दिल्ली की राजनीति में इन दिनों अंदरूनी खींचतान, टूट और अस्थिरता का माहौल साफ नजर आ रहा है। सत्तारूढ़ दल के भीतर भरोसे का संकट गहराता जा रहा है, जहां नेताओं और सांसदों के पार्टी छोड़ने से बेचैनी और अविश्वास बढ़ गया है। दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर भी तबादलों और फैसलों को लेकर राजनीति और ‘जुगाड़’ का खेल हावी दिख रहा है, जिससे सुधार की कोशिशें कमजोर पड़ती नजर आती हैं।
नगर निगम से लेकर सरकारी विभागों तक, फैसलों में मजबूती के बजाय समझौता और शक्ति संतुलन की राजनीति दिखाई दे रही है। वहीं विपक्ष भी जनता से जुड़ने के प्रयास में है, लेकिन संगठनात्मक कमजोरियां सामने आ रही हैं। कुल मिलाकर, ‘बेदिल’ द्वारा लिखा गया स्तंभ सत्ता, संगठन और प्रशासन—तीनों स्तरों पर असंतुलन, रणनीतिक चालें और अंदरूनी बगावत की मौजूदा स्थिति का आईना है।
आम जनता पार्टी में बगावत
दिल्ली की सत्ता पर लगभग दशकभर से जमी पार्टी के आंगन में ऐसी खुसुर-पुसुर चली कि दीवारों भी कान बंद किए रहीं। राष्ट्रीय संयोजक के करीबी समझे जाने वाले दो चेहरे समेत तीन भरोसेमंद सिपाही चुपचाप पाला बदलकर भाजपा की चौखट जा पहुंचे। इधर दरबार में सब ठीक होने के दावे होते रहे, उधर राज्यसभा वाले संकेत पहले ही इशारा कर चुके थे। मगर आलाकमान को भनक तक न लगी या लगी तो अनसुनी कर दी गई। अब सफाई दी जा रही है कि वे जमीनी नेता नहीं थे, पर सवाल यही कि जब किले के दरवाजे भीतर से खुले, तो पहरेदार आखिर कर क्या रहे थे?
राघल चड्ढा समेत सात सांसदों ने थामा बीजेपी का दामन
राघव चड्ढा समेत सात सांसदों के अचानक पार्टी छोड़ने से आप के आलाकमान में बेचैनी खुलकर सामने आ गई है। दफ्तरों में काम कम और खुसुर-पुसुर ज्यादा चल रही है। हर कोई अब एक-दूसरे को शक की नजर से देख रहा है कि अगला नंबर किसका है। डर यह भी है कि भाजपा कहीं इस टूट को और न बढ़ा दे। हालत यह है कि अब ‘विश्वसनीय लोग’ भी भरोसे की जगह सवाल लेकर घूम रहे हैं और मीठी वाणी में इरादे टटोल रहे हैं, ‘भाई, तुम भी लाइन में हो क्या?’ कार्यकर्ताओं को भी कहा गया है कि भाजपा के लोगों से संपर्क में रहें। राजनीति अब भरोसे से ज्यादा अंदाजों पर चल रही है।
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के कर्मचारियों का तबादला
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में अवैध निर्माण और कब्जे की जड़ पर चोट करने की कोशिश क्या हुई, अंदरखाने हलचल तेज हो गई। वर्षों से एक ही कुर्सी से चिपके 83 तकनीकी सुपरवाइजरों के तबादले का फरमान आया तो दफ्तरों में सन्नाटा और गलियारों में फुसफुसाहट बढ़ गई। एसीईओ की गोपनीय रपट पर सीईओ के आदेश से चली इस कलमजद ने कई ‘आरामतलब’ चेहरों की नींद उड़ा दी। मगर राजनीति भी कम कहां- जनप्रतिनिधियों ने इसे चुनावी नुकसान का मुद्दा बना दिया। ऊपर से संदेश आया और 48 घंटे में ही फैसले की धार कुंद पड़ती दिखी। सवाल यही, सुधार होगा या जुगाड़ ही जीतेगा?
