जानना न कौड़ी…जब देश महंगाई के संकट से जूझ रहा था, नीट, सीबीएसई, सीयूईटी जैसी परीक्षाओं में गड़बड़ियों के मद्देनजर पूरी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे थे, तभी दो कौड़ी जैसे शब्द ने सत्ता पक्ष को सवालों के शोर से मुक्ति दिला दी। दृश्यता और स्क्रीन समय के खेल पर टिकीं एंकर अंजना ओम कश्यप ने ऐसे ही समीकरण वाले शिक्षक ‘खान सर’ पर पलटवार किया। यूं कहा जाए कि मेरी स्क्रीन तो समय और तुम्हारी स्क्रीन दो कौड़ी…। बीसवीं सदी का सबसे चर्चित शब्द भूमंडलीकरण था। लेकिन स्क्रीन समय वाले एंकरों ने पत्रकारिता का स्वयंभूकरण कर दिया है। रात के नौ बजे लोगों को टीवी की स्क्रीन से पता चलता है कि कौन पाकिस्तानी है, कौन देशद्रोही और कौन देशप्रेमी। पूरे दिन सत्ता के खिलाफ जितने सवाल उठते हैं, रात में उन्हें साजिश करार दिया जाता है। एंकर सत्ता के ऐसे प्रहरी हैं, जो रात को नौ बजे सीटी बजा कर कहते हैं-सोते रहो…सब ठीक है। एंकर बनाम यूट्यूब शिक्षक के इस विमर्श में हिस्सेदारी करते हुए बेबाक बोल सिर्फ पत्रकारिता के पहलू पर पक्ष रख रहा है।
चिनाय सेठ, जिनके अपने घर शीशे के होते हैं वे दूसरों के घर पर कौड़ी नहीं मारते हैं…दो कौड़ी भी नहीं।
एक करोड़ी को दूसरा कौड़ी नजर आता है। हालांकि अपने-अपने शीशे के अंदर दोनों पक्ष की लड़ाई करोड़ी बनने की है। लड़ाई सिर्फ दृश्यता बटोरने की है। कौड़ी फेंकने के पीछे का मकसद भी सार्थक हो गया कि हर तरफ चर्चा में आप ही आ गए। आपका तंत्र अच्छे से जानता है कि आधे अच्छा बोलेंगे, आधे खराब बोलेंगे, जिसका कुल हासिल करोड़ों की दृश्यता होगी। आपने तो संत की वो कहानी भी नहीं पढ़ी, जो शिष्य को चीनी छोड़ने का उपदेश देने के पहले खुद मीठा खाना छोड़ता है।
अंजना ओम कश्यप से सवाल है कि जब आपने खबरों के अस्तित्व को स्क्रीन समय तक सीमित कर दिया है तो शिक्षा से जुड़े ‘खान सर’ ऐसा क्यों न करें? क्या एंकर भूल गए हैं कि सरकार ने आम बजट में रील बनाने को कितना महत्त्व दिया था। इस बजट का भरपूर सदुपयोग भी हो रहा है, आपको यह भी पता होगा। आरोप है कि सीबीएसई ने शिक्षकों से कहा था कि वे रील बना कर आम लोगों के सामने संस्था की छवि दुरुस्त करें।
अभी पहलगाम पर आतंकवादी हमले का जख्म देश के नागरिकों के बीच हरा ही है। इस आधुनिक समय में शायद इस धरती पर सबसे भयावह आवाज युद्ध के सायरन की है। हम आपको यूक्रेन, ईरान जाने की सलाह नहीं देंगे।
आप जरा अपने ही देश केसीमाई इलाकों में रहने वाले नागरिकों से पूछिए कि यह आवाज उनके लिए कितनी भयावह है। आपने इस सायरन की आवाज का बेजा इस्तेमाल दृश्यता बटोरने के लिए किया। इसके लिए हरियाणा के एक मुखर मंत्री को फटकार तक लगानी पड़ी, सरकार की तरफ से निर्देश भी दिए गए, लेकिन आपके लिए देश सबसे बाद में और आपकी दृश्यता सबसे पहले है। युद्ध से जुड़ी फर्जी खबर प्रसारित करना किसी अपराध से कम नहीं होता, लेकिन आपने इसका इस्तेमाल दृश्यता बढ़ाने के लिए किया।
एंकर चीन की सीमा से जुड़े अपने देश के इलाके में जाते हैं। वहां के जमीनी हालात क्या हैं, पड़ोसी देश कितना नुकसान पहुंचा चुका है, इन सब पर बात करने के बजाय उन्हें अश्वत्थामा के पैर दिखने लगते हैं। नोटबंदी से लेकर अभी तक, कतार में खड़े परेशान नागरिकों से एंकर का सवाल होता है कि पिज्जा लेने के लिए कतार में खड़े हो सकते हैं तो नोट बदलने के लिए कतार में लगने में क्या परेशानी है?
