अनुशासन के नाम पर हिंसा, मानसिक उत्पीड़न और विद्यालयों की जवाबदेही पर अब यह सवाल जरूरी है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को आखिर क्या दे रही है- ज्ञान या भय? हाल ही में विशाखापत्तनम के एक स्कूल में एक बच्चे की मौत ने इस सवाल को बेहद कड़वी सच्चाई में बदल दिया है।
खबरों के अनुसार, बच्चे के परिवार ने आरोप लगाया कि गृहकार्य पूरा न करने पर शिक्षक ने उसे थप्पड़ मारा। सामने आए वीडियो में शिक्षक बच्चे को डांटते और थप्पड़ मारते हुए दिख रहा है। इस घटना के बाद बच्चा कक्षा में गिर पड़ा और अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
आरोपी शिक्षक को गिरफ्तार जरूर किया गया, लेकिन बच्चे की मृत्यु का अंतिम सच जांच और पोस्टमार्टम के निष्कर्षों से ही तय होगा। सवाल है कि क्या किसी बच्चे को शिक्षा देने के नाम पर थप्पड़ मारना चाहिए?
इसके बाद दिल्ली में ग्यारह वर्षीय एक छात्रा से जुड़ी घटना ने भी स्कूलों में बच्चों के साथ व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। परिजनों ने आरोप लगाया कि स्कूल में शिक्षक द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद बच्ची की तबीयत बिगड़ी और बाद में उसकी मौत हो गई। हालांकि पुलिस और उपलब्ध जानकारी के अनुसार कहा गया कि बच्ची को पहले से ही गंभीर बीमारी थी। सत्य तो जांच के बाद पता चलेगा, लेकिन स्कूलों में बच्चों की शारीरिक और मानसिक पीड़ा को पर्याप्त गंभीरता से लिया जाना जरूरी है।
भारत में बच्चों को शारीरिक दंड से बचाने के लिए कानून मौजूद है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा-17 बच्चे को शारीरिक सजा और मानसिक उत्पीड़न स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करती है। इसी कानून में विद्यालयों के मानकों, शिक्षकों के कर्तव्यों और शिकायतों के निवारण से संबंधित प्रावधान भी हैं। इसके बावजूद स्कूलों में ‘मार से सुधार’ की संस्कृति अभी तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
हमारे समाज में अनुशासन और सजा को लंबे समय तक एक-दूसरे का पर्याय समझा गया। ‘हमारे जमाने में मास्टर मारता था’, ‘एक थप्पड़ से बच्चा सीधा हो जाता है’, ‘बच्चे में थोड़ा डर जरूरी है’, ये वाक्य सामान्य बातचीत में आज भी सुनाई देते हैं। मगर आधुनिक बाल मनोविज्ञान और बाल अधिकार की अवधारणा ने इस सोच को चुनौती दी है।
बच्चे की भावनात्मक संरचना अलग है। शिक्षक की डांट उसके लिए उतनी ही बड़ी घटना हो सकती है, जितनी किसी वयस्क के लिए सार्वजनिक अपमान। शिक्षक का एक थप्पड़ शायद उसके लिए पांच मिनट की घटना हो, लेकिन बच्चे के लिए वह महीनों तक चलने वाला भय बन सकता है।
नवंबर, 2025 में महाराष्ट्र में छठी कक्षा की एक छात्रा की मौत से जुड़ा मामला भी देश का ध्यान खींच चुका है।
उस घटना में परिवार ने आरोप लगाया था कि स्कूल देर से पहुंचने पर बच्ची को सौ बार उठक-बैठक करने की सजा दी गई। परिवार ने दावा किया कि इसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ी और इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस मामले में शिक्षक की गिरफ्तारी हुई। यहां अहम प्रश्न यह है कि स्कूल में किसी बच्चे को सजा देने के लिए शारीरिक प्रताड़ना का इस्तेमाल आखिर किस शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है? देर से आने की गलती का समाधान संवाद हो सकता है।
समय-प्रबंधन सिखाया जा सकता है। अभिभावकों से संवाद किया जा सकता है, लेकिन शरीर को सजा देने का औजार बना देना किस प्रकार का अनुशासन है? चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों ने भी चेताया है कि बच्चों से अचानक और असामान्य रूप से कठोर शारीरिक गतिविधि कराना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
अगस्त, 2024 में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक छात्रा की आत्महत्या से जुड़े मामले में शिक्षक की याचिका खारिज करते हुए स्कूल में शारीरिक हिंसा पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की थी। अदालत ने कहा कि शिक्षा या अनुशासन के नाम पर बच्चे के साथ शारीरिक हिंसा क्रूरता है और बच्चे को संवेदनशीलता के साथ विकसित किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी केवल किसी एक मामले के संदर्भ में नहीं देखी जानी चाहिए। यह उस बुनियादी सिद्धांत की पुनर्पुष्टि है कि बच्चे पर शिक्षक का अधिकार उसकी गरिमा से ऊपर नहीं हो सकता।
शिक्षक को कक्षा में अनुशासन लाने का अधिकार है, लेकिन बच्चे की गरिमा छीनने का अधिकार नहीं। विद्यालय को व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता है, लेकिन भय पैदा करके व्यवस्था कायम करना शिक्षा नहीं है। स्कूलों में हिंसा का अर्थ केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं है। कक्षा में बच्चे को सबके सामने अपमानित करना, उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करना, जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि पर टिप्पणी करना, लगातार उसे ‘नालायक’ कहना, पूरी कक्षा के सामने खड़ा कर देना, धमकाना या अलग-थलग करना भी बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्कूल सुरक्षा संबंधी सामग्री भी सकारात्मक व्यवहार, बच्चों की भागीदारी, समस्या के मूल कारण को समझने और सजा के स्थान पर सकारात्मक अनुशासन पर जोर देती है। आयोग ने स्कूल में बच्चों की सुरक्षा के लिए नियमावली और विस्तृत दिशानिर्देश उपलब्ध कराए हैं।
हम शिक्षक से विषय का विशेषज्ञ होने की अपेक्षा करते हैं। गणित का शिक्षक गणित जानता हो, विज्ञान शिक्षक विज्ञान जानता हो, भाषा शिक्षक भाषा का अच्छा ज्ञान रखता हो, यह स्वाभाविक है। लेकिन क्या हर शिक्षक को यह पता है कि छह वर्ष के बच्चे का व्यवहार कैसा होता है? क्या उसे पता है कि किसी बच्चे के लगातार गