बचपन जीवन का वह स्वर्णिम काल होता है, जिसमें सपनों की नींव रखी जाती है, संभावनाओं के पंख विकसित होते हैं और भविष्य की दिशा तय होती है। मगर आज यही बचपन कैंसर जैसे जटिल रोगों की गिरफ्त में आ रहा है, जो न केवल बच्चों के जीवन के सबसे कीमती वर्षों को छीन रहा है, बल्कि उनकी जान भी ले रहा है। यह केवल जीवनशैली और प्राकृतिक बदलाव का परिणाम नहीं है, बल्कि व्यवस्था से जुड़ा सवाल भी है। सबसे भयावह और असमानता का पहलू यह है कि बाल्यावस्था में कैंसर से होने वाली 94 फीसद मौत और 85 फीसद नए मामले कम एवं मध्यम आय वाले देशों में सामने आ रहे हैं। यानी जिन देशों में संसाधन सबसे कम हैं, वहां इस रोग का कहर सबसे अधिक है। भारत भी इस त्रासदी से अछूता नहीं है, जहां हर वर्ष लगभग 17 हजार बच्चे कैंसर के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। स्पष्ट है कि कैंसर से जंग केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि आर्थिक और व्यवस्था के स्तर पर भी है।

‘द लैंसेट’ में प्रकाशित रपट ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज-2023’ बाल्यावस्था में कैंसर के संकट की भयावहता को उजागर करती है। यह वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों की विफलता और स्वास्थ्य असमानता की तस्वीर पेश करती है, जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ा उन देशों की झलकती है, जहां संसाधन सीमित हैं और स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर। रपट के अनुसार, वर्ष 2023 में दुनिया भर में बाल्यावस्था के कैंसर के लगभग 3.77 लाख नए मामले सामने आए और करीब 1.44 लाख बच्चों की मृत्यु हो गई। इससे स्पष्ट है कि बाल्यावस्था का कैंसर अब केवल एक चिकित्सीय चुनौती नहीं रहा, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरियों और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं का प्रतीक बन गया है।

भारत के संदर्भ में यह संकट कई स्तरों पर जटिल है। एक ओर चिकित्सा विज्ञान ने कैंसर के उपचार में अभूतपूर्व प्रगति की है, दूसरी ओर इन आधुनिक सुविधाओं तक पहुंच अभी भी सीमित है। देश के बड़े शहरों में तो उन्नत कैंसर उपचार केंद्र मौजूद हैं, लेकिन ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में ये सुविधाएं न के बराबर हैं। परिणामस्वरूप अधिकांश बच्चे तब अस्पताल पहुंचते हैं, जब बीमारी अंतिम चरण में होती है। यही कारण है कि भारत में बाल कैंसर के मामलों में जीवित रहने की दर विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।

लैंसेट की रपट से पता चलता है कि बाल्यावस्था का कैंसर वर्ष 2023 में बच्चों की मृत्यु का आठवां प्रमुख कारण रहा। यही नहीं, यह ‘डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ ईयर्स’ (डीएएलवाई) के संदर्भ में भी दसवां सबसे बड़ा कारण है। ‘डीएएलवाई’ का अर्थ है, स्वस्थ जीवन के एक वर्ष का नुकसान यानी कैंसर केवल जीवन ही नहीं छीन रहा, बल्कि बच्चों के स्वस्थ, सक्रिय और कीमती समय को भी नष्ट कर रहा है। यह एक ऐसी क्षति है, जिसका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव दीर्घकालिक एवं गहरा होता है।