महंगाई को जायज ठहराने के लिएदो कुंतल कुतर्क रखने के बाद आपको परेशानी हो जाती है कि विदेशी पत्रकार ने सवाल कैसे पूछ लिया। जब किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से सवाल पूछने की आपकी बारी आती है तो आपका ‘ह्यूज, ह्यूज, ह्यूज…’ भारतीय पत्रकारिता को शर्मिंदगी का एक और सबब दे जाता है। टीवी पत्रकारिता के इतिहास में एंकरों के जनविरोधी इतने कारनामे दर्ज हैं कि आप जैसे एंकरों की पीढ़ी के लिए एक नए ‘जेन-जी’ की श्रेणी तय की गई है। आप सत्ता पक्ष के लिए इतनी जी-जी-जी करते हैं कि ‘जेन-जी’ से आपकी जी-जी वाली छवि का भ्रम होता है।
सत्ता के प्रवक्ता और पत्रकार दो ध्रुव हुआ करते थे। पर अब तो दोनों के बीच महीन-सी रेखा का भी फासला नहीं दिखता है। आपने तो सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं को ‘काकरोच’ बना देने की ठान ली है, यानी उन्हें बेरोजगार करने की पूरी कवायद हो रही है। टीवी पर हर बहस के बाद सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं को फटकार ही लगती है कि आप जैसे प्रवक्ताओं से अच्छा एंकर ही सरकार का बचाव करते हैं।
आपके पुराने ‘कौड़ीकर्म’ पर क्या बात करनी, वो तो इतिहास में दर्ज है। जब नीट परीक्षा को लेकर देश के विद्यार्थियों में त्राहिमाम की स्थिति थी तब आपको बकरीद पर हिंदू बनाम मुसलमान की बहस से फुर्सत नहीं थी। एक विद्यार्थी ने सवाल उठाया तो सरकारी एंकर ने उसे पाकिस्तानी कह दिया। लेकिन जब सीबीएसई की चौतरफा नाकामी सामने आई तब भी एंकर परेशान थे कि किस तरह से बहस की दिशा बदल कर सत्ता पक्ष को सुरक्षा प्रदान की जाए।
कोचिंग संस्थानों का पनपना सत्ता की बड़ी नाकामियों में से एक है
कोचिंग संस्थानों का पनपना सत्ता की बड़ी नाकामियों में से एक है। लेकिन आपने शिक्षा-व्यवस्था को लेकर सत्ता के शीर्ष से कभी सवाल किए ही नहीं। सीबीएसई की इतनी बड़ी नाकामी पर जिम्मेदार अधिकारियों का महज तबादला किया गया और आपने इस पर सवाल उठाने की जहमत नहीं की कि आखिर जिम्मेदारों को तबादले का इनाम क्यों दिया गया?
