आधुनिक शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से एक संकीर्ण दृष्टिकोण से ग्रस्त रही है, जिसमें ज्ञान का मूल्यांकन केवल पाठ्यक्रम, परीक्षा परिणाम और अंकों की प्राप्ति तक सीमित कर दिया गया है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता आज भी मुख्य रूप से मेधा सूचियों, कटआफ अंकों और रैंकिंग के माध्यम से आंकी जाती है।

इस प्रवृत्ति ने शिक्षा को मानव निर्माण की प्रक्रिया के स्थान पर एक यांत्रिक उत्पादन प्रणाली में परिवर्तित कर दिया है। ऐसे परिवेश में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों की भूमिका पर गंभीर, तर्कसंगत और नीतिगत पुनर्विचार की आवश्यकता है।

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां किसी भी अर्थ में शिक्षा के ‘परिशिष्ट’ नहीं हैं। खेल, साहित्य, कला, वाद-विवाद, विज्ञान प्रदर्शनियां, सामाजिक सेवा, छात्र संगठन, सांस्कृतिक उत्सव और विद्यार्थियों द्वारा संचालित मंच, ये सभी शिक्षा के उस व्यापक उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, जो केवल बौद्धिक दक्षता नहीं, बल्कि व्यक्तित्व, चरित्र और नागरिक चेतना के निर्माण से जुड़ा है।

औपचारिक पाठ्यक्रम जहां ज्ञान का सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है, वहीं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां उस ज्ञान को सामाजिक, नैतिक और व्यावहारिक संदर्भ देती हैं। बाल्यावस्था में प्राप्त अनुभव व्यक्ति के आत्मविश्वास, जिज्ञासा, नेतृत्व-क्षमता और नैतिक दृष्टि की आधारशिला रखते हैं। खेलकूद विद्यार्थियों में अनुशासन, सहनशीलता और सामूहिकता की भावना विकसित करते हैं। साहित्यिक गतिविधियां भाषा-बोध, आलोचनात्मक चिंतन और वैचारिक परिपक्वता को सुदृढ़ करती हैं।

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां अत्यंत महत्त्वपूर्ण

कला और संगीत सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं रहते, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता के विकास में भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। एक ऐसा गुण, जिसकी आज के वैश्विक कार्यक्षेत्र में अत्यधिक मांग है। प्रशासनिक और संस्थागत दृष्टि से भी सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

छात्र परिषदें, स्कूल कैबिनेट और नेतृत्व कार्यक्रम विद्यार्थियों को शासन, प्रतिनिधित्व और उत्तरदायित्व की प्रारंभिक समझ प्रदान करते हैं। यही मंच उन्हें नियमों के पालन के साथ-साथ निर्णय-निर्माण की जटिलताओं से भी परिचित कराते हैं। लोकतंत्र का अभ्यास अगर कक्षा में नहीं, तो कम से कम विद्यालयी जीवन में आरंभ होना चाहिए।

बढ़ती प्रतिस्पर्धा, अंकों का दबाव और अपेक्षाओं का बोझ विद्यार्थियों को तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव की ओर धकेल रहे हैं। सामूहिक खेल, नाटक, संगीत और सामाजिक परियोजनाएं विद्यार्थियों को भावनात्मक अभिव्यक्ति और आत्म-स्वीकृति का अवसर देती हैं। शिक्षा यदि मानसिक संतुलन प्रदान न कर सके, तो उसकी बौद्धिक उपलब्धियां भी अर्थहीन हो जाती हैं।

