भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की मूल चेतना मनुष्य जीवन को सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति मानती है। लगभग सभी धर्मग्रंथों में यही कहा गया है। इसलिए जीवन का प्रत्येक क्षण अमूल्य है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन में जीवन को केवल भोग का साधन नहीं, बल्कि लोकमंगल और आत्मोन्नति का अवसर माना गया है। मगर विडंबना यह है कि जिस देश में जीवन को ईश्वर का अनुपम उपहार माना जाता है, वहीं आत्महत्या की घटनाएं भयावह गति से बढ़ रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया’ रिपोर्ट के आंकड़े केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि वे समाज की टूटती मानसिकता, बढ़ते अकेलेपन और गहराते अवसाद की छिपी दर्दनाक दास्तान हैं। वर्ष 2023-24 में देश में आत्महत्या के मामलों की संख्या अब तक के उच्चतम स्तर पर रही। एक लाख बहत्तर हजार से अधिक लोगों ने स्वयं अपना जीवन समाप्त कर लिया। यह गंभीर स्थिति है।
चिंताजनक तथ्य यह है कि इन आत्महत्याओं में लगभग तीन-चौथाई संख्या पुरुषों की है। भारतीय समाज पुरुष को परिवार का संरक्षक और मुखिया मानता है, लेकिन यही वर्ग आज सबसे अधिक मानसिक दबाव, आर्थिक असुरक्षा और सामाजिक अपेक्षाओं एवं पारिवारिक तनावों के बोझ तले दबा हुआ है। कभी आत्महत्या के मामलों में महिलाओं की संख्या अधिक हुआ करती थी और तब महिला सुरक्षा तथा सशक्तीकरण को लेकर व्यापक विमर्श हुआ था।
आज परिस्थितियां बदल गई हैं। बेरोजगारी, आर्थिक संकट, पारिवारिक तनाव, बीमारी और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति पुरुषों को निराशा के उस अंधकार में धकेल रही है, जहां उन्हें जीवन से अधिक मृत्यु सरल विकल्प प्रतीत होने लगती है। इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।
दिहाड़ी मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा
आत्महत्या के आंकड़ों में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या सबसे ज्यादा होना देश की आर्थिक विषमता और रोजगार संकट की गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करता है। रोज कमाने और रोज खाने वाले मजदूर, ठेला और रेहड़ी चलाने वाले तथा असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी सबसे अधिक असुरक्षित हैं।
दूसरी ओर सरकारी और निजी क्षेत्रों में संविदा तथा अल्पकालिक नियुक्तियों का बढ़ता चलन भी लाखों युवाओं के भविष्य को अनिश्चित बना रहा है। नौकरी मिलने के बाद भी पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और स्थायित्व का अभाव व्यक्ति को निरंतर भय और असुरक्षा में जीने को विवश करता है। जब रोजगार छिनता है, तब केवल आय नहीं जाती, बल्कि आत्मविश्वास और जीवन का आधार भी टूट जाता है। ऐसे में व्यक्ति स्वयं को बेहद अकेला महसूस करता है।
बच्चों के पास अपनी समस्याएं साझा करने का पर्याप्त अवसर नहीं
भयावह स्थिति विद्यार्थियों के बीच दिखाई देती है। वर्ष 2023-24 में देशभर में 13 हजार से अधिक छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की है। यह संख्या पिछले वर्ष से 8.5 फीसद अधिक है। देश में प्रतिदिन लगभग 35 विद्यार्थी जीवन से हार मान रहे हैं। किसी भी विकासशील राष्ट्र के लिए इससे बड़ा दूसरा खतरा नहीं हो सकता है। देश का भविष्य आत्मग्लानि और बोझ समझ जीवन जी रहा है। यह केवल शिक्षा व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना के संकट का भी संकेत है।
आज बच्चे पहले की तुलना में कहीं अधिक अकेला महसूस करते हैं। संयुक्त परिवारों के विघटन ने दादा-दादी, चाचा-चाची और बुआ जैसे आत्मीय रिश्तों को उससे दूर कर दिया है। माता-पिता दोनों के कार्यरत होने के कारण बच्चों के पास अपनी समस्याएं साझा करने का पर्याप्त अवसर नहीं बचा।
