हमारे देश में आज भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता कम ही नजर आती है। बच्चों की उदासी को नखरे, चुप्पी को जिद और चिड़चिड़ेपन को स्वभाव मानकर टाल दिया जाता है। बच्चों के साथ संवादहीनता तो और भी कई तरह के जोखिम पैदा कर सकती है।

ऐसे में बच्चों का अकेलापन उन्हें डिजिटल मंचों पर परोसी जा रही विभिन्न सामग्री की ओर आकर्षित करने लगता है। धीरे-धीरे वे आभासी दुनिया में ऐसे खो जाते हैं कि काल्पनिक और वास्तविकता के बीच अंतर को भी भूल जाते हैं।

विशेषकर आजकल स्मार्टफोन में जिस तरह के आनलाइन खेल परोसे जा रहे हैं, उनसे बच्चों और किशोरों के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वे आभासी दुनिया को ही असलियत समझने लगते हैं और कई बार आत्मघाती कदम तक उठाने को तैयार हो जाते हैं।

पिछले कुछ समय में देश के अलग-अलग इलाकों से कई ऐसी खबरें आईं, जिनमें स्मार्टफोन में किसी वीडियो गेम के असर में बच्चों ने जान गंवा दी या फिर गेम खेलने से मना किए जाने पर आत्मघाती कदम उठा लिया। कुछ वीडियो गेम ऐसे होते हैं, जिनकी बच्चों को लत लग जाती है और उसमें दिए जाने वाले जोखिम भरे लक्ष्य उनके लिए घातक साबित होते हैं।

माता-पिता नियंत्रक नहीं, संवादक बनें

भारतीय समाज में अधिकतर माता-पिता यह मान लेते हैं कि अगर उनका बच्चा स्मार्टफोन के साथ घर के किसी कमरे में है, तो वह सुरक्षित है। मगर उन्हें शायद इस बात का आभास नहीं होता है कि स्मार्टफोन के जरिए पूरी दुनिया उस कमरे में घुस आती है। यहीं नहीं, पढ़ाई, करिअर और अनुशासन पर जोर देते-देते कई बार बच्चों के साथ भावनात्मक संवाद भी छूट जाता है और यही चूक आगे चलकर जोखिमपूर्ण साबित हो सकती है।

ऐसे में जरूरत इस बात की है कि माता-पिता नियंत्रक नहीं, संवादक बनें। बच्चे दिनभर की अपनी गतिविधियों में क्या कर रहे हैं, क्या देख-सुन रहे हैं, यह जानना जरूरी है। अगर बच्चा स्मार्टफोन पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने लगे, तो उसके पीछे कारण को समझना भी अति आवश्यक है।

आजकल आभासी दुनिया में ऐसे कई तरह के खेल परोसे जा रहे हैं, जो बच्चों और किशोरों को आत्मघाती कदम उठाने के लिए उकसाते हैं। शुरू में ये खेल बहुत रोचक होते हैं, जिस कारण बच्चा उनमें फंसता जाता है। ऐसे खेलों के प्रति बच्चों का झुकाव उनके भीतर पनप रहे अकेलेपन और उदासी की ओर इशारा करता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे संकेत लंबे समय से चल रहे मानसिक दबाव और भावनात्मक अलगाव का परिणाम होते हैं। अगर कोई बच्चा इस तरह के खेल में ज्यादा रुचि लेने लगे, तो धीरे-धीरे उसे आभासी दुनिया असल जिंदगी से ज्यादा ‘वास्तविक’ लगने लगती है।

इन संदर्भों ने एक बार फिर हमारे सामने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या हम अपने बच्चों की बदलती दुनिया को सचमुच समझ पा रहे हैं? क्या हम उनसे इतना संवाद स्थापित कर रहे हैं कि वे बेझिझक अपने मन की उलझन हमसे साझा कर सकें?

आभासी दुनिया के खेलों के जाल में उलझी पूरी पीढ़ी

आभासी दुनिया के खेलों के जाल में उलझे और लत का शिकार होकर गुम होते बच्चों की त्रासदी सिर्फ कुछ परिवारों से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि यह एक समूची पीढ़ी का संकट है, जो वास्तविक दुनिया से कटती जा रही है। जहां भावनाएं ‘स्क्रीन’ पर व्यक्त होती हैं, रिश्ते आभासी हो जाते हैं और पहचान ‘एल्गोरिद्म’ गढ़ते हैं। वह भी उम्र के बेहद नाजुक पड़ाव पर!

