आज डिजिटल दौर में सूचनाओं तक पहुंच बेहद आसान हो गई है। दुनिया भर की जानकारी पल भर में हमारी स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाती है। मगर इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। आज डेटा जितना समृद्ध हो रहा है, हमारी अपनी याददाश्त उतनी ही कमजोर होती जा रही है। ‘गूगल’ के असर की वजह से हम सूचनाओं को याद रखने के बजाय केवल यह याद रखने लगे हैं कि वे कहां उपलब्ध हैं। नतीजतन ‘डिजिटल डिमेंशिया’ यानी स्मृतिलोप जैसी प्रवृत्ति जन्म ले रही है, जिसमें डिजिटल उपकरणों पर अति-निर्भरता के कारण सूचनाओं को स्वयं याद रखने की आदत कमजोर होने लगी है। इसका अतिरेक याददाश्त, एकाग्रता और सीखने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

‘डिजिटल डिमेंशिया’ शब्द का पहली बार 2012 में प्रयोग जर्मन मनोचिकित्सक डॉ. मैनफ्रेड स्पिट्जर ने किया था। तब दुनिया को लगा कि यह महज एक वैज्ञानिक चेतावनी है, लेकिन आज यह हकीकत में बदलती दिखाई दे रही है। स्मृतिलोप को आमतौर पर बुढ़ापे की बीमारी माना जाता है, जिसमें मस्तिष्क की सोचने, याद रखने और निर्णय लेने की क्षमता उम्र के साथ घटने लगती है। विडंबना यह है कि आज के डिजिटल दौर में युवाओं और यहां तक कि बच्चों की भी मानसिक स्थिति बुजुर्गों जैसी होने लगी है।

दरअसल, हम स्मरण, चिंतन और निर्णय लेने जैसे मानसिक कार्यों के लिए ‘क्लिक’ और ‘सर्च’ पर निर्भर होते जा रहे हैं और सोचने का काम कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई को देने लगे हैं। वहीं दिमाग अब इंटरनेट को अपनी बाहरी स्मृति मानने लगा है। पहले याद रखने के अधिकांश कार्य मानवीय स्मृति और मानसिक क्षमता के बल पर ही संपन्न होते थे। आज इनके लिए बाहरी स्रोतों का सहारा लिया जा रहा है।

हाल में हुए शोधों में इस आदत के कारण स्मृति के निर्माण, भंडारण और किसी पुरानी बात को याद करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दिमाग के ‘हिप्पोकैम्पस’ के सिकुड़ने के संकेत मिले हैं। चिकित्सा विज्ञान का नियम है कि जिस अंग का उपयोग कम किया जाता है, वह समय से पहले कमजोर होने लगता है। मानव मस्तिष्क में ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ की क्षमता होती है, जिसके तहत दिमाग नए अनुभवों के आधार पर खुद को बदलता रहता है। जब हम लगातार स्क्रीन को आगे बढ़ाते रहते हैं और दिमाग पर याद रखने का कोई दबाव नहीं डालते, तो ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ सकारात्मक दिशा में काम करने लगती है। मस्तिष्क खुद को ‘कम मेहनत’ करने के लिए ढाल लेता है।

बचपन और किशोरावस्था में इसका प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दे रहा है, क्योंकि इसी अवधि में मस्तिष्क का विकास सर्वाधिक तीव्र होता है। रील, संक्षिप्त वीडियो और त्वरित सूचना-उपभोग की संस्कृति ने एकाग्रता या ध्यान को कुछ सेकंड तक सीमित कर दिया है, जिससे गहन अध्ययन और लंबे समय तक एकाग्र रहने की क्षमता कमजोर पड़ रही है। इसके साथ ही समस्या-समाधान, तार्किक विश्लेषण और स्वतंत्र चिंतन जैसी संज्ञानात्मक क्षमताओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। व्यावहारिक स्तर पर दूसरों की भावनाओं को समझने और उनसे जुड़ने की क्षमता घट रही है, जिस कारण चिड़चिड़ापन, सामाजिक अलगाव और अवसाद बढ़ रहे हैं।

मस्तिष्क के छवि-निर्माण के अध्ययनों से भी संकेत मिलता है कि अत्यधिक डिजिटल निर्भरता मस्तिष्क की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रही है। हाल में हुए शोधों में मस्तिष्क के ‘ग्रे मैटर’ में कमी देखी जा रही है, जो सीखने, स्मृति और भावनात्मक नियंत्रण जैसी महत्त्वपूर्ण संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं से जुड़ा होता है। एक शोध के मुताबिक, इंटरनेट की लत से ‘ग्रे मैटर’ का घनत्व घटता है। साथ ही, ‘व्हाइट मैटर’ की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है, जिससे मस्तिष्क के विभिन्न भागों के बीच सूचना के आदान-प्रदान, भाषा क्षमता और समन्वित कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

डिजिटल स्मृतिलोप के बढ़ते खतरे के बीच अब ‘माइंडफुल टेक यूज’ यानी तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग आज समय की आवश्यकता बन गया है। इसके लिए आवश्यक है कि डिजिटल तकनीकों का उपयोग आवश्यकता तक सीमित रखा जाए, न कि उसे हर मानसिक कार्य का विकल्प बना दिया जाए। छोटी-छोटी सूचनाएं याद रखने का अभ्यास मस्तिष्क को सक्रिय बनाए रखता है। साथ ही नियमित ‘डिजिटल डिटॉक्स’ यानी परिष्कार अपनाकर कुछ समय के लिए स्क्रीन से दूरी बनाना, पहेलियां हल करना, पुस्तकें पढ़ना, नई भाषाएं या कौशल सीखना जैसे संज्ञानात्मक अभ्यास मस्तिष्क की कार्यक्षमता को सुदृढ़ करते हैं। वास्तविक सामाजिक संबंध, मैदानी खेल, योग, संगीत और प्रकृति के साथ समय बिताना भी मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। विशेष रूप से अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों की स्क्रीन-अवधि पर संतुलित नियंत्रण रखें और उन्हें रचनात्मक तथा अनुभवात्मक गतिविधियों से जोड़ें।

गौरतलब है कि मानव सभ्यता का विकास स्मृति, जिज्ञासा और चिंतन की शक्ति पर आधारित रहा है। इन्हीं क्षमताओं ने मनुष्य को नवाचारकर्ता बनाया है। मगर आज तीव्र इंटरनेट और एआई संचालित युग में ‘डिजिटल डिमेंशिया’ जैसी उभरती चुनौतियां चिंतित कर रही हैं। इसके दुष्प्रभाव दिखाई देने लगे हैं। ऐसे में अगर यह प्रवृत्ति दशकों और पीढ़ियों तक जारी रहती है, तो इसके परिणाम कहीं अधिक भयावह होंगे। भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि तकनीक कितनी ‘स्मार्ट’ हुई, बल्कि इस पर कि हम अपनी मानवीय चेतना, विवेक और दिमागी क्षमता को कितना जीवंत बनाए रख पाए। ऐसे में आज ‘माइंडफुल टेक यूज’ यानी सजगता के साथ तकनीक का उपयोग समय की अनिवार्य आवश्यकता बन गई है।