पुल पार करने से / पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती
नदी पार नहीं होती नदीं में धंसे बिना
नरेश सक्सेना ने कविता की ये पंक्तियां यांत्रिक विकास बनाम जीवन के यथार्थवादी अनुभव के संदर्भ में लिखी थीं। कवि के शब्द और उसके अर्थ के बीच नदी जितनी गहराई होती है। आज हम इस कविता के शब्दों को शाब्दिक अर्थ में ही लेंगे। तात्कालिक संदर्भ यह है कि दस सितंबर 2026 को बिहार के वैशाली में भारतमाला परियोजना के तहत निर्माणाधीन पुल का एक हिस्सा गिरने से सात मजदूर घायल हो गए।
सिर्फ बिहार की ही बात की जाए तो यहां 2024 में 18 पुल गिरे थे और 2025 में महज 18 दिनों में 12 छोटे-बड़े पुलों के गिरने का दावा करतीं खबरें आई थीं। अब कुछ समय पहले की घटना पर आते हैं। उज्जैन में पुल की मजबूती जांचने के दृश्य देख कर लोग खुद को सचेत कर रहे थे कि यह एआइ जनित होगा।
लेकिन यह प्रशासनिक कुदरती मेधा का कमाल था कि महाकालेश्वर मंदिर परिसर के 91 फुट लंबे ओवरब्रिज पर तीन सौ से अधिक सुरक्षा गार्डों का सामूहिक कूद-नृत्य करवाया गया। नाग पंचमी पर आने वाली भीड़ का समन्वय करने के लिए प्रशासन की ओर से इसे भार परीक्षण जांच बताया गया। मंदिर समिति का कहना है कि वह ऐसी जांच पहले भी करती रही है।
यहां सवाल यह है कि अगर पुल की गुणवत्ता बिहार और अन्य जगहों पर नए बने व निर्माणाधीन पुलों जैसी होती और कोई हादसा हो जाता तो 300 लोगों की जान को खतरे में डालने की जिम्मेदारी किसकी होती? देश में जिस तरह निर्माणाधीन और नए बने पुल भरभरा कर गिर रहे हैं तो इस तरह की जांच के लिए आए तीन सौ लोगों के लिए कोई राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार तो बनता ही है।
पिछले कुछ समय से सरकार का सारा जोर बुनियादी ढांचे के निर्माण पर है और इसे विकास की रीढ़ कहा जा रहा है। भारत में राष्ट्रीय राजमार्गों का नेटवर्क 2014 के लगभग 91287 किलोमीटर से बढ़कर 2026 में 146572 किलोमीटर तक पहुंच गया है, जिसे असाधारण की संज्ञा दी जा सकती है। सड़कों के ‘लोकार्पण’ की बाढ़ आई हुई है। लेकिन जरा सी बारिश होते ही रीढ़ की हड्डी पूछती है, क्या मुझे कागज से बनाया था?
लोकार्पण समारोह के लिए लगे गेंदे के फूल की मालाओं के मुरझाने के पहले राजमार्ग या एक्सप्रेसवे पर इतने बड़े गड्ढे हो जा रहे हैं कि नेता जी का दावा याद आता है-अभी हवा में उड़ने वाली बस लाने वाला हूं। उत्तर प्रदेश के जेवर हवाई अड्डे को सत्ता ने आभूषण की तरह धारण किया।
पहली ही बारिश में यह आभूषण नकली निकला। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ज्यों-ज्यों ढांचागत निर्माण हो रहे हैं त्यों-त्यों समस्या बढ़ रही है। अब तो हर भारी बारिश के बाद लोगों के लिए वायु-सफर के पहले नौका-विहार का आनंद लेने की स्थिति भी बन जाती है।
दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे पर सड़क का हिस्सा धंसने के बाद एनएचआइ का तर्क था कि पानी जमा होने और स्थायी ‘क्रास-ड्रेनेज’ व्यवस्था के चालू नहीं होने के कारण धंसी। सीधा सवाल यही है कि सड़क बनाने वालों ने पानी के प्राकृतिक बहाव तक को समझने की कोशिश क्यों नहीं की? बुनियादी ढांचे के विकास में बुनियादी बातों से ही बेपरवाही रही तो फिर आधुनिक इंजीनियरिंग की बातें तो बेमानी ही हैं।
