अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया में कड़ा रोष व्यक्त किया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आइईईपीए) के तहत दो अप्रैल, 2025 को लगाए गए ‘पारस्परिक’ शुल्क को रद्द कर दिया गया था। उन्होंने अमेरिका की शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों का अपमान किया (एक ऐसा कृत्य, जो अगर भारत में होता तो न्यायालय की अवमानना के दायरे में आ सकता था), लेकिन अमेरिका में प्रथम संशोधन का संकल्प लिया जाता है; और न्यायाधीश विचलित नहीं होते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप केवल यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने अन्य मौजूदा कानूनों का उपयोग करते हुए इसी तरह के कम या ज्यादा शुल्क लागू करने में जरा भी देर नहीं की:

  • व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा- 122 (जिसका ट्रंप ने हवाला दिया);
  • व्यापार विस्तार अधिनियम, 1962 की धारा- 232;
  • व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा- 301 (जिसका हवाला देते हुए ट्रंप ने कई देशों के निर्यात की जांच शुरू करने की धमकी दी);
  • स्मूट-हाले शुल्क अधिनियम, 1930 की धारा- 338।
  • भारत के संदर्भ में देखें तो इस अदालती फैसले के बाद लगभग सभी वस्तुओं पर शुल्क पंद्रह फीसद है (2 फरवरी, 2026 को घोषित अठारह फीसद शुल्क के बजाय।

मगर व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 के तहत स्टील, एल्युमीनियम, सेमीकंडक्टर और कुछ आटो-पुर्जों पर शुल्क पचास फीसद है। शुल्क अभी भी अधिक हैं, जो भारत के निर्यात को प्रभावित करेंगे। भारत सरकार ने कहा है कि वह अदालती फैसले के बाद की स्थिति का विश्लेषण कर रही है।

हालांकि, इस फैसले का तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि अंतरिम समझौते के मसविदा को अंतिम रूप देने और उस पर हस्ताक्षर करने के लिए बातचीत को स्थगित किया जा सकता है – हालांकि कोई अगली तारीख निर्दिष्ट नहीं की गई!

सभी असहाय हैं

इस बीच, अमेरिकी कांग्रेस से कई आवाजें उठी हैं। अमेरिका की शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप और आइईईपीए शुल्क को रद्द करने से पहले तक, कार्यपालिका द्वारा कराधान शक्तियों को हथियाने के मामले में कांग्रेस असहाय थी। अदालती फैसले के बाद भी कांग्रेस असहाय है, क्योंकि ट्रंप अनुमति लेने के लिए कांग्रेस में नहीं जाएंगे। उनका मानना है कि उन्हें पहले से ही कांग्रेस से अधिकार प्राप्त है।

इसके अलावा, ‘पारस्परिक’ शुल्क दरों को बनाए रखने के लिए वहां कानून में पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से अदालती फैसले के बाद लगाए गए शुल्क को मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन उन्हें विधायी समर्थन की आवश्यकता नहीं है।

अमेरिका के व्यापारिक साझेदार, जिन्होंने हाल ही में समझौते किए हैं (मुख्यत: पारस्परिक शुल्क से बचने के लिए), वे भी बेबस हैं। भारत, जिसने दो फरवरी को संयुक्त वक्तव्य पर हस्ताक्षर किए, वह भी असहाय है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर पहले ही अन्य देशों को यह संदेश दे चुके हैं कि ‘किसी ने भी उनसे मुलाकात करके यह सुझाव नहीं दिया है कि उनका देश समझौते से पीछे हटना चाहता है’।

वास्तव में ग्रीयर ने यह प्रमाणित किया कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देश ‘अच्छे’ हैं – और साथ ही यह संकेत दिया कि उन्हें ‘अच्छे’ ही बने रहना चाहिए। अपनी ओर से ट्रंप ने दो बार चेतावनी दी है कि समझौते का उल्लंघन करने वाले किसी भी देश को कठोर शुल्क का सामना करना पड़ेगा। यानी अच्छे देश अगर बुरे बन जाते हैं, तो उन्हें इसका परिणाम भुगतना पड़ेगा।

