रिश्ते कभी वसंत की तरह खिलखिलाते हैं, कभी बरसात की तरह गीला-गीला होते हैं, कभी ग्रीष्म की तरह तपते हैं और कभी पतझड़ की तरह सूने-सूने लगते हैं। मगर बीते कुछ दशकों में इनका बदलना सिर्फ स्वाभाविक चक्र नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के गहरे बदलावों का आईना भी बन गया है। आज जब हम चारों ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि रिश्तों का रूप, उनकी परिभाषा और उनका निभाया जाना- सब कुछ बदल रहा है। यह स्थिति हमें कभी सुकून देती है, तो कभी बेचैनी से भर देती है।

कभी भारतीय समाज की सबसे बड़ी पहचान संयुक्त परिवार हुआ करती थी। एक ही छत के नीचे तीन-चार पीढ़ियां साथ रहती थीं। बच्चों का पालन-पोषण सिर्फ मां-बाप तक सीमित नहीं था, उसमें दादी-नानी का दुलार, बड़ों की डांट और छोटे-बड़े भाई-बहनों की शरारतें शामिल थीं। त्योहार धार्मिक अवसर मात्र नहीं होते थे, बल्कि वे पारिवारिक एकजुटता और रिश्तों की मजबूती का उत्सव होते थे। अब वही संयुक्त परिवार टूटकर छोटे-छोटे फ्लैटों में सिमट गए हैं। महानगरों की नौकरी और पढ़ाई ने हमें ऐसी जगह पहुंचा दिया है, जहां न तो आंगन है, न चौपाल। चार पीढ़ियों का साथ अब दुर्लभ हो गया है। रिश्तों की नजदीकी धीरे-धीरे दूरी में बदल गई है।

डिजिटल क्रांति ने इस दूरी को और भी गहराई दी है। दोस्त अब मोहल्ले की गली या गांव की चौपाल पर नहीं मिलते, वे सोशल मीडिया और आभासी खेलों की दुनिया में मिलते हैं। भाई-बहन एक ही घर में रहकर भी अपने-अपने डिजिटल कमरों में कैद हैं। किसी के कानों में हेडफोन है, किसी की आंखों पर मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है। माता-पिता के पास बच्चों से बात करने का समय नहीं और बच्चों के पास माता-पिता को सुनने का धैर्य नहीं। संवाद जो कभी रिश्तों की जान हुआ करता था, अब सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर ‘स्टेटस अपडेट’ की दुनिया में बिखर गया है। शिकायतें सीधे कहे जाने के बजाय इशारों और ‘इमोजी’ में बदल गई हैं।

डिजिटल दुनिया ने कुछ नए रास्ते खोले हैं

यह भी सच है कि डिजिटल दुनिया ने कुछ नए रास्ते खोले हैं। परदेस गया बेटा अब अपनी मां से रोज वीडियो काल के जरिए बात कर सकता है। बहन-भाई रक्षाबंधन पर आनलाइन तोहफे भेज सकते हैं। विदेश में बैठा छात्र अपने गांव की शादी का सीधा प्रसारण देख सकता है। यह सब तकनीक की देन है और रिश्तों को नई तरह की निकटता भी देती है। मगर सवाल यही है कि क्या यह निकटता असली अपनापन बन पाती है? दिल का ‘इमोजी’ क्या सचमुच धड़कते दिल की गर्माहट पहुंचा सकता है? एक वीडियो काल क्या मां की गोद का विकल्प हो सकता है?

नई पीढ़ी रिश्तों को बराबरी की नजर से देखती है। बेटियां अपने फैसले खुद ले रही हैं, बेटे घर के कामों में हाथ बंटा रहे हैं। विवाह और दोस्ती, दोनों में बराबरी का भाव बढ़ा है। जाति और धर्म के बंधनों को भी धीरे-धीरे चुनौती दी जा रही है। यह बदलाव सकारात्मक है, क्योंकि यह रिश्तों को न्यायपूर्ण और अधिक मानवीय बना रहा है। मगर साथ ही यह पीढ़ी धैर्य और प्रतीक्षा से भी दूर जा रही है। हर चीज उन्हें तुरंत चाहिए- खाना, प्यार और रिश्ते भी। यही कारण है कि अब टूटते रिश्ते किसी को ज्यादा विचलित नहीं करते। सोशल मीडिया पर ‘ब्लाक’ और ‘अनफ्रेंड’ रिश्तों को खत्म करने का सबसे आसान रास्ता बन गए हैं। जहां पहले रिश्ते निभाने के लिए समझौते और त्याग की जरूरत होती थी, वहां अब एक क्लिक से रिश्ता खत्म करना आम हो गया है।

उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी रिश्तों की आत्मा को गहराई से प्रभावित किया

उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी रिश्तों की आत्मा को गहराई से प्रभावित किया है। पहले रिश्ते अपनापन और जिम्मेदारी के आधार पर चलते थे। अब वे लाभ-हानि के तराजू में तौले जाने लगे हैं। दोस्ती तब तक है, जब तक काम आ रही है। विवाह तब तक है, जब तक सुख और सुविधा मिल रही है। पड़ोस तब तक है, जब तक उससे कोई फायदा जुड़ा हुआ है। यह मानसिकता रिश्तों को खोखला कर रही है। रिश्ते अब जिम्मेदारी कम और सौदेबाजी ज्यादा लगने लगे हैं।

त्योहारों की दुनिया में भी यही बदलाव दिखता है। पहले दीपावली पर घर-घर जाकर मिठाइयां बांटी जाती थीं, अब आनलाइन तोहफे का ‘वाउचर’ भेजना काफी समझा जाता है। होली पर गले मिलने की जगह ‘हैप्पी होली’ का संदेश भेज देना सामान्य हो गया है। ईद की सेवई और क्रिसमस का केक अब ‘वाट्सएप स्टिकर’ तक सिमट गया है। त्योहारों की आत्मा रिश्तों की गहराई थी, जो अब बाजार और तकनीक की चमक में कहीं खोती जा रही है।

तस्वीर पूरी तरह अंधेरी नहीं

फिर भी तस्वीर पूरी तरह अंधेरी नहीं है। बदलते रिश्तों के इस मौसम ने नई संभावनाएं भी खोली हैं। अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों की स्वीकृति बढ़ रही है। दूरदराज के रिश्तेदार मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए लगातार जुड़े रह सकते हैं। मगर मूल सवाल वही है कि क्या यह सब रिश्तों को जीवित रखने के लिए काफी है? क्या आभासी अपनापन वास्तविक संवेदना की जगह ले सकता है? सच तो यही है कि रिश्ते निभाने के लिए तकनीक से अधिक संवेदना चाहिए। उन्हें जीवित रखने के लिए समय चाहिए, धैर्य चाहिए और सबसे बढ़कर वह मानवीय स्पर्श चाहिए, जिसे कोई मशीन नहीं दे सकती।

रिश्तों का मौसम चाहे जैसे भी बदले, उनकी आत्मा वही पुरानी है- विश्वास, अपनापन और जिम्मेदारी। अगर आत्मा बची रही तो रिश्ते बदलते मौसमों में भी हरे-भरे रहेंगे। अगर यह आत्मा खो गई, तो रिश्ते सिर्फ नामों और नंबरों की सूची बनकर रह जाएंगे। आज हमें यही तय करना है कि हम किस मौसम में जीना चाहते हैं- वसंत की गुनगुनाती गरमाहट में या पतझड़ की सूनी उदासी में।

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हाल ही में तमिलनाडु के शिवगंगा जिले के कराईकुडी में अपनी जड़ों से जुड़े रहने की एक घटना चर्चा में आई। यहां एक ही परिवार की पीढ़ियों ने गांव-घर लौटने का मन बनाया। दुनिया के अलग-अलग हिस्से में जा बसे इन लोगों ने व्यस्तता और जीवन की आपाधापी को भूल कर एक-दूजे से मिलने का मार्ग निकाला और अपने पैतृक आवास पर पहुंच गए। बिखरते रिश्तों के इस दौर में यह प्रयास पीढ़ियों को जोड़ने की एक प्रेरणादायी घटना है। यहां पढ़ें पूरी खबर…