भौतिक रूप से मृत्यु किसी के अधिकारों के लिए एक समापन बिंदु होती है, लेकिन आज की डिजिटल दुनिया में पहचान के निशान बने रहते हैं। इंटरनेट तेजी से एक ‘डिजिटल कब्रिस्तान’ बनता जा रहा है। यहां निजी डेटा उन व्यक्तियों की स्थायी याद या उन्हें डिजिटल रूप से जिंदा रखने का काम करता है, जिनकी मृत्यु हो चुकी है। डिजिटल पहचान यानी सोशल मीडिया प्रोफाइल, ई-मेल, संदेश, तस्वीरें और अन्य निजी जानकारी का ऑनलाइन जमावड़ा लंबे समय तक रहता है और इन्हें कभी परिजनों की ओर से प्रबंधित, तो कभी ‘एल्गोरिदम’ द्वारा फिर से जीवित कर दिया जाता है।

‘डिजिटल पुनर्जीवन’ (एआई ग्रीफ बॉट्स) एक ऐसा कानूनी और नैतिक मुद्दा है, जिस पर काफी बहस होती रही है। इसमें कृत्रिम मेधा की मदद से मृतक के पुराने संदेश, आवाज की रिकॉर्डिंग और वीडियो का इस्तेमाल करके चैटबॉट बनाए जाते हैं या उनके ‘होलोग्राफिक’ अवतार तैयार किए जाते हैं। आमतौर पर मरने वाले व्यक्ति की पहले से सहमति (जैसे डिजिटल वसीयत में दी गई अनुमति) के बिना उनकी आवाज का प्रतिरूप या संवादात्मक अवतार बनाना उनके सम्मान और निजता के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।

मनुष्य की डिजिटल यादों से जुड़ा विषय बहुआयामी है, जो तकनीक, कानून, नैतिकता और संस्कृति की लिहाज से सवालों के घेरे में है। कानून की नजर में किसी मृत व्यक्ति की डिजिटल स्मृति (जैसे तस्वीर, चैट लॉग, क्लाउड स्टोरेज और ऑनलाइन खाता) को उसकी डिजिटल संपत्ति का हिस्सा माना जाता है। मरने के बाद इन तक पहुंच और इनके इस्तेमाल का तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित व्यक्ति ने जीवित रहते अपनी डिजिटल विरासत को लेकर क्या तय किया और उत्तराधिकार से जुड़े कानून समय के साथ कैसे बदलते हैं।

दुनिया भर की अदालतों के फैसले (जिनमें जर्मनी, फ्रांस, अमेरिका और भारत के अहम फैसले शामिल हैं) इसके संकेतक हैं कि डिजिटल डेटा कानूनी तौर पर निजी चिट्ठियों या डायरी जैसी भौतिक संपत्ति के बराबर हैं। हालांकि निजता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह व्यक्तिगत है और मृत्यु के बाद इस तरह से कायम नहीं रहता कि कानूनी वारिसों को मृतक की डिजिटल संपत्ति का प्रबंधन करने से रोका जा सके। हालांकि इस तक पहुंच या इसका इस्तेमाल डिजिटल मंच की प्रकृति एवं नियमों पर भी निर्भर करता है।

इस तरह के कानूनी सवाल का सामना काफी समय पहले जर्मनी की एक बड़ी अदालत कर चुकी है। वर्ष 2012 में बर्लिन में ट्रेन की चपेट में आने से पंद्रह साल की एक लड़की की मौत हो गई थी। उसके माता-पिता उसकी मौत की परिस्थितियों को समझने और घटना से जुड़े कानूनी दावों को लेकर उसके फेसबुक खाते की जानकारी हासिल करना चाहते थे। फेसबुक ने निजता का हवाला देते हुए जानकारी देने से इनकार कर दिया।

यह विवाद आखिरकार जर्मनी की फेडरल कोर्ट ऑफ जस्टिस तक पहुंचा, जिसने वर्ष 2018 में फैसला सुनाया कि मरने वाले खाताधारक का फेसबुक अनुबंध ‘यूनिवर्सल सक्सेशन’ (सभी अधिकारों और दायित्वों के उत्तराधिकार) के नियमों के तहत उसके वारिसों को मिल जाता है, ठीक वैसे ही जैसे डायरी या निजी चिट्ठियां मिलती हैं। कोर्ट ने माना कि वारिस कानूनी तौर पर कोई तीसरा पक्ष नहीं हैं, जिन्हें गोपनीयता सुरक्षा नियमों के तहत रोका जा सके। फेसबुक को निर्देश दिया गया कि वह माता-पिता को खाते की पूरी जानकारी दे।

बाद में एक और फैसले में यह साफ किया गया कि हालांकि वारिस खाते की जानकारी ले सकते हैं और उस पर डाली गई सामग्री को पढ़ सकते हैं, लेकिन वे उसे वैसे इस्तेमाल नहीं कर सकते, जिस तरह संबंधित व्यक्ति किया करता था।

‘डिजिटल आफ्टरलाइफ’ (मृत्यु के बाद डिजिटल मंच पर बने रहना) का विचार पिछले एक दशक में लोकप्रिय हुआ है, क्योंकि जब तक हटाया न जाए, व्यक्तिगत डेटा हमेशा के लिए ऑनलाइन रहता है। भौतिक चीजों के उलट, डिजिटल सामग्री अपने आप खत्म नहीं होती। एक सोशल मीडिया परिचय, बंद क्लाउड स्टोरेज या एक ई-मेल खाता संबंधित व्यक्ति की मौत के बाद भी लंबे समय तक सर्वर पर रह सकता है।

ऑक्सफोर्ड इंटरनेट इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2100 तक मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम) पर मृत उपयोगकर्ताओं के खातों की संख्या 4.9 बिलियन तक हो सकती हैं। वर्ष 2000 के दशक के मध्य से ही फेसबुक और दूसरे मंच उपभोक्ताओं के परिचय को हटाने के बजाय स्मृति के तौर पर रखने के अनुरोधों से जूझ रहे हैं। कई प्रौद्योगिकी कंपनियों ने ‘डिजिटल संपत्ति प्रबंधन’ के लिए आवश्यक नीतियां भी पेश की हैं। उपभोक्ताओं के पास यह विकल्प भी होता है कि अगर वे कोई डिजिटल पहचान नहीं छोड़ना चाहते हैं, तो मौत के बाद उनका खाता स्थायी रूप से बंद किया जा सकता है। हालांकि इन विकल्पों को लेकर लोगों में जागरूकता बहुत कम है। ऐसे में डिजिटल साक्षरता का होना भी बहुत जरूरी है।

एक वैश्विक सर्वेक्षण में 61 फीसद उपयोगकर्ताओं ने चिंता व्यक्त की है कि मृत लोगों की डिजिटल पहचान का दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि उनकी ऑनलाइन जानकारी की निगरानी करने वाला अक्सर कोई नहीं होता। जब कोई व्यक्ति सहमति देने के लिए दुनिया में मौजूद ही नहीं होगा, तो उसकी विरासत में किसी हेरफेर या दुरुपयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता।

मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि डिजिटल संपत्ति किसे मिलेगी, बल्कि यह भी है कि मृतक की निजी डिजिटल जिंदगी तक पहुंच कितनी होनी चाहिए। मानवीय गरिमा, मृतक की इच्छाओं का सम्मान और जीवित बचे लोगों की मनोवैज्ञानिक जरूरतें, ये सभी इस बात को तय करते हैं कि हम ऐसी तकनीक के इस्तेमाल को कैसे मार्गदर्शित कर सकते हैं। अगर हम अंतिम संस्कार की रस्मों के जरिए एक बेजान शरीर का सम्मान करते हैं, तो क्या किसी व्यक्ति के डिजिटल अवशेषों का सम्मान करने की जिम्मेदारी हमारी नहीं है? कम से कम मृतक के डिजिटल अवशेषों का इस्तेमाल सिर्फ व्यावसायिक लाभ के लिए तो नहीं ही किया जाना चाहिए।

आज के डिजिटल दौर में हमारी पहचान आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या पासपोर्ट तक ही सीमित नहीं है। मोबाइल नंबर, ई-मेल, सोशल मीडिया परिचय, बैंकिंग जानकारी और ऑनलाइन गतिविधियां भी हमारी डिजिटल पहचान का हिस्सा बन चुकी हैं। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन कई गंभीर सवाल और आशंकाएं भी सामने आई हैं।

सबसे बड़ा सवाल है कि हमारा व्यक्तिगत डेटा कितना सुरक्षित है? यदि किसी व्यक्ति की पहचान संबंधी जानकारी गलत हाथों में पहुंच जाए, तो इसका इस्तेमाल वित्तीय धोखाधड़ी, फर्जीवाड़े या पहचान की चोरी में हो सकता है। इसके अलावा यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि जिस डिजिटल मंच पर लोग अपनी निजी जानकारियां साझा करते हैं, वह कितना विश्वसनीय है। बहरहाल, नागरिकों को कानूनी रूप से यह भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि किसी भी ऑनलाइन मंच पर उनका निजी डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।