किशोरावस्था की बात की जाए, तो यह जीवन का वह दौर होता है, जहां भावनाएं तीव्र होती हैं, खुद की पहचान बन रही होती है और उस पहचान की स्वीकृति की भूख सबसे ज्यादा होती है।

इस उम्र में डांट, तिरस्कार या अचानक लगाया गया प्रतिबंध कई बार किशोरों द्वारा अनुशासन नहीं, बल्कि अस्वीकृति के रूप में ग्रहण किया जाता है। जब ऐसे समय में कोई किशोर खुद को घर, स्कूल या समाज में समझा हुआ महसूस नहीं करता, तो वह किसी ऐसे माध्यम की ओर आकर्षित होता है, जहां उसे लगे कि उसकी भावनाओं को यहां समझा जाएगा। भले ही वह माध्यम आनलाइन खेल, सोशल मीडिया मंच या कोई आभासी समुदाय ही क्यों न हो।

यह समझना बेहद जरूरी है कि आनलाइन खेल या डिजिटल सामग्री सीधे तौर पर आत्मघाती व्यवहार का कारण नहीं होते। उनकी ओर आकर्षित होना एक संकेत होता है; मन के भीतर चल रही बेचैनी का, जिसे बच्चा शब्दों में कह नहीं पाता।

जब आनलाइन खेल या आभासी दुनिया ही दोस्त, पहचान और भावनात्मक सहारा बन जाए, तब समस्या गहरी हो जाती है। वहां जीत-हार और आभासी सराहना असली जीवन की चुनौतियों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगने लगती है। ऐसी स्थिति में यदि बिना संवाद और समझ विकसित किए बगैर, बच्चों या किशोरों के स्मार्टफोन के इस्तेमाल पर अचानक रोक लगा दी जाए, तो वे खुद को पूरी तरह अकेला महसूस कर सकते हैं।

हालांकि, आज के तकनीकी दौर और इस उम्र में आभासी दुनिया की सामग्री से प्रभावित होना स्वाभाविक है, मगर समस्या तब पैदा होती है, जब यह आकर्षण वास्तविक जीवन से पलायन का माध्यम बन जाता है। कुछ किशोर खुद को उस काल्पनिक दुनिया में ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं, जहां भावनाएं सुंदर दिखती हैं, रिश्ते आदर्श लगते हैं और संघर्ष ‘टास्क’ दिखते हैं। धीरे-धीरे वास्तविक जीवन उन्हें कठोर, अस्वीकारात्मक और बोझिल लगने लगता है। यही प्रवृत्ति कई बार जोखिम में डाल देती है।

स्मार्ट फोन या लैपटाप के इस्तेमाल की समय सीमा निर्धारित की जाए

ऐसे में जरूरी है कि बच्चों के लिए स्मार्ट फोन या लैपटाप के इस्तेमाल की समय सीमा निर्धारित की जाए। मगर, उनके साथ भावनात्मक समय बिताना, डांटने से पहले सुनना और रोकने से पहले समझना भी उतना ही जरूरी है। स्कूलों की भूमिका भी केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं रह सकती। आज जरूरत है कि स्कूलों में डिजिटल साक्षरता पर भी ध्यान दिया जाए।

बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि डिजिटल मंचों पर मौजूद तमाम सामग्री हमेशा सच या वास्तविकता नहीं होती। उनमें फर्क करने का विवेक बच्चों के भीतर विकसित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। शिक्षकों को भी यह समझने की जरूरत है कि किसी बच्चे का अक्सर चुप रहना, अलग-थलग रहना या पढ़ाई से कट जाना आलस्य नहीं, बल्कि उसके भीतर चल रहे संघर्ष के संकेत हो सकते हैं।

आभासी दुनिया में बच्चों के लिए परोसी जा रही सामग्री में उम्र के अनुसार सुरक्षा, अभिभावकों की निगरानी और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चेतावनियां केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितनी ही प्राथमिकता देनी होगी।

डिजिटल युग में बच्चों की परवरिश संवाद से बेहतर हो सकती है

डिजिटल युग में बच्चों की परवरिश केवल नियमों से नहीं, बल्कि संवाद और आपसी समझ से ही बेहतर हो सकती है। स्मार्टफोन बंद कराया जा सकता है, लेकिन मन नहीं। खेल हटाया जा सकता है, लेकिन अकेलापन तब तक नहीं हटाया जा सकता, जब तक कि हम संवेदनशीलता को केंद्र में नहीं रखेंगे।

बच्चों की आनलाइन गतिविधियों पर सिर्फ निगरानी नहीं, बल्कि परस्पर संवाद और उनकी भावनाओं को समझना भी जरूरी है। जोखिम से भरे डिजिटल खेल की सामग्री को समझना और सलाह-मशविरा करना आवश्यक है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञों की सलाह को सामान्य प्रक्रिया की तरह अपनाया जाना चाहिए।

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