बेदिल द्वारा लिखा गया यह स्तंभ दिल्ली-एनसीआर की प्रशासनिक विसंगतियों और राजनीतिक रस्साकशी का कच्चा चिट्ठा पेश करता है। इसमें नोएडा की लड़खड़ाती भू-उपयोग नीति, दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति का विवाद और परिवहन सेवाओं में बढ़ती यात्रियों की उलझन को प्रमुखता से दर्शाया गया है। साथ ही, नशे की राजनीति, शालीमार बाग का मानवीय दर्द और सुरक्षा व्यवस्था में चूक जैसे विषय उजागर करते हैं कि कैसे आम जनता की बुनियादी जरूरतें अक्सर सियासी दांव-पेच और कागजी कार्यवाहियों के बीच दबकर रह जाती हैं। पढ़ें…

नीति का बोझ

दबाव में बनी नीति कागज पर तो चमकी, पर जमीन पर आते ही लड़खड़ा गई। नोएडा में औद्योगिक भूखंडों पर वाहन शोरूम और रिहायशी प्लाटों पर गेस्ट हाउस के लिए मिश्रित भू-उपयोग नीति को संशोधित कर लागू तो किया गया, लेकिन शर्तों ने ही उसकी रफ्तार रोक दी। 2015-18 में जब यह नीति पहली बार आई थी, तब वाणिज्यिक और औद्योगिक दर के अंतर का दस फीसद जमा कर अनुमति मिल जाती थी। तब भी यह रकम इतनी भारी लगी कि मुश्किल से दस फीसद शोरूम ही आगे आए, वो भी तब जब भुगतान पांच साल में किस्तों में करने की राहत थी। अब संशोधन के नाम पर राहत और सिकुड़ गई है। शुल्क दस से बढ़ाकर पच्चीस फीसद कर दिया गया और किस्तों की सुविधा भी खत्म कर दी गई, यानी पूरी राशि एकमुश्त। नतीजा यह कि नीति लागू तो है, लेकिन आवेदन करने वालों की कतार शायद कागजों में ही लंबी रहेगी।

समिति सियासत असर

राजधानी होने के कारण दिल्ली में विकास का जिम्मा केंद्र से लेकर नगर निकाय तक फैला है और उसमें दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति की भूमिका हमेशा अहम मानी जाती रही है। लेकिन हाल ही में इसे समय से पहले भंग कर दिया गया और अब बहस इस बात पर नहीं कि काम रुकेगा या नहीं, बल्कि इस पर है कि क्यों रोका गया। सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष बेवजह और भ्रामक आरोप लगा रहा है, क्योंकि नियम के मुताबिक एक साल पूरा होने पर 50 फीसद सदस्य स्वत: रिटायर हो जाते हैं। वहीं विपक्ष इसे भ्रष्टाचार को ढकने और पार्षदों की शक्तियां सीमित करने की साजिश बता रहा है। दोनों अपने-अपने सच के साथ अड़े हैं। लेकिन इन दावों की गहमागहमी के बीच एक सच चुपचाप खड़ा है। स्थायी समिति के बिना दिल्ली के विकास कार्यों की गति वैसे ही थम सी जाती है, जैसे कागज पर मंजूरी हो लेकिन फाइल आगे बढ़ने का रास्ता भूल जाए।

बस मार्ग उलझन

दिल्ली की सार्वजनिक बस सेवा वैसे ही कभी डिपो बंद होने, कभी सड़कों से गायब रहने, कभी बस का नाम देवी रखने और कभी मार्ग बदलने जैसे कारणों से चर्चा में रहती है। इस बार चर्चा मार्ग संख्या के आगे ‘ए’ ‘बी’ ‘सी’ लगाने को लेकर शुरू हो गई। कागज पर यह व्यवस्था बदले हुए मार्गों और तय गंतव्य तक पहुंचाने के लिए बताई जा रही है, लेकिन असल में ये अक्षर यात्रियों को यह समझाने का संकेत हैं कि बस शायद पूरा मार्ग नहीं चलेगी, बीच में ही दिशा बदल लेगी या लौट जाएगी। यानी सुविधा कम, संकेत अधिक। इससे यात्रियों की उलझन बढ़ गई है और जेब पर भी असर पड़ रहा है, क्योंकि एक ही मार्ग के हिस्से में दोबारा सफर के लिए अलग खर्च करना पड़ रहा है। यात्रियों की सीधी सी मांग है, अगर बस मार्ग पर चलती है, तो पूरा चले, अक्षरों के सहारे आधा सफर न समझाया जाए।