दिल्ली के मोहल्लों से लेकर एक्सप्रेसवे तक की सड़कें डूबने, धंसने की सत्ता एक मासूम सी वजह बताती है, बारिश के कारण ऐसा हुआ। क्या आपको पता नहीं है कि भारत के ज्यादातर इलाकों में बारिश होती है? क्या वैज्ञानिकों, नियोजनकारों के लिए बारिश सामान्य ज्ञान से बाहर की बात है? दिल्ली के ‘सिग्नेचर ब्रिज’ के लोकार्पण की धूम-धाम याद ही होगी सभी को। सत्ता उसे अपने गर्व का हस्ताक्षर बता रही थी।
पिछले दिनों इसकी आडिट रिपोर्ट में पुल के स्टील में जंग के साथ नींव की सुरक्षा से जुड़ी समस्या भी बताई गई। जहां अत्याधुनिक हवाई अड्डे तालाब बन रहे हों, करोड़ों की लागत से बनी सड़कें धंसने का उद्घाटन करती हों वहीं हमारे सामने दिल्ली के ‘सत्य निकेतन’ जैसी घटनाएं सामने आती हैं। हां, उसी दिल्ली में जहां कोचिंग में पढ़ रहे विद्यार्थी की मौत बारिश के पानी में डूबने से हो गई लेकिन व्यवस्था को शर्म से भीगने के लिएआज तक चुल्लू भर पानी नहीं मिला।
लखनऊ में कोचिंग केंद्र में पढ़ रहे विद्यार्थियों का शरीर राख हो गया लेकिन व्यवस्था की साख पर कोई असर नहीं पड़ा। मलबे के नीचे दबे विद्यार्थियों की बचाओ-बचाओ की चीख के बीच सत्ताधारी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष का पार्टी दफ्तर बनाओ-बनाओ वाला जयकारा याद आ जाता है। उनकी पार्टी दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करती है।
मतलब गिरी इमारत के मलबे में दबे विद्यार्थी, नोएडा से लेकर दिल्ली तक गड्ढे में गिर कर मरे लोग, साकेत की इमारत की राख में खाक हुए लोगों में से कई उसके ‘काडर’ भी हो सकते हैं। क्या पार्टी अपने आलीशान दफ्तरों से बुनियाद के मलबे में दब रहे इन काडरों को देख कर चिंता कर रही होगी? क्या सवाल उठ रहे होंगे कि पार्टी के दफ्तरों की तरह ही जनता का विकास क्यों नहीं हो पाया?
सत्ताधारी पार्टी ने लंबे समय से ऐसा माहौल बनाया है कि उसका निशान अब कमल से ज्यादा बुलडोजर हो गया है। अपनी विचारधारा के खिलाफ खड़ी हर इमारत का विध्वंस करते हुए वह उच्च गुणवत्ता वाली जौहर यूनिवर्सिटी को भी जमींदोज करना चाहती है। अगर जंतर मंतर पर जेन-जी आंदोलन सफल न हुआ होता, धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा न देना पड़ा होता तो आज उसका मलबा भी जमीन पर पड़ा होता।
हालांकि अभी इसके ध्वस्तीकरण पर अंतरिम रोक लगी हुई है।जेन-जी आंदोलन को लेकर सत्ता-पक्ष ने विद्यार्थियों के मंसूबों पर सवाल उठाया था। सत्य निकेतन के मलबे में से विद्यार्थी की अर्थी निकलने के बाद भी क्या उनके मंसूबों पर संदेह करेंगे? आपको जेन-जी के नाम पर सिर्फ रील और ‘डिलुलु’ वाला ‘स्लैंग’ ही याद क्यों आता है? आपको वह जेन जी क्यों नहीं दिखता जिसके छात्रावास की दीवार कभी भी उसके सिर पर गिर सकती है।
जो कभी अपने संस्थान में पढ़ाई करते हुए डूब कर तो कभी झुलस कर मर जाता है। पुल के चमचमाते पत्थर पर उद्घाटन की तारीख और उसके ढहने की तारीख एक ही होने लगे तो इस विकास का जयकारा किस तरह से किया जाएगा? इतनी गारंटियों के बीच आपका पुल नदी पार करने की गारंटी क्यों नहीं दे रहा है? राजनीति में विडंबनात्मक प्रतीकों का इतिहास रहा है। मौजूदा सत्ता ने बड़े गर्व से बुलडोजर को अपना प्रतीक बनाया।
विडंबना यह है कि सत्ता बुलडोजर की ताकत से जितना ढहा रही है, उससे कई गुणा इमारतें बुनियादी कमजोरी से स्व-ध्वस्तीकरण कर रही हैं। बुनियादी ढांचे के विकास के हल्ले के बाद दिख रहा है कि बिना बुनियाद के चमकते कंगूरे बना दिए गए हैं। बुलडोजर को काम पर तभी बुलाया जाता है, जब इमारत की बुनियाद मजबूत होती है। जिस तरह से बिना बुनियाद के ढांचे खड़े हो रहे हैं, उससे लग रहा कि आने वाले समय में आपका प्यारा बुलडोजर ही बेरोजगार हो जाएगा।
