स्मार्ट बस शेल्टर पर रुकी हुई घड़ियां हों या थानों में धाराओं के साथ होता ‘शिकायत का खेल’, दिल्ली की व्यवस्था आज कई विरोधाभासों के बीच खड़ी है। ‘बेदिल’ द्वारा लिखे गए कॉलम में पढ़िए राजधानी के विभिन्न विभागों की कार्यसंस्कृति और उन जमीनी सच्चाइयों का कच्चा चिट्ठा, जो अक्सर सरकारी विज्ञापनों में नजर नहीं आतीं।
दिल्ली के थानों में शिकायत का खेल
आमतौर देखा जाता है कि थाने पहुंचो तो पहले इंतजार कराया जाता है और कहा जाता है कि अभी समय नहीं है, बाद में आओ। अगर पैरवीकार अड़ जाए, तो तुरंत सलाह मिलती है, ऑनलाइन कर दीजिए, आसान रहेगा। असल में यहीं से खेल शुरू होता है। ऑनलाइन शिकायत के नाम पर पीड़ित को ऐसी राह पर डाल दिया जाता है, जहां वह चाहकर भी अपनी बात सही धाराओं में दर्ज नहीं कर पाता। गंभीर मामला भी गुमशुदगी या हल्की धारा में सिमट जाता है। ऊपर से कानून और अदालत के चक्करों का डर अलग दिखाया जाता है। आखिरकार, थका-हारा फरियादी वही करता है जो उसे कहा जाता है। शिकायत तो दर्ज होती है, पर इस तरह कि न सच्चाई बचती है, न इंसाफ की उम्मीद।
गलती का हिसाब
किसी ने ठीक ही कहा है…गलती छुपाए नहीं छिपती। ताजा किस्सा परिवहन विभाग का है, जहां एक अधिकारी की चूक बड़े साहब की नजर में आ गई। ऊपर से तो चुप्पी रही, लेकिन अंदर ही अंदर अच्छी खिंचाई हो गई। अब गुस्सा कहीं तो उतरना था, सो निशाना बने संविदा पर काम करने वाले छोटे कर्मचारी। उन्हें बुलाया गया और दो लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। वजह पूछी जाती, उससे पहले ही उनकी पुरानी गलतियों की फाइल खोल दी गई, ताकि फैसला जायज लगे। लेकिन मामला यहीं शांत नहीं हुआ। जिनके पास खोने को कम था, उन्होंने भी चुप रहने से इनकार कर दिया। फिर क्या था, उन्होंने भी उसी अधिकारी की गलतियों के पन्ने खोलने शुरू कर दिए। देखते ही देखते, छोटे से लेकर बड़े तक, सबकी परतें खुलने लगीं। अंत में यही साबित हुआ, गलती दबाने से नहीं दबती, बस मौका मिलते ही पूरे विभाग का आईना बन जाती है।
आदेश बनाम हकीकत
मानक पूरे न करने पर बिजली काटने के सख्त फरमान जारी हुए, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी सुना रही है। ग्रेटर नोएडा के यूपीआईसीईजेड क्षेत्र में वाहन चार्जिंग केंद्रों की बिजली अर्थदंड जमा न होने पर कटवाई गई थी। कुछ दिन तक कार्रवाई का असर भी दिखा, बिजली गुल रही। फिर अचानक वही कनेक्शन कैसे जुड़ गए, इसका जवाब किसी के पास नहीं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी आदेशों का हवाला देकर सख्ती की बात करते हैं, तो बिजली कंपनी बिना लिखित निर्देश के कुछ करने से इनकार करती है। इन सबके बीच सबसे दिलचस्प बात ये है कि न तो शोधन संयंत्र लगे, न ही मानक पूरे हुए, लेकिन बिजली की आपूर्ति बिना रुकावट जारी है। कागजों में सख्ती, जमीन पर नरमी और आदेशों पर किसी ने चुपचाप पोंछा फेर दिया।
मिलीभगत का बाजार
