आभासी दुनिया न तो प्राकृतिक है, न ही वास्तविक है। मगर वास्तविक या प्राकृतिक दुनिया पर आभासी जगत का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। वास्तविक दुनिया में रहते हुए भी हम जीवन की मूल प्रकृति या वास्तविकता से लगातार धीरे-धीरे ही सही, पर दूर होते जा रहे हैं और आभासी गतिविधियों को निरंतर जाने-अनजाने अपनाने ही नहीं, प्राण प्रण से मानने भी लगे हैं।

आभासी जगत ने हमारे देखने-सुनने और प्रतिक्रिया करने के तौर-तरीकों को बहुत ही गहरे तौर पर बदल दिया है। हममें से कई लोगों की समझ तो यह भी बनने लगी है कि आभासी दुनिया के बिना जीवन जीना अब संभव नहीं रहा है।

इसमें कोई शक नहीं है कि आधुनिक दुनिया आभासी जगत की दीवानी होती जा रही है। जिस तेजी से आभासी दुनिया ने हमारी आंखों और कानों को बैठे-बैठे अतिव्यस्त से लेकर इतना अस्त-व्यस्त कर दिया है कि हम हर दिन वास्तविक जीवन की निरंतर चलने वाली प्राकृतिक गतिविधियों और आपाधापी से हर क्षण दूर होते जा रहे हैं।

वास्तविकता से परे जीवन को ले जाने में वैसे देखा जाए, तो प्रकृति को कोई दिक्कत नहीं है और प्रकृति अपने अंश मनुष्य को आभासी दुनिया में धंसने या विलीन हो जाने से रोकती भी नहीं है। प्रकृति को मनुष्य के वास्तविक जीवन से छलांग लगा कर आभासी दुनिया में रच-बस जाने में कोई भी दिक्कत या परेशानी महसूस नहीं हो सकती। जो कुछ भी परेशानी या द्वंद्व उठ खड़ा होता है, वह प्राकृतिक मनुष्य के मन और जीवन में होता है।

आभासी दुनिया पूरी तरह से आभासी है। उसमें जीवन की रोजमर्रा की मशक्कत या सुख-दुख भी नहीं आते-जाते। आभासी दुनिया एकदम स्थितप्रज्ञ की तरह ही है। आभासी दुनिया जन्म और मृत्यु से परे तो है, ही साथ ही युद्ध और शांति से भी कोसों दूर है। आभासी दुनिया जड़ और अचेतन वस्तुओं पर कोई असर नहीं करती है, पर चेतन मन और जीवन के मूल स्वरूप को पूरी तरह से वास्तविक जीवन से परे धकेल देती है।

एक आभासी दुनिया, जो वास्तव में मौजूद ही नहीं है, उसका अत्यधिक आदी बनने में हम सतत सक्रिय हैं। प्राकृतिक जीवन से जुड़ी मूल चेतना को आभासी गतिशीलता में बदलकर वास्तविक चेतना या प्राकृतिक जीवन को आभासी जड़ता में बदल डालती है।

इसमें सबसे ज्यादा उल्लेखनीय बात यह है कि प्राकृतिक या वास्तविक दुनिया का मनुष्य अपने आप आभासी दुनिया में इतना अधिक आत्ममुग्ध हो जाता है कि उसके अंदर आभासी और वास्तविक का भेद करने की क्षमता ही लुप्त होने लगती है। पर यह सब कुछ होते हुए भी प्राकृतिक या वास्तविक दुनिया में मौजूद मनुष्येतर प्राणियों के मन-मस्तिष्क और जीवनक्रम में आभासी दुनिया का शायद अब तक कोई असर नहीं हुआ है, ऐसा अनुमान किया जा सकता है।

इस तरह एक बात तो यह तय है कि मनुष्य अपनी प्राकृतिक शक्तियों का मनमाने तरीके से यांत्रिक विस्तार करकेआभासी दुनिया में लिप्त रहकर और अपने जीवन की वास्तविकता को नजरअंदाज करने की राह चल पड़ा है। मनुष्य के अलावा बाकी सारे जीव अपने जीवन के प्राकृतिक रूप-स्वरूप में बने हुए हैं।

मनुष्य को अपने जीवन में जो ज्ञान या प्रत्यक्षीकरण का विस्तार प्राकृतिक रूप से मिला था, वह आभासी दुनिया के आदी मनुष्य के लिए अब एक छोटे-से परदे में सिमट गया है। ऐसी दुनिया में जीने वाले मनुष्य के लिए परदा ही जीवन है और जीवन ही परदा है। अंतहीन या शून्य अंतरिक्ष से लेकर महासागर की गहराई- सब कुछ छोटे से परदे में समा गई है।

आज आभासी दुनिया का समूचा सफर हाथ की दो-चार अंगुलियों की गतिविधियों में सीमित हो गया है। इसी से आभासी दुनिया ने समूचे मानव समाज को अब अपने चंगुल में समेट लिया है। वास्तविक दुनिया में घूमने, जानने, समझने, देखने, लिखने, बोलने और सुनने के लिए जो अलग-अलग तरह के इंतजाम और धन एवं साधनों की जरूरत होती थी, उसे अब कहीं भी बैठे-बैठे या चलते-फिरते भी मनुष्य स्क्रीन पर अपनी अंगुली के स्पर्श से ही सब कुछ करते रहने का साधन पा गया है।

दुनिया भर में कहीं भी कुछ भी करना, देखना, भेजना या मंगाना हो, तो यह अब केवल आभासी दुनिया के मनुष्य के मन की कल्पना नहीं रही, बल्कि आभासी जगत का साकार सत्य बन गया है। यही वह बिंदु है कि निरक्षर से लेकर प्रकांड विद्वान और अरबपति से लेकर कंगाल तक, किसी भी देश के राष्ट्रपति से लेकर आम जनता तक, सब कोई दुनिया भर के किसी भी कोने में रहते हुए अपनी अंगुलियों के स्पर्श और स्क्रीन के माध्यम से आभासी संसार को अपने जीवन में आसानी से उतार सकता है।

भले ही प्राकृतिक रूप से मनुष्य को कुछ भी हासिल नहीं हो पा रहा हो, पर आभासी दुनिया सब कुछ करते रहने का वास्तविक अनुभव देने के बजाय करते रहने का आभास तो भरपूर दे ही रही है। इस दुनिया में सत्य से साक्षात्कार भले ही नहीं हो पा रहा है, मगर स्वप्न के सत्य होने का आभासी अनुभव हम सबको बिना किसी भेदभाव और बिना रोक-टोक के तो हो ही रहा है। वर्तमान समय का यह परिदृश्य आज की आभासी दुनिया का वास्तविक सत्य बन गया है!