इसमें दोराय नहीं कि डिजिटल क्रांति ने मानव जीवन को एक नई दिशा दी है। इसने गति और संपर्क की सुविधा का विस्तार किया है, लेकिन इस चमकदार तकनीकी संसार के पीछे एक अदृश्य संकट भी आकार ले रहा है। कृत्रिम मेधा, ‘क्लाउड कंप्यूटिंग’ और डेटा विस्तार के साथ-साथ दुनिया भर में डेटा सेंटरों का जाल तेजी से फैल रहा है। भारत भी इस वैश्विक दौड़ का प्रमुख केंद्र बन रहा है। दुनिया की दिग्गज प्रौद्योगिकी कंपनियां भारत में ‘एआइ लैब’ और ‘डेटा सेंटर’ स्थापित करने के लिए अरबों डालर का निवेश कर रही हैं।
ऐसे में देश तेजी से वैश्विक डिजिटल अवसंरचना के प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है। विभिन्न घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा देश में डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए अरबों डालर के निवेश की संभावना जताई जा रही है। मगर यह निवेश भारत की तकनीकी महत्त्वाकांक्षाओं और डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए जितना आशाजनक दिखता है, उतना ही देश के जल और ऊर्जा संसाधनों के लिए गहरी चिंता का कारण भी बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस उद्योग के लिए पानी और बिजली की निर्बाध आपूर्ति की जरूरत होती है, जिससे भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
हाल ही में गूगल ने अपनी पर्यावरण रपट जारी की है, जिसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कृत्रिम मेधा यानी एआइ और डेटा सेंटर बिजली एवं पानी की मांग तेजी से बढ़ा रहे हैं। इसके अनुसार, गूगल डेटा सेंटरों ने 6.1 अरब गैलन पानी का उपयोग किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 फीसद अधिक था। गूगल के मुताबिक, वर्ष 2030 तक बिजली की मांग भी चौदह गुना तक बढ़ सकती है। डेटा सेंटर सुनने में भले ही महज डिजिटल ढांचा लगें, लेकिन वास्तव में यह एक ऐसा विशाल संयंत्र हैं, जिन्हें चलाने के लिए निरंतर बिजली और पानी की आवश्यकता होती है। हजारों सर्वर चौबीसों घंटे चलते हैं और भीषण गर्मी पैदा करते हैं। इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए ‘कूलिंग सिस्टम’ में स्वच्छ पानी जाता है। आज जब हम स्मार्टफोन पर वीडियो काल करते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते हैं या एआइ से कोई सवाल पूछते हैं, तब अनजाने में हम धरती के जल संसाधनों पर भी दबाव बढ़ा रहे होते हैं। दुनिया के कई हिस्सों से यह चेतावनी पहले ही सामने आ चुकी है कि डेटा सेंटर किस तरह स्थानीय जल संकट को जन्म दे रहे हैं।
वर्ष 2018 में अमेरिका के जार्जिया राज्य के न्यूटन काउंटी में एक सोशल मीडिया कंपनी की ओर से 7.5 करोड़ डालर की लागत से एक बड़ा डेटा सेंटर स्थापित करने की घोषणा ने स्थानीय लोगों में उम्मीदों की नई लहर जगा दी थी। रोजगार, आर्थिक विकास और क्षेत्रीय समृद्धि के सपने बुने गए। शुरुआती वर्षों में इन उम्मीदों को बल भी मिला, लेकिन यह खुशी ज्यादा समय तक टिक नहीं सकी। कुछ ही वर्षों बाद हालात पलट गए। एक रपट ने चौंकाने वाला सच उजागर किया कि इस डेटा सेंटर के कारण आसपास के कुएं सूखने लगे और घरों तक पानी की आपूर्ति बाधित हो गई। जांच में सामने आया कि एआइ आधारित यह सेंटर प्रतिदिन करीब पांच लाख गैलन पानी खपत कर रहा था, जो काउंटी के कुल दैनिक जल उपयोग का लगभग दस फीसद था।
