Duniya Mere Aage: तुलना मानव जीवन की सबसे सहज, लेकिन सबसे घातक प्रवृत्तियों में से एक है। संसार में जन्म लेने के साथ ही हम तुलना के समांतर जगत में भी प्रवेश कर जाते हैं। जीवन के लगभग हर पड़ाव पर हमारे हाथ में एक अदृश्य मापनी थमा दी जाती है- ‘तुलना की मापनी’। धीरे-धीरे हम स्वयं को अपने भीतर से नहीं, बल्कि दूसरों के संदर्भ में देखना सीख जाते हैं।

यही वह क्षण है, जब हमारा आत्ममूल्य अंतस की मापनी को छोड़कर बाहरी पैमानों का मोहताज होने लगता है। स्वस्थ तुलना बुरी नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब यही तुलना प्रेरणा की जगह हीनता, ईर्ष्या, असंतोष और आत्मग्लानि को जन्म देने लगती है। ऐसी दशा में तुलना व्यक्ति को ऊपर उठाने के बजाय भीतर से खोखला करने लगती है।

हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि प्रत्येक मनुष्य की यात्रा अलग है। दो व्यक्तियों के सामने दिखाई देने वाले परिणाम समान हो सकते हैं, लेकिन उनके पीछे की परिस्थितियां कभी समान नहीं होतीं। सत्य यह है कि हम केवल किसी के जीवन के दृश्य भाग से ही परिचित हो पाते हैं, उसका अदृश्य संघर्ष हम नहीं देख सकते। इसलिए दूसरों की उपलब्धियों को अपनी असफलताओं की मापनी बना लेना एक बड़ी और हानिकारक मानसिक भूल है।

किसी के जीवन की द्युतिमान तस्वीर के पीछे छिपी बेचैनी, संघर्ष, ऋण, असफलताएं, पारिवारिक तनाव या अकेलापन दिखाई नहीं देता। परिणाम यह होता है कि हम अपने वास्तविक जीवन की तुलना दूसरों के जीवन के उस पहलू से करने लगते हैं, जो हमें दिख रहा होता है। यह तुलना स्वाभाविक रूप से हमें असंतोष की ओर ले जाती है।

अगर तुलना करनी ही है, तो सबसे सार्थक तुलना अपने कल के व्यक्तित्व से होनी चाहिए। आज मैं कल से कितना बेहतर हूं? मेरे विचारों में कितना परिष्कार हुआ? मेरे व्यवहार में कितनी विनम्रता आई? मैंने क्रोध पर कितना नियंत्रण पाया? मैंने अपने कर्तव्यों को कितनी ईमानदारी से निभाया? मैंने किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए क्या किया?

उपलब्धि की परिभाषा यह नहीं कि हम किसी दूसरे से आगे निकल गए, बल्कि यह है कि हमने स्वयं को कल से बेहतर बना लिया। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव दूसरे से भिन्न होता है। आम के बीज से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह गुलाब की तरह खिले। जीवन में हर व्यक्ति की समय-तालिका अलग होती है। कोई बीस वर्ष की उम्र में सफल हो जाता है, कोई चालीस में, कोई साठ में और कोई शायद कभी उस अर्थ में सफल नहीं होता, जिसे समाज सफलता कहता है।

क्या इसका अर्थ यह है कि उसका जीवन व्यर्थ हो गया? बिल्कुल नहीं। जीवन का मूल्य केवल उपलब्धियों से निर्धारित नहीं होता। तुलना का मूल कारण भीतर का असंतोष होता है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व को केवल बाहरी पहचान से जोड़ना बंद कर देता है, तब तुलना की पकड़ अपने आप ढीली पड़ने लगती है। फिर दूसरे की सफलता ईर्ष्या नहीं, बल्कि प्रेरणा का कारण बनती है। दूसरे की प्रशंसा अपने अपमान का प्रतीक महसूस नहीं होती।

संतोष का अर्थ है प्रयास करते हुए भी परिणाम के प्रति भीतर से टूट न जाना। व्यक्ति अपने लक्ष्य के लिए पूरी मेहनत करे, अपनी कमियों को दूर करे, ऊंचाइयों को प्राप्त करने का प्रयास करे, लेकिन किसी भी दशा में अपनी आत्मशांति को उपलब्धियों की शर्त न बनाए। जीवन को केवल उपलब्धियों की सूची बनाकर देखना ठीक उसी प्रकार है, जैसे किसी संगीत को केवल उसकी अवधि से मापना। किसी गीत की सुंदरता उसकी अवधि में नहीं, उसकी अनुभूति में होती है।