पूर्वी दिल्ली के आनंद विहार इलाके में दुकानदारों का पुलिस को लेकर तर्क भी कम दिलचस्प नहीं है…ना अगाड़ी चाहिए, ना पिछाड़ी, यही टोक है पहाड़ा। कौशांबी बस डिपो के सामने, दिल्ली सीमा में बस स्टैंड के पास सैकड़ों अवैध दुकानें लग रही हैं। नतीजा, सुबह से शाम तक जाम, राहगीरों को परेशानी। सवाल कि ये दुकानें किसके सहारे टिकी हैं, इसका जवाब खुद दुकानदार बेझिझक दे देते हैं उनकी जुबान पर सीधा सा फॉर्मूला है…रीढ़ पर कोतवाल तो डर कहां। यानी पुलिस से सांठगांठ हो जाए तो कानून भी किनारे खड़ा दिखता है। हां, महीने में एक-दो बार दिखावे की कार्रवाई जरूर होती है। दुकानें हटती हैं, सामान बिखरता है, और सिस्टम अपनी सक्रियता दिखा देता है। फिर कुछ ही समय में सब पहले जैसा। आखिर में दुकानदार भी यही पुराना निष्कर्ष सुनाते हैं…किसी भी शहर की पुलिस के साथ ना अगाड़ी आगे चलो, ना पीछे, बस बीच में रहो, काम चलता रहेगा।
नारी वंदन राजनीति
महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने वाले नारी वंदन अधिनियम पर अब सियासत सड़कों पर उतर आई है। दिल्ली में बीते दिनों से धरना-प्रदर्शन का दौर जारी है। कहीं सत्ता पक्ष विपक्ष के दरवाजे पर तख्ती लेकर पहुंच रहा है, तो कहीं विपक्ष भाजपा दफ्तर के बाहर हंगामा कर रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार खुद इस बिल को लेकर गंभीर नहीं है। हालात ऐसे हैं कि सत्ता पक्ष ही सदन में विपक्ष की भूमिका निभाता नजर आ रहा है। आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि नारी वंदन के नाम पर सिर्फ सियासी दिखावा किया जा रहा है। उधर, आम महिलाओं की राय इससे भी ज्यादा तीखी है। सरकार कोई भी हो, आधी आबादी को उनका पूरा हक देने में सबसे गोपनीय फांस न जाने कहां अटक ही जाती है।
आधुनिकता का दिखावा
दिल्ली और खासकर लुटियन दिल्ली में लाखों की लागत से लगे आधुनिक बस शेल्टर अब ‘ढाक के तीन पात’ साबित हो रहे हैं। बड़े दावे थे, रियल-टाइम बस जानकारी, रूट अपडेट, डिजिटल स्क्रीन, सीसीटीवी, सुरक्षा एप यानी इंतजार भी आधुनिक हो जाएगा। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। बीते दिनों बस स्टॉप पर यात्री इन सुविधाओं के बाबत दिए गए बटन दबाते रहे और बदले में मिली शून्य जानकारी। न बस आने का समय, न रूट का सुराग, सिस्टम जैसे खुद ही छुट्टी पर चला गया हो। रियल-टाइम तो दूर, बेसिक जानकारी तक गायब। हद तब हुई जब घड़ी पर नजर गई। शाम के वक्त भी 12 बजे ही अटकी हुई थी। यानी समय भी यहां स्मार्ट बनने से इनकार कर चुका था। बस का इंतजार करते लोग बटन आजमाते रहे और स्मार्ट सिस्टम अपनी खामोशी से जवाब देता रहा।
यह भी पढ़ें – दिल्ली मेरी दिल्ली: व्यवस्था का आईना, फाइलों में दौड़ता विकास और जमीन पर जूझती जनता
बेदिल द्वारा लिखा गया यह स्तंभ दिल्ली-एनसीआर की प्रशासनिक विसंगतियों और राजनीतिक रस्साकशी का कच्चा चिट्ठा पेश करता है। इसमें नोएडा की लड़खड़ाती भू-उपयोग नीति, दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति का विवाद और परिवहन सेवाओं में बढ़ती यात्रियों की उलझन को प्रमुखता से दर्शाया गया है। साथ ही, नशे की राजनीति, शालीमार बाग का मानवीय दर्द और सुरक्षा व्यवस्था में चूक जैसे विषय उजागर करते हैं कि कैसे आम जनता की बुनियादी जरूरतें अक्सर सियासी दांव-पेच और कागजी कार्यवाहियों के बीच दबकर रह जाती हैं। पढ़ें…