दूसरी ओर शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण बच्चों को अंक प्राप्त करने की मशीन में बदल रहा है। अभिभावकों की प्राथमिकता ऐसे विद्यालय बन गए हैं जो उत्कृष्ट परिणामों का विज्ञापन करते हैं, जबकि खेल, रचनात्मकता, नैतिक शिक्षा और व्यक्तित्व विकास जैसे विषय पीछे छूट रहे हैं। स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब बचपन पर तकनीकी प्रतिस्पर्धा का बोझ डाल दिया जाता है।
चिंता की बात है कि प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी में बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास की उपेक्षा हो रही है। योग, खेल, साहित्य, संगीत और नैतिक शिक्षा जैसे विषय जो व्यक्तित्व को संतुलित बनाते हैं, वे हाशिए पर चले गए हैं। परिणामस्वरूप बच्चे तनाव और अलगाव का शिकार हो रहे हैं।
संविधान का अनुच्छेद 21 और 21 ए प्रत्येक नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन और शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। जीवन के प्रति उत्साह और आत्मविश्वास पैदा करना संविधान की भावना का हिस्सा है, लेकिन आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के नाम पर छात्रावासों और विद्यालयों में केवल पंखों की ऊंचाई बढ़ा देना या उन पर जालियां लगा देना समस्या का समाधान नहीं है।
आवश्यकता बच्चों के मन को समझने, उन्हें संवाद का अवसर देने और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की है। अधिक चिंता का विषय 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों में बढ़ती आत्महत्या को लेकर है जो 5.68 फीसद दर से पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ गई है। यह समाज और शासन दोनों के लिए चेतावनी है कि यदि अभी भी बचपन को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियां मानसिक रूप से असुरक्षित और निराश हो जाएंगी।
प्रत्येक आत्महत्या के पीछे एक टूटा हुआ परिवार
पारिवारिक कारणों से होने वाली आत्महत्याएं भी समाज की बदलती संरचना पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। हजारों पुरुष और महिलाएं पारिवारिक तनाव, वैवाहिक असंतोष तथा संबंधों में बढ़ती दूरियों के कारण जीवन समाप्त कर रहे हैं। वैवाहिक जीवन में समन्वय के अभाव, टूटते रिश्तों और विवाहेतर संबंधों ने भी अनेक परिवारों को बिखेरा है।
आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने संवाद की जगह संदेह और संवेदनाओं की जगह स्वार्थ को बढ़ावा दिया है। शिक्षित युवा जानलेवा नशे का शिकार होकर अपराध और आत्मघात की तरफ बढ़ रहे हैं। वहीं गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों का एक बड़ा वर्ग जीवन के संघर्ष से हार मान रहा है।
कृषि प्रधान देश के लिए यह अत्यंत दुखद है कि किसान और खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या कर लेने का आंकड़ा भी 6.3 फीसद तक पहुंच गया है। जो वर्ग पूरे देश का पेट भरता है, वही अपने जीवन की सुरक्षा और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है।
इन आंकड़ों को केवल सरकारी रिपोर्ट मान कर अनदेखा नहीं किया जा सकता। प्रत्येक आत्महत्या के पीछे एक टूटा हुआ परिवार, अधूरा सपना और समाज की कोई न कोई विफलता छिपी होती है। आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, यह परिवार, समाज और राष्ट्र की सामूहिक ऊर्जा का क्षरण है।
जब कोई विद्यार्थी, किसान, मजदूर या परिवार का मुखिया जीवन से हार मानता है, तब यह संकेत होता है कि कहीं न कहीं हमारी सामाजिक, शैक्षणिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं अपना दायित्व निभाने में असफल रही हैं।
आवश्यकता केवल भौतिक उपायों की नहीं, बल्कि संवेदनशील समाज के निर्माण की है। परिवारों को समन्वय और संवाद स्थापित करना होगा, शिक्षा को मानवीय मूल्यों से जोड़ना होगा, रोजगार को अधिक सुरक्षित बनाना होगा और मानसिक स्वास्थ्य को सार्वजनिक नीति का हिस्सा बनाना होगा। अर्थव्यवस्था में मजबूती से अधिक जरूरी जीवन प्रत्याशा की समृद्धि है।