हमें समझना होगा कि सबसे कठिन प्रतियोगिता बाहर नहीं, भीतर है। क्रोध से धैर्य की ओर जाना, अहंकार से विनम्रता की ओर जाना, भय से विश्वास की ओर जाना, लोभ से संतोष की ओर जाना और स्वार्थ से सेवा की ओर जाना- यही वास्तविक विजय है। इस यात्रा में किसी दूसरे को हराने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यहां विजेता और पराजित दोनों एक ही व्यक्ति होता है और वह है स्वयं हम।

खुशहाली के लिए जीवन की मापनी बदलने की आवश्यकता है। यह मापनी होनी चाहिए- चरित्र की, आत्मशांति की और आत्मतोष की। जीवन की सबसे सुंदर स्थिति वह है, जब मनुष्य दूसरों को देखकर यह नहीं सोचता कि ‘मैं उनसे कितना पीछे हूं?’, बल्कि स्वयं से यह प्रश्न करता है- ‘मैं उनसे क्या सीख सकता हूं… क्या आज मैं कल से थोड़ा बेहतर मनुष्य बना?’ ये प्रश्न जीवन की दिशा बदल सकते हैं। तुलना की मापनी बाहर से भीतर की ओर मोड़नी होगी।

अपने जीवन का मूल्यांकन हमें स्वयं करना होगा। मापनी ऐसी होनी चाहिए, जिसमें मनुष्य किसी दूसरे से बड़ा नहीं, बल्कि अपने भीतर से बेहतर बनने का प्रयास करे। जहां सफलता का अर्थ किसी को पीछे छोड़ना नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के अंधकार को थोड़ा कम करना हो। जहां समृद्धि का अर्थ केवल संग्रह नहीं, बल्कि बांटने की क्षमता हो। जहां ऊंचाई का अर्थ पद नहीं, दृष्टि की ऊंचाई हो। और जहां जीवन का अंतिम प्रश्न यह न हो कि ‘मैं दूसरों से कितना आगे था?’, बल्कि यह हो कि ‘मैं अपने होने को कितना सार्थक कर पाया?’ जब तुलना समाप्त होती है, तो आत्मबोध शुरू होता है और जब आत्मबोध शुरू हो जाता है, तब मनुष्य समझ पाता है कि जीवन कोई प्रतियोगिता नहीं, एक यात्रा है।

कोई परीक्षा नहीं, एक अनुभव है। कोई मापनी नहीं, एक साधना है। इस साधना में सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि यात्रा पूरी होने पर हम स्वयं से कह सकें- ‘मैंने किसी और जैसा बनने की कोशिश नहीं की, मैंने पूरी निष्ठा से स्वयं बनने का प्रयास किया। मैंने सदैव बाहरी परिस्थितियों एवं दूसरों की उपलब्धियों से अपने अंतर्मन को विरत रखते हुए आत्मोन्नति एवं आत्मपरिष्कार की चेष्टा की।’ स्वयं से तुलना और फिर सार्थक प्रयास ही आत्मविकास का एकमात्र आधार है।

यह भी पढ़ें: जीवन का आनंद कहां छूट जाता है? चींटी से मिली जिंदगी की बड़ी सीख | दुनिया मेरे आगे

‘किनारे पर चुपचाप खड़े रहने से बेहतर है, अपने लिए एक नई दुनिया की राह ढूंढ़ते हुए, दस बार लहरों में डूबकर मर जाना।’ यह आधुनिक नर्सिंग आंदोलन की अगुआई करने वाली ‘लेडी विद द लैंप’ फ्लोरेंस नाइटिंगेल का विचार है। इसे यों समझा जा सकता है कि जीवन में आगे बढ़ना चाहते हो, तो बहरे बन जाओ, क्योंकि आसपास के ज्यादातर लोगों की बातें और सुझाव मनोबल गिराने वाले होते हैं। इसलिए हमेशा अपने अंदर की आवाज को सुनो। पढ़िए पूरी खबर…