परिणाम यह हुआ कि जहां पहले सौ फीट पर पानी मिल जाता था, वहां अब तीन सौ फीट खुदाई के बाद भी पानी नहीं मिल रहा। इस जल संकट ने स्थानीय लोगों में विस्थापन का भय पैदा कर दिया। एआइ और डेटा सेंटरों में पानी की जरूरत केवल उन्हें शीतल करने तक सीमित नहीं है। एआइ आधारित प्रोसेसिंग में कई गुना अधिक ‘कंप्यूटिंग पावर’ लगती है, जिससे बिजली की खपत भी बढ़ जाती है। बिजली उत्पादन चाहे कोयला आधारित हो, परमाणु हो या तापीय, लगभग हर तरीके में पानी की बड़ी भूमिका होती है।
इंटरनेशनल एनर्जी एजंसी के अनुसार, एआइ से किया गया एक सवाल सामान्य ‘आनलाइन सर्च’ के मुकाबले कई गुना अधिक ऊर्जा खपत करता है। यानी हर डिजिटल सुविधा के पीछे पानी और बिजली की दोहरी मांग छिपी है। कैलिफोर्निया और टेक्सास में हुए अनुसंधान में पाया गया कि चैटजीपीटी-तीन माडल से दस से पचास सवालों के उत्तर देने में लगभग आधा लीटर पानी लगता है। पानी की जरूरत इस पर भी निर्भर करती है कि उत्तर कितना लंबा है, कहां प्रोसेस हो रहा है और गणना में किन चीजों को शामिल किया गया है।
भारत पहले ही दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां भू-जल का अत्यधिक दोहन हो रहा है। कई सरकारी और अंतरराष्ट्रीय रपटों में चेतावनी दी गई है कि आने वाले वर्षों में देश के सैकड़ों जिले गंभीर जल संकट का सामना कर सकते हैं। ऐसे समय में यदि डेटा सेंटरों के लिए भू-जल का अनियंत्रित इस्तेमाल बढ़ता है, तो यह स्थिति और भयावह हो सकती है। विडंबना यह है कि ग्रेटर नोएडा, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बंगलुरु इत्यादि जिन क्षेत्रों में डेटा सेंटर स्थापित हो रहे हैं, वहां पहले से ही पानी की उपलब्धता दबाव में है। स्थानीय समुदायों में यह चिंता बढ़ रही है कि कहीं डिजिटल विकास उनकी बुनियादी जरूरतों को पीछे न धकेल दे।
एक समस्या यह भी है कि कई प्रमुख डेटा सेंटर अपनी पर्यावरण रपटों में पानी के उपयोग का पूरा और स्पष्ट ब्योरा सार्वजनिक नहीं करते। इससे नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में यह उद्योग जल संसाधनों पर कितना दबाव डाल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में अपेक्षाकृत नरम पर्यावरणीय नियम और स्वनियमन का माडल भी विदेशी कंपनियों को यहां निवेश के लिए आकर्षित करता है। सस्ती बिजली, श्रम और जमीन के साथ-साथ जल-पर्यावरणीय शर्तें भारत को डेटा सेंटरों के लिए ‘सस्ता ठिकाना’ बना रही हैं। डेटा सेंटरों का प्रभाव केवल जल और ऊर्जा के संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इनसे भारी मात्रा में कार्बन डाइआक्साइड गैस का उत्सर्जन भी होता है, इलेक्ट्रानिक कचरा पैदा होता है और स्थानीय तापमान पर भी असर पड़ता है।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सही दिशा में निवेश और नीति-निर्माण किया जाए, तो डेटा सेंटरों का जल प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है। भारत जिस ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना देख रहा है, वह तभी टिकाऊ होगा, जब उसमें पर्यावरणीय विवेक भी शामिल हो। डाटा सेंटरों के लिए सख्त और पारदर्शी नियम बनाए जाने की जरूरत है। केवल निवेश और तकनीकी क्षमता ही नहीं, जल और ऊर्जा की दीर्घकालिक उपलब्धता भी नीति का केंद्र बिंदु होनी चाहिए, अन्यथा खतरा यह है कि कहीं डिजिटल प्रगति की दौड़ में हम अनजाने में अपनी नदियों, तालाबों और भू-जल पर दबाव न बढ़ा दें। अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि भारत कितनी तेजी से डिजिटल विकास के पथ पर आगे बढ़ेगा, बल्कि यह भी है कि क्या वह इस प्रगति को पानी, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों के साथ संतुलित कर पाएगा। सच यही है कि डेटा जितना बढ़ेगा, धरती का पानी उतना ही घटेगा और इसी सच्चाई को समझना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
