पिछली बार हमने कब किसी बेरहम घड़ी के साथ दौड़ लगाई थी? घड़ी देखते हुए शायद कभी हमने नाश्ता या पसंदीदा चाय बीच में छोड़ दी हो, पसीना बहाया हो, टैक्सी के लिए पैसे खर्च किए हों या अपने परिवार के साथ समय बिताने का मौका गंवा दिया हो। हममें से कई लोग समय के गुलाम बन गए हैं।

हमारे दिन का एक बड़ा हिस्सा पहले से तय मिलने के समय या ‘अपाइंटमेंट’ और ‘डेडलाइन’, यानी अंतिम समय का पीछा करने में ही बीत जाता है। मगर यह वह कौन-सी चीज है, जिसे हम हराने की कोशिश कर रहे हैं? घड़ी को या समय को!

समय को धीमा करना या रोकना नामुमकिन

हम अक्सर समय को एक ऐसी चीज के रूप में सोचते हैं, जो लगातार चलती रहती है। कहीं टिक-टिक करती रहती है और जिसे धीमा करना या रोकना नामुमकिन है। मगर वैज्ञानिक नजरिया बताता है कि ऐसा ‘घड़ी का समय’ यानी ‘वाच टाइम’ अपने आप में कोई स्वतंत्र, भौतिक घटना नहीं है।

यह एक गणितीय औजार या हिसाब-किताब रखने का एक साधन मात्र है, जो हमारे आपसी तालमेल को बिठाने में तो मददगार है, लेकिन जिसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पैसे जैसी अन्य महत्त्वपूर्ण खोजों की तरह अब हम इसके बिना गुजारा नहीं कर सकते।

घड़ी से जुड़े इस भ्रम को तोड़ने से हमें इस बात पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी कि जीवन असल में कैसे आगे बढ़ता है, और इसे अपनी मर्जी के मुताबिक ढालने की कितनी शक्ति हमारे पास है। हालांकि समय के साथ नहीं चल पाने या समय निकल जाने को लेकर हम न जाने कितनी बार फिक्रमंद होते होंगे!

घड़ी की पहुंच से बाहर निकलना कितना मुमकिन?

हम शायद ही कभी किसी न किसी रूप में घड़ी की पहुंच से बाहर होते हैं। फिर भी समय पहले से कहीं ज्यादा दुर्लभ प्रतीत होता है। हम जितने ज्यादा कुशल और उत्पादक बनने की कोशिश करते हैं, जितनी बारीकी से समय को मापते हैं और अपने व्यस्त कार्यक्रम में जितनी ज्यादा चीजें ठूंसने की कोशिश करते हैं, उतना ही महसूस होता है कि हमारे पास समय कम होता जा रहा है। इसका हमारे जीवन की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है। हम समय के लगातार कम होते जाने के एक दुश्चक्र में फंसकर हर एक सेकंड का पीछा करने में ही उलझ कर रह सकते हैं।

हमारे पास समय को महसूस करने के लिए न तो कोई संवेदी अंग है और न ही इसे ट्रैक करने के लिए दिमाग का कोई खास हिस्सा है। समय का हमारा अनुभव बहुत अलग-अलग हो सकता है। अगर हम ऊब रहे हों या असहज महसूस कर रहे हों, तो मिनट भी घंटों जैसे लगते हैं। अगर हम उत्साहित हों या किसी काम में आकंठ डूबे आनंद महसूस कर रहे हों, तो घंटे तेजी से बीत जाते हैं। हमें आसानी से धोखा हो सकता है कि कितना समय बीत चुका है। ब्रह्मांड को मापने वाले कास्मोलाजिस्ट को भी समय की कोई बहती हुई नदी नहीं मिलती। हमारी सोच से परे घटनाओं का कोई भौतिक बहाव नहीं है। ‘होने’ या ‘बनने’ का कोई ऐसा पल नहीं है, जिसमें भविष्य फिसलकर अतीत में चला जाए। जैसा कि उपन्यासकार विलियम फाकनर ने लिखा था, ‘अतीत कभी मरता नहीं। वह कभी अतीत होता ही नहीं।’

खुद को ब्रह्मांडीय घड़ी से आजाद कर लें तो बचेगा ‘अनुभूत समय’

जब हम खुद को ब्रह्मांडीय घड़ी से आजाद कर लेते हैं, तो हमारे पास जो बचता है, वह होता है- ‘अनुभूत समय’, यानी बदलाव का हमारा अपना लचीला अनुभव। यह हमें इस बारे में सोचने का एक अलग नजरिया देता है कि हमारा जीवन कैसे आगे बढ़ता है। एक ऐसा नजरिया, जो शायद हमें घड़ी की उस लगातार टिक-टिक से आजाद करा सके। अनुभूत समय, घड़ी के समय से अलग होता है, क्योंकि इसे किसी ऐसी संख्यात्मक गिनती से परिभाषित नहीं किया जाता, जो हर चीज को सेकंड, मिलीसेकंड या माइक्रोसेकंड जैसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देती है।

हर पल बुनी हुई चादर जैसा एक एहसास होता है, जिसमें अलग-अलग समय-सीमाओं में हुए बदलावों के धागे आपस में गुंथे होते हैं। इसके लिए संवेदनाओं और अनुभवों से भरा-पूरा जीवन चाहिए होता है। इसलिए ‘समय की कमी’ से निपटने की खातिर खुद को यह याद दिलाते रहना चाहिए कि घड़ी तो बस एक औजार है, हमारा मालिक नहीं। उन ‘डिजिटल अलर्ट’ और ‘अलार्म’ या चेतावनी से सावधान रहने की जरूरत है, जो पूरे दिन को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देते हैं। सुख और आनंद के पलों पर हमला कर उन्हें ऊब और दुख के पलों में बदल देते हैं। भले ही हम सभी को अपनी समय-सीमाओं का पालन करना पड़ता है, फिर भी जीवन के इस सफर के दौरान उन बदलते हुए रिश्तों और जुड़ावों के समृद्ध ताने-बाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

अनुभूत समय कोई ऐसी चीज नहीं, जिसके पीछे हम भागते रहें और जिसे कभी पकड़ ही न पाएं। बल्कि यह तो एक ऐसा प्रवाह है, जो हमें अपने साथ बहाकर ले जाता है और हम सभी को आपस में जोड़ता है। अनुभूत समय तो हमारे भीतर से ही उपजता है। हम इससे इतने अनजान होते हैं कि आमतौर पर इस पर ध्यान नहीं देते। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किन चीजों पर अपना ध्यान देते हैं और इस दुनिया के साथ किस तरह का तालमेल बिठाते हैं।

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