सबसे ज्यादा चिंताजनक पहलू यह है कि बाल्यावस्था के कैंसर के अधिकांश मामलों का संबंध जीवनशैली से नहीं होता, जैसा कि वयस्कों में देखा जाता है, बल्कि बच्चों में कैंसर अक्सर आनुवंशिक परिवर्तनों या कोशिकीय असामान्यता के कारण विकसित होता है। ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) बच्चों में सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है, जिससे वर्ष 2023 में लगभग 45,900 बच्चों की मृत्यु हुई। इसके बाद मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के कैंसर हैं, जिससे 23,200 बच्चों की मौत हुई। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो एक विरोधाभास स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आता है। वर्ष 1990 की तुलना में 2023 में बाल्यावस्था के कैंसर से होने वाली मौत में लगभग 27 फीसद की कमी आई है, जो चिकित्सा विज्ञान की प्रगति का स्पष्ट संकेत है। मगर यह प्रगति समान रूप से वितरित नहीं है। जहां विकसित देशों में इलाज की बेहतर सुविधाओं के कारण मृत्यु दर में गिरावट आई है, वहीं अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में यह दर 55 फीसद से अधिक बढ़ गई है। यह असमानता साफ तौर पर वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता को दर्शाती है।

भारत की बात की जाए, तो यहां बाल कैंसर की चुनौती केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक आयामों से भी जुड़ी हुई है। एक ओर इलाज का खर्च अत्यधिक है, दूसरी ओर अधिकांश परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा या वित्तीय सुरक्षा नहीं होती है। परिणामस्वरूप कई मामलों में इलाज अधूरा रह जाता है। इसके अलावा, जागरूकता की कमी भी एक बड़ी समस्या है। प्रारंभिक लक्षणों को अक्सर सामान्य बीमारी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे निदान में देरी होती है और उपचार की संभावना कम हो जाती है। स्वास्थ्य प्रणाली की संरचनात्मक कमजोरियां भी इस संकट को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रशिक्षित चिकित्सकों और आवश्यक जांच सुविधाओं का अभाव, विशेषज्ञों की कमी और बड़े अस्पताल भेजने की प्रक्रिया में जटिलता बच्चों को समय पर उपचार मिलने में बाधा उत्पन्न करती है।

हालांकि इस निराशाजनक परिदृश्य के बीच उम्मीद की किरण भी दिखाई देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से शुरू किया गया ‘ग्लोबल चाइल्डहुड कैंसर इनिशिएटिव’ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक कैंसर से पीड़ित बच्चों में जीवित रहने की दर को कम से कम साठ फीसद तक बढ़ाना है। इसके तहत समय पर निदान, सस्ती और सुलभ दवाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाने और स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। भारत में भी सरकार और विभिन्न संस्थाएं इस दिशा में प्रयासरत हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को इलाज की सुविधा प्रदान कर रही हैं। इसके अलावा, टेलीमेडिसिन, संचालित स्वास्थ्य इकाइयों और डिजिटल स्वास्थ्य मंच के माध्यम से दूरदराज के क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। मगर इस कवायद को और अधिक व्यापक, समन्वित और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

इसमें दोराय नहीं कि इस समस्या का समाधान केवल चिकित्सा प्रगति से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। सबसे पहले, जन-जागरूकता को बढ़ाना होगा, ताकि माता-पिता और शिक्षक प्रारंभिक लक्षणों को पहचान सकें। इसके साथ ही, प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करना होगा, ताकि शुरुआती स्तर पर ही रोग की पहचान और उपचार संभव हो सके। चिकित्सा शिक्षा और प्रशिक्षण में निवेश बढ़ाना भी आवश्यक है, ताकि पर्याप्त संख्या में विशेषज्ञ उपलब्ध हो सकें। स्वास्थ्य सेवाओं में समानता सुनिश्चित करना अत्यंत जरूरी है। जब तक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच और अमीर एवं गरीब देशों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं की खाई कम नहीं होगी, तब तक इस समस्या का समाधान अधूरा ही रहेगा।

बचपन को कैंसर से बचाना केवल एक चिकित्सा लक्ष्य नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। यह उस समाज की पहचान है, जो अपने सबसे कमजोर और अनमोल वर्ग की रक्षा करने में सक्षम है। यदि हम वास्तव में एक स्वस्थ और समृद्ध भविष्य की कल्पना करते हैं, तो यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा केवल इसलिए अपनी जान न गंवाए, क्योंकि उसे समय पर इलाज नहीं मिल सका। कैंसर से जूझता बचपन हमें यह अहसास कराता है कि विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं मापा जा सकता, बल्कि यह इससे तय होता है कि हम अपने बच्चों को कितना सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक जीवन दे पा रहे हैं।