दिल्ली नगर निगम चुनाव में आप का सरेंडर
दिल्ली नगर निगम की राजनीति में बड़ा उलटफेर दिख रहा है। 2022 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी शुरुआती दौर से ही प्रशासनिक और राजनीतिक मोर्चे पर कमजोर साबित हुई। पहला साल महापौर चुनाव की खींचतान और स्थायी समिति के गठन के विवाद में ही निकल गया, मामला अदालत तक भी पहुंचा। अब 2027 के निकाय चुनाव नजदीक हैं, लेकिन अंतिम वर्ष में पार्टी का रुख पूरी तरह नरम और समझौतावादी दिख रहा है। बहुमत होने के बावजूद महापौर पद पर चुनाव न लड़ने का निर्णय इसे ‘राजनीतिक समर्पण’ के रूप में देखा जा रहा है। इससे आगामी चुनावों में उसके लिए चुनौतियां और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
दिल्ली सरकार के कर्मचारियों का तबादला
दिल्ली सरकार में अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले वैसे भी आसान नहीं माने जाते, क्योंकि सेवाएं विभाग सीधे उपराज्यपाल के अधीन आता है। लेकिन उपराज्यपाल ने इस बार प्रशासनिक दांव में तेजी दिखाते हुए सिस्टम को ही हिला दिया। मुख्यमंत्री के निर्देश पर सहायक आयुक्त से लेकर कनिष्ठ सहायकों तक कुल 162 अधिकारियों के तबादले एक झटके में कर दिए गए। आम तौर पर एक-एक नाम पर लंबी खींचतान होती है, लेकिन इस बार निरीक्षण के बाद पूरी फाइल ही बदल गई। जानकार इसे सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई कम और राजनीतिक पुनर्संरचना ज्यादा मान रहे हैं। इससे एक तरफ कार्यप्रणाली पर नियंत्रण मजबूत हुआ, तो दूसरी तरफ विभागीय संतुलन भी पूरी तरह नए सिरे से तय हो गया।
छात्र संगठन गायब
एक राष्ट्रीय पार्टी के युवा विंग ने शहरी समस्याओं पर जनता से संवाद का नया अभियान शुरू किया है। पानी, जलभराव, डेंगू, प्रदूषण और अवैध निर्माण जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की तैयारी भी दिखाई गई। बड़े नेताओं ने मंच से इसे ‘जनता से जुड़ने की मुहिम’ बताया और युवाओं को मोहल्लों तक भेजने की बात कही। मगर मंच पर तस्वीर कुछ और ही थी। युवा, महिला और क्षेत्रीय संगठनों की मौजूदगी तो रही, पर पार्टी का छात्र संगठन नदारद दिखा। एनएसयूआई जैसे मजबूत छात्र नेटवर्क का नाम तक इस अभियान से गायब रहना जानकारों का विषय बन गया। दिल्ली के कॉलेजों में पकड़ रखने वाले छात्रों की गैरमौजूदगी पर सवाल उठने लगे। कुछ ने तंज कसा कि अभियान तो युवा का है, पर असली युवा ही बाहर रह गए। पार्टी के भीतर भी चर्चा है कि यह चूक थी या फिर राजनीतिक दूरी।
व्यवस्था में बगावत
परिवहन विभाग में इन दिनों अधिकारियों के बीच अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आ रही है। पहले से तय व्यवस्था में एक अधिकारी ने कुछ बदलाव कर दिए, जिससे ऊपर बैठे वरिष्ठ अधिकारी नाराज हो गए। इस पर शिकायत की मौखिक रपट शासन तक पहुंची। जब संबंधित अधिकारी को इसकी भनक लगी तो उन्होंने भी जवाबी कदम उठाया और अपनी इच्छा से व्यवस्था चलानी शुरू कर दी। अब पुरानी और नई व्यवस्था में टकराव की स्थिति बन गई है। बड़े अधिकारी संतुलन बनाने में जुटे हैं और स्थानांतरण की चर्चा तेज है।
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स्मार्ट बस शेल्टर पर रुकी हुई घड़ियां हों या थानों में धाराओं के साथ होता ‘शिकायत का खेल’, दिल्ली की व्यवस्था आज कई विरोधाभासों के बीच खड़ी है। ‘बेदिल’ द्वारा लिखे गए कॉलम में पढ़िए राजधानी के विभिन्न विभागों की कार्यसंस्कृति और उन जमीनी सच्चाइयों का कच्चा चिट्ठा, जो अक्सर सरकारी विज्ञापनों में नजर नहीं आतीं। पूरी खबर पढ़ें…
