अब कोई यह मान ले कि वह विषय से बाहर जाकर बोलेगा, जितने समय चाहे बोलेगा, मंच से नीचे आकर बोलेगा, तो क्या वाकई ऐसा हो पाएगा। अगर कोई लेखक एक लेख लिख रहा है, तो अखबार या पत्रिका को क्या चाहिए, यह पहले से ही पता होगा। लेख कितने शब्दों का होगा, यह जानकारी भी अवश्य होगी। हालांकि कई बार लोग निर्धारित शब्दों से काफी कम या फिर काफी ज्यादा बड़ा लेख भेज देते हैं।
इसके अलावा, लेख में क्या हो, इसके मुकाबले क्या नहीं होना चाहिए, यह भी पता होना चाहिए। मगर वह कब छपेगा, इसे कोई और ही तय करेगा। फिर जिस कागज पर छपेगा, वह कहीं और से आया होगा। छापने के लिए जो स्याही इस्तेमाल हुई होगी, वह भी किसी कंपनी की होगी। अखबार पाठक तक पहुंचने के लिए न जाने कितने लोगों के हाथों से गुजरा होगा। यानी कि वे शर्तें उसकी नहीं होंगी, जिसने एक लेख लिखा है।
इसी तरह किसान अपने खेत में क्या बोए, यह मौसम और बाजार की जरूरत के हिसाब से ही तय होगा। यह नहीं कि किसान की मर्जी क्या है, इस बात से फसल उगेगी। फिर खेत में पानी या तो बारिश से आएगा या ट्यूबवेल से। फसल की गुड़ाई, निराई, कटाई, बाजार तक पहुंचने में बहुत-सी मशीनों और मानवीय श्रम की जरूरत होगी।
इसी तरह किसी डाक्टर से जब इलाज कराने जाते हैं, तब वह बीमारी देखकर दवाएं देगा। ये दवाएं वे होंगी, जो हमारे लिए जरूरी हैं, न कि वे जिन्हें हम खाना चाहते हैं। हां, किसी दवा से एलर्जी है, तो वह अलग बात है। न ही ऐसा चल सकता है कि मनमाफिक दवा मिल सके।
दूर क्यों जाया जाए, अगर हम किसी सड़क पर चल रहे हैं तो दाएं, बाएं देखकर चलना पड़ता है। कौन-सी बस, मेट्रो, कैब, ट्रेन, जहाज अपने निर्धारित समय पर आएगा, अगर यह पता न हो, तो कहीं समय से नहीं पहुंच सकते। इनका आना-जाना हमारी अपनी जरूरत के अनुसार नहीं होता है। हमें इनके हिसाब से चलना पड़ता है। अगर हम कार चला रहे हैं, तो न केवल दाएं और बाएं, बल्कि पीछे भी देखना पड़ता है।
कार की रफ्तार भी सड़क की भीड़-भाड़ को देखते हुए ही तय होती है। कार की सर्विसिंग कहीं करानी पड़ती है, तो पेट्रोल कहीं और से लेना पड़ता है। टूट-फूट हो, तो मैकेनिक से ठीक कराना पड़ता है। गाड़ी चाहे जितनी पसंद हो, उसमें एक निशान भी न लगा हो, इंजन भी ठीक से काम करता हो, तब भी अगर डीजल से चलने वाली गाड़ी दस साल और पेट्रोल वाली पंद्रह साल पुरानी हो गई, तो उसे हटाना पड़ता है।
हालांकि अमेरिका या यूरोप मे पंद्रह साल का ऐसा कोई नियम नहीं है। वहां जब तक गाड़ी ठीक है, चलाई जा सकती है। सिर्फ प्रदूषण का ध्यान रखना पड़ता है। जरूरी होने पर उसे दुरुस्त करने वाला पुर्जा बदलवा लिया जाता है। मगर अपने यहां प्रदूषण हटाने और आटोमोबाइल उद्योग को लाभ दिलाने के लिए ऐसे नियम बना दिए जाते हैं, जिससे कि यह उद्योग चलता, चमकता रहे।
इस नियम से प्रदूषण भी कितना हटा है, सब जानते हैं। ऐसे वक्त में भी प्रदूषण का स्तर ऊंचा रहता है, जब प्रदूषण फैलाने वाले कारक अपने निचले स्तर पर रहते हैं। यानी कुल मिलाकर अगर यह जीवन है, तो प्रति पल हमें दूसरों के साथ मिलकर जीना पड़ता है। अपने मुताबिक सब कुछ नहीं चल सकता। दूसरों का ध्यान रख कर ही हम अपनी इच्छाओं को समर्थन मिलने की उम्मीद कर सकते हैं।
अपनी मर्जी से तो सब कुछ नहीं चल सकता, लेकिन हम दूसरों की मर्जी का खयाल रख कर अपनी मर्जी के कुछ अंशों के पूरा होने की गुंजाइश निकाल सकते हैं। अन्यथा जरूरी नहीं कि हमारी इच्छा या शर्त के मुताबिक ही हमारे सामने कुछ हो। कहने का अर्थ यह कि दुनिया किसी चाहने वाले की शर्त से नहीं चलती। सब परस्पर निर्भरता से जीते हैं। जिसे पूरी या मुकम्मल आजादी कहते हैं और अपनी शर्तों पर जीवन जीने का तड़का, वह कहीं नहीं होती। यह सिर्फ एक मिथ है।