नशे पर राजनीति

जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी, तब भाजपा गली-मोहल्लों में खुले शराब ठेकों को लेकर सड़कों पर उतर आई थी। खूब हंगामा हुआ, खूब आरोप-प्रत्यारोप चले। अब तस्वीर पलटी है तो बहस का केंद्र भी बदल गया है। अब सोशल मीडिया पर ‘डूडर’ यानी अफीम जैसे नशे के वीडियो छाए हुए हैं, जिनमें छोटे बच्चों तक को हथियारों के साथ झूमते हुए दिखाया जा रहा है। आप इसे मुद्दा बनाकर मौजूदा सरकार पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष की साजिश और डर फैलाने की कोशिश बता रही है। दोनों तरफ अपने-अपने तर्क हैं और दोनों तरफ अपनी-अपनी राजनीति। लेकिन इन आरोपों और बचाव के बीच जो सबसे असहज सच बच जाता है, वह यह है कि नशे की तस्वीर चाहे शराब की हो या किसी और पदार्थ की..उसमें सबसे पहले भविष्य धुंधला होता है और सबसे ज्यादा नुकसान उसी पीढ़ी का होता है जिसे बचाने के दावे सबसे ज्यादा किए जाते हैं।

शालीमार बाग की गुहार

मुख्यमंत्री को अपनी पीड़ा सुनाने के लिए शालीमार बाग के लोग अब सोशल मीडिया का सहारा लेने को मजबूर हो गए हैं। वीडियो की बाढ़ है। किसी में टूटता आशियाना है, तो किसी में आंखों में सवाल। सबसे ज्यादा दर्द उन परिवारों का दिख रहा है जिनके मकानों को अनधिकृत बताकर गिरा दिया गया। महिलाएं बार-बार वही सवाल दोहरा रही हैं. जहां झुग्गी, वहीं मकान का वादा था, सबको घर मिलेगा, किसी का नहीं टूटेगा तो फिर वोट लेने के बाद उनकी आवाज क्यों अनसुनी रह गई? इधर राजनीति भी अपने मौके तलाश रही है। विपक्षी दल सोशल मीडिया पर इन वीडियो को तेजी से आगे बढ़ाकर सरकार को घेरने में जुटे हैं। आप और कांग्रेस इसे जनता का दर्द बता रहे हैं, जबकि सत्ता पक्ष इसे राजनीति का नया मंच मान रहा है और इस पूरे शोर में एक बात साफ है..दर्द असली है, बस उसके ऊपर हर कोई अपनी-अपनी राजनीति की परत चढ़ाने में लगा है।

बस सुधार अभियान

परिवहन विभाग इन दिनों बड़े स्तर पर स्कूल बसों को दुरुस्त करने का अभियान चला रहा है। शासन की तय डेडलाइन 15 अप्रैल तक सभी बसों को मानकों के अनुसार ठीक करने का लक्ष्य रखा गया है और साफ संकेत है कि लापरवाही पर अधिकारियों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है। इसी सख्ती का असर यह हुआ है कि कुछ ऐसे अधिकारी, जो लंबे समय से फील्ड में नजर ही नहीं आए थे, उनकी भी अब स्कूलों में ड्यूटी लगा दी गई है। विभाग के भीतर यह चर्चा आम है कि अचानक फाइलों से निकलकर जमीन पर उतरने की मजबूरी बन गई है। बताया जाता है कि उनके अधीनस्थ कर्मचारी भी हल्के-फुल्के अंदाज में कहते हैं कि साहब अब काम के बोझ से जल्दी थक जाते हैं और जल्दी सो भी जाते हैं। पहले नोएडा में रहते हुए इतना काम कभी नहीं दिखा, लेकिन अब कुर्सी बचानी है तो सक्रिय होना ही पड़ रहा है और दबी जुबान में यह भी चर्चा है कि 15 अप्रैल के बाद साहब किसी लंबी छुट्टी की तैयारी में हैं, क्योंकि अभियान खत्म होते ही थकान भी अपने चरम पर पहुंचने की उम्मीद है।

सुरक्षा पर सवाल

दिल्ली पुलिस ने एक उप-निरीक्षक और एक सहायक उप-निरीक्षक को निलंबित कर विधानसभा परिसर में तेज रफ्तार कार के अवरोधक तोड़कर घुसने के मामले को फिलहाल औपचारिक रूप से निपटा दिया है। लेकिन इस घटना ने विधानसभा की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा में इस समय आम व्यक्ति का प्रवेश लगभग असंभव जैसा माना जाता है। प्रवेश द्वार पर तैनात भारी पुलिस बल और सख्त जांच व्यवस्था के बीच पहले से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि बिना अनुमति कोई आगे नहीं बढ़ सकता। यहां तक कि विशिष्ट व्यक्तियों के आगमन पर भी पहले से नाम दर्ज होना अनिवार्य होता है। ऐसे में एक तेज रफ्तार कार का बैरियर तोड़कर अंदर प्रवेश करना और कुछ समय बाद बाहर निकल जाना व्यवस्था की चूक को उजागर करता है। हालांकि दो पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई कर जिम्मेदारी तय करने की कोशिश की गई है, लेकिन यह घटना सुरक्षा तंत्र की परतों पर सवाल जरूर छोड़ गई है।