पारंपरिक ढांचे में संचालित शिक्षा व्यवस्था और समाज की शिक्षा के बारे में धारणा ने ऐसी बहुत सारी प्रतिभाओं को समय पर खिलने से बाधित कर दिया, जो किसी अन्य गतिविधि में सक्रिय रह कर या हिस्सा लेकर नए शिखर को छू सकती थीं। किताब पढ़ने को एकमात्र सबसे महत्त्वपूर्ण काम मानना ही शिक्षा को बच्चों के लिए बोझ बनाने की कोशिश है।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां, विशेषकर विद्यार्थियों द्वारा संचालित कालेज में होने वाले उत्सवों या मेलों के रूप में एक और अधिक परिपक्व स्वरूप ग्रहण करती हैं। सांस्कृतिक, तकनीकी और साहित्यिक महोत्सव जीवन की प्रशासनिक संरचनाओं के सूक्ष्म प्रतिरूप होते हैं। इन आयोजनों में विद्यार्थी बजट निर्धारण, प्रायोजन प्रबंधन, मीडिया समन्वय, समय-सीमा का पालन और आपदा-प्रबंधन जैसे जटिल कौशल अर्जित करते हैं। ऐसे कौशल, जिन्हें कोई औपचारिक पाठ्यक्रम पूरी तरह नहीं सिखा सकता।

सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां भविष्य की कार्यशक्ति को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाती हैं

दरअसल, सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां भविष्य की कार्यशक्ति को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाती हैं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल विशेषज्ञता नहीं, बल्कि बहु-कौशलता, यानी एक साथ कई काम को कुशलतापूर्वक करने की क्षमता रखने वाले व्यक्ति की मांग करती है। नवाचार, सहयोग, नेतृत्व और संप्रेषण, ये सभी गुण सह-पाठ्यक्रम सहभागिता से ही विकसित होते हैं।

यही कारण है कि विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय और कारपोरेट संस्थान अकादमिक प्रदर्शन के साथ-साथ छात्र गतिविधियों को भी समान महत्त्व देते हैं। तकनीकी और नवाचार के क्षेत्र में भी सह-पाठ्यक्रम गतिविधियां निर्णायक भूमिका निभाती हैं।

रोबोट संचालित गतिविधियों वाले क्लब, नवउद्यमों के तहत बिक्री, आधुनिक तकनीकी के महोत्सव और नवाचार पर केंद्रित प्रयोगशालाएं विद्यार्थियों को प्रयोग, विफलता और फिर से प्रयास की संस्कृति से परिचित कराते हैं। यह संस्कृति भारत जैसे देश के लिए विशेष रूप से आवश्यक है, जहां नवाचार ही दीर्घकालिक विकास का आधार बन सकता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कालेज में होने वाले महोत्सव और विद्यार्थियों की गतिविधियां विविधता, समावेशन और सहिष्णुता को बढ़ावा देती हैं। विभिन्न भाषाओं, क्षेत्रों और अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आए विद्यार्थी जब साझा लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं, तो सामाजिक विभाजनों की दीवारें अपने आप ध्वस्त होती हैं।

अफसोस की बात है कि हमारे शिक्षा तंत्र में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को आज भी आमतौर पर औपचारिकता, समय-व्यय या अकादमिक बाधा के रूप में देखा जाता है। कई संस्थानों में इन्हें परीक्षा-परिणामों के अधीन रख दिया जाता है, जिससे इनकी गुणवत्ता और उद्देश्य, दोनों प्रभावित होते हैं। यह दृष्टिकोण अव्यावहारिक के साथ ही आधुनिक शिक्षा दर्शन के भी विपरीत है। सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों को पाठ्यक्रम का पूरक नहीं, बल्कि उसका अभिन्न और अनिवार्य अंग मानते हुए उन्हें समान संसाधन, समय और संस्थागत समर्थन प्रदान किया जाना चाहिए।

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अज्ञान मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा बंधन है। यह केवल ज्ञान के अभाव का नाम नहीं, बल्कि सत्य से दूरी, पूर्वाग्रहों की जकड़न और आत्मबोध के अभाव की स्थिति है। जब मनुष्य केवल परंपराओं, रूढ़ियों और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर सोचता है, तब वह अपने विवेक और चेतना का उपयोग नहीं कर पाता। अज्ञान उसे भय, संकीर्णता और भ्रम में बांध देता है। वह सत्य को देखने के बजाय सुविधा के अनुसार सोचता है और अपने हित को ही सर्वोच्च मान लेता है। ऐसी स्थिति में वह न तो स्वयं को समझ पाता है और न समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को। पूरा लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें