Temperature Hike: देश में बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम संबंधी घटना नहीं रह गई है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा बनती जा रही है। भारतीय मौसम विभाग ने वर्ष 2026 में गर्म मौसम की चेतावनी दी है। उसने कहा है कि मार्च से मई के बीच देश के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहेगा।

अधिक तापमान वाले दिनों की संख्या बढ़ सकती है। यह चेतावनी इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत पहले से ही दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां अत्यधिक तापमान और गर्मी का प्रभाव बड़ी आबादी पर पड़ता है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि गर्मी का मौसम पहले शुरू हो रहा है और यह लंबे समय तक बना रहता है।

उदाहरण के लिए मार्च 2026 के पहले सप्ताह में ही दिल्ली में तापमान 35.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से लगभग सात डिग्री अधिक था। पिछले पंद्रह वर्षों में मार्च के शुरुआती सप्ताह में इतना अधिक तापमान पहली बार महसूस किया गया। यह केवल एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के कई हिस्सों में इसी तरह की स्थिति देखी गई।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मौसमी उतार-चढ़ाव का परिणाम नहीं, बल्कि जलवायु संकट का संकेत है।
पिछले कई दशक के आंकड़े बताते हैं कि भारत का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। यह वृद्धि लगभग 0.15 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की दर से दर्ज की गई है। जब तापमान में ऐसी निरंतर वृद्धि होती है, तो इसका सीधा प्रभाव तापमान की आवृत्ति और तीव्रता पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में भारत में गर्मी और लू की लहरें अधिक लंबी और खतरनाक हो सकती हैं। भारतीय मौसम विभाग की चेतावनी केवल मौसम का अनुमान नहीं है, बल्कि यह समाज और सरकार के लिए एक चेतावनी है कि जलवायु संकट की चुनौती अब स्पष्ट रूप से हमारे सामने है। पिछले कुछ वर्षों में तापमान की आवृत्ति और तीव्रता दोनों ही बढ़ी हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में अक्सर तापमान चालीस डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है।

इस साल मार्च के दौरान मुंबई में तापमान 38.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो सामान्य से लगभग छह डिग्री अधिक था और इस कारण मौसम विभाग को चेतावनी जारी करनी पड़ी। इसी प्रकार पुणे में भी तापमान 38.5 डिग्री तक पहुंच गया और कई जिलों में तापमान चालीस डिग्री से ऊपर दर्ज किया गया। यह स्पष्ट संकेत है कि गर्मी की शुरुआत पहले हो रही है और इसका विस्तार अधिक व्यापक हो रहा है।

यह केवल तापमान की वृद्धि नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, कृषि, जल संसाधन और ऊर्जा प्रणाली पर व्यापक प्रभाव डालती है। अत्यधिक गर्मी के कारण खेतों में नमी कम हो जाती है, फसलें प्रभावित होती हैं। जल स्रोत सूखने लगते हैं। इसके अलावा बिजली की मांग बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से लगातार बढ़ रहा है।

इसका मुख्य कारण जीवाश्म र्इंधनों का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिक प्रदूषण और वनों की कटाई है। जब वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ती है, तो पृथ्वी की सतह पर अधिक गर्मी बनी रहती है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों में इसका प्रभाव और अधिक तीव्र रूप में दिखाई देता है।

शोध बताते हैं कि जलवायु संकट के कारण अत्यधिक तापमान वाली घटनाओं की संख्या और अवधि दोनों बढ़ रही हैं। इससे मानव स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि जब तापमान बहुत अधिक हो जाता है, तो शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता प्रभावित होती है, जिससे निर्जलीकरण, लू लगने और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं।

भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी अत्यधिक तापमान की समस्या को गंभीर बना रहा है। शहरों में विकास कार्यों के दौरान बड़ी मात्रा में कंक्रीट, डामर और धातु जैसी सामग्री का उपयोग होता है जो सूर्य की गर्मी को अधिक अवशोषित करती हैं और लंबे समय तक उसे रोक कर रखती हैं। इस कारण शहरों में तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक हो जाता है। जब शहरों में पेड़ों और हरित क्षेत्रों की संख्या कम होती है, तो यह प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

कई बड़े शहरों में ऊंची इमारतों के कारण हवा का प्रवाह कम हो जाता है, जिससे गर्मी अधिक महसूस होती है। जब शहरों में हरित क्षेत्र कम होते हैं, तो प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया कमजोर हो जाती है और वातावरण में बनी गर्मी रात में भी पूरी तरह कम नहीं हो पाती। इसलिए शहरी नियोजन में हरित क्षेत्रों का संरक्षण और विस्तार अत्यंत आवश्यक है।

अत्यधिक तापमान का सबसे गंभीर प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। शरीर में पानी की कमी हो जाती है। रक्तचाप तथा हृदय गति पर भी प्रभाव पड़ता है। लू लगने जैसी स्थिति बढ़ जाती है जो कई बार जानलेवा साबित होती है। बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और पहले से बीमार लोग विशेष रूप से अधिक जोखिम में होते हैं। भारत में बड़ी संख्या में लोग खुले वातावरण में काम करते हैं, जैसे किसान, निर्माण श्रमिक और फुटकर विक्रेता।

उन्हें अत्यधिक गर्मी का सीधा सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो अत्यधिक तापमान और लू सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकते हैं। इसलिए सरकार और समाज दोनों को मिल कर इसके प्रभाव को कम करने के उपाय अपनाने होंगे। साथ ही सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल की व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी होगी।

गर्मी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह कृषि और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित करता है। जब तापमान बहुत अधिक हो जाता है और वर्षा नहीं होती, तो मिट्टी की नमी कम हो जाती है और फसलें प्रभावित होती हैं। गेहूं, चावल और दालों जैसी प्रमुख फसलें तापमान के प्रति संवेदनशील होती हैं। यदि फसलों के विकास के समय तापमान अत्यधिक बढ़ जाए, तो पैदावार कम हो सकती है।

भारत जैसे देश में जहां बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है, वहां यह समस्या और गंभीर हो सकती है। इसके अलावा पशुधन पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। दूसरी ओर, जल संसाधनों पर भी इसका दबाव बढ़ता है, क्योंकि गर्मी के कारण पानी की मांग बढ़ जाती है। कई क्षेत्रों में भू-जल स्तर पहले से ही गिर रहा है। इसलिए सरकार, वैज्ञानिक समुदाय और समाज मिल कर जलवायु अनुकूल विकास की दिशा में काम करें। हरित ऊर्जा का उपयोग, वनों का संरक्षण, जल संसाधनों का सतत प्रबंधन और शहरी क्षेत्रों में हरित स्थानों को बढ़ावा इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

लोगों को भी अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाना होगा। साथ ही उन्हें ऊर्जा की भी बचत करनी होगी। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहना होगा। यदि हम सामूहिक प्रयास करें, तो बढ़ती गर्मी की चुनौती का सामना किया जा सकता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए संतुलित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है।

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