इस चेतावनी को बयानबाजी या खोखली धमकी समझकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि ट्रंप अपने इरादों और पूर्वाग्रहों के आधार पर कार्य करते हैं। वे शुल्क को केवल कर नहीं, बल्कि एक हथियार की तरह मानते हैं।

व्यापार में उथल-पुथल

मराकेश समझौते (जिसने जीएटीटी का स्थान लिया) और विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की बदौलत दुनिया के देश नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था का पालन करने के लिए बाध्य हुए। मतभेद और विवाद तो हुए, लेकिन विश्व व्यापार संगठन ने समाधान के लिए एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया। इस संगठन ने एक जनवरी, 1995 से वैश्विक व्यापार में अभूतपूर्व विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

मगर यह सब अब अव्यवस्थित हो गया है, जिसकी मुख्य वजह राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं। कठोर पारस्परिक शुल्क के खतरे की वजह से कई देशों ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते किए, बड़ी प्रतिबद्धताएं व्यक्त कीं और आंशिक रूप से शुल्क राहत हासिल कीं।

पारस्परिक शुल्क भले ही समाप्त हो गए हों, लेकिन अन्य कानूनों और आदेशों के माध्यम से वही शुल्क लागू कर दिए गए हैं। इसलिए अन्य देशों को मिली शुल्क राहत तो व्यर्थ हो गई है, मगर उनकी ओर से की गई बड़ी प्रतिबद्धताएं अभी भी बरकरार हैं।

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा ने जब कहा कि दुनिया के देशों को एकजुट होकर अमेरिका का सामना करना होगा, तो उनकी बात बिल्कुल सही थी। यह एक व्यावहारिक सलाह है, क्योंकि कोई भी देश (संभवत: चीन को छोड़कर) अकेले अमेरिका को चुनौती नहीं दे सकता।

यह एक असमान दुनिया है और इसकी सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था का नेता अनिश्चित एवं अप्रत्याशित है। भारत ने वास्तव में राष्ट्रपति ट्रंप की इच्छा के आगे समर्पण कर दिया है; जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों सहित कई अन्य देशों ने भी ऐसा ही किया है।

घरेलू स्थिति

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में अलोकप्रिय हैं। उनकी लोकप्रियता घटकर चालीस फीसद या उससे भी कम हो गई है। नौकरियां दुर्लभ हैं। वस्तुओं की कीमतें ‘वहन करने योग्य नहीं’ मानी जा रही हैं। महंगाई बढ़ रही है।

ट्रंप के आप्रवासन-विरोधी रुख का भले ही अमेरिका में कुछ हद तक समर्थन किया जा रहा है, लेकिन इससे आक्रोश भी पैदा हुआ है, क्योंकि यह रुख मानवाधिकारों, बच्चों के अधिकारों, राज्यों की स्वायत्तता और उचित कानूनी प्रक्रिया को बेरहमी से दरकिनार करता है। अवैध आप्रवासन का विरोध करने वाले कई अमेरिकी भी संघीय एजंसियों – विशेष रूप से आइसीई- की मनमानी से आहत हैं।

घरेलू घटनाक्रम ट्रंप को कमजोर कर सकते हैं और इस वर्ष नवंबर में उन्हें चुनावी झटका लग सकता है। रिपब्लिकन पार्टी संसद के एक या दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण खो सकती है। इससे ट्रंप प्रशासन दो साल शेष रहते हुए ‘कमजोर’ स्थिति में आ जाएगा।

संभव है कि ट्रंप और उनका प्रशासन फिर से नियम-आधारित व्यापार तथा वैश्विक संस्थाओं का सम्मान करने के रास्ते पर लौट आए। तब तक, भारत के पास कोई व्यावहारिक विकल्प न होने के कारण उतार-चढ़ाव भरे दौर के लिए तैयार रहें।