पिछले दिनों पूरे देश ने जो दृश्य देखा उसके बाद न्यूज चैनलों के एंकरों के एक बड़े वर्ग को अपने हाथ पर ‘दो कौड़ी’ का गोदना करवा लेना चाहिए। सार्थक सिद्धांत नाम का एक विद्यार्थी संसदीय समिति के सामने पेश हुआ, सीबीएसई की खामी बताने के लिए। एक विद्यार्थी ने अपने सामान्य ज्ञान और शोध से पूरी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया। पहले ऐसे खोजी काम पत्रकार किया करते थे। आज भी पुराने कई अहम मामलों में विभिन्न अदालतों में पत्रकारों की पेशी होती है, उनके बयान दर्ज होते हैं। क्योंकि उन्होंने सत्ता से सवाल पूछने के लिए तथ्यों पर काम किया था। पहले जो काम पत्रकार करते थे, अब वह काम एक विद्यार्थी को करना पड़ रहा है।
सत्रह साल के एक विद्यार्थी ने सीबीएसई के अंदर के कथित भ्रष्टाचार को उजागर किया। उसने बताया कि किस तरह से सीबीएसई की बदली व्यवस्था से एक खास कंपनी को फायदा पहुंचाया गया। सार्थक सिद्धांत ऐसा करने की वजह भी बताते हैं। एक साक्षात्कार में वे कहते हैं-मैं महसूस कर रहा था कि यह व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। इन चीजों पर पत्रकार खबर नहीं बना रहे हैं। जो भी उपलब्ध है वह पत्रकारों और इस मुद्दे की जांच करने वालों को मिलना चाहिए।
सीबीएसई पर सवाल उठाने वाले वेदांत को पाकिस्तानी कह दिया गया था। लेकिन वेदांत से आगे बढ़ कर सार्थक सिद्धांत ने जो हौसला दिखाया, वह आज हमें चकित कर रहा है। जरा सोचिए कि 17 साल के एक विद्यार्थी को व्यवस्था के खिलाफ क्यों आगे आना पड़ा? क्या यह उसका काम है? सार्थक सिद्धांत जैसे विद्यार्थी को ऐसा हौसला दिखाना पड़ा क्योंकि लंबे समय से एंकर चीख-चीख कर ऐसा माहौल बना रहे हैं कि सत्ता और उससे जुड़ी किसी भी संस्था पर सवाल उठाना देशद्रोह के बराबर है। नीट से लेकर सीबीएसई तक के मामले पर बहस को एंकर दो कौड़ी का साबित कर ही देते, अगर हमारे पास वेदांत और सार्थक सिद्धांत जैसे सजग और साहसी विद्यार्थी नहीं होते।
मौजूदा वक्त को परिभाषित करें तो भूमंडलीकरण शब्द अप्रासंगिक लगेगा। यह समय स्वयंभूकरण का है। पत्रकारिता जैसे सार्वजनिक उपक्रम को एंकर संस्कृति ने कुछ स्वयंभू चेहरों के स्वार्थ तक सीमित कर दिया है। पत्रकारिता के इस स्वार्थी स्वयंभूकरण के दौर में सबका मकसद एक ही है, दो कौड़ी के सवाल भी नहीं पूछ कर दृश्यता के स्तर पर करोड़ी होना। हर पीढ़ी के पास एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। उसे अपने समय से सवाल करना होता है, ताकि आगे आने वाली पीढ़ी यह न कहे कि वह समय अबोलों का था। अपने शोर में जब आप सवाल गुम कर रहे हैं तो एक पूरा समय गुमनाम हो रहा है।
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पटना पुलिस ने ‘खान ग्लोबल कोचिंग इंस्टीट्यूट’ के संचालक फैजल खान के खिलाफ शुक्रवार को हत्या की कोशिश और आर्म्स एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की है। फैजल खान सोशल मीडिया पर काफी पॉपुलर हैं और उन्हें ‘खान सर’ के नाम से जाना जाता है। पुलिस ने बृहस्पतिवार को ‘खान ग्लोबल कोचिंग इंस्टीट्यूट’ के दो सुरक्षा गार्ड्स को गोली चलाने के आरोप में हिरासत में ले लिया था। इन सुरक्षा गार्ड्स ने पुलिस को बताया कि फैजल खान ने ही 2 जून को उनके कोचिंग संस्थान के बाहर हुई हिंसा के दौरान उन्हें गोली चलाने का आदेश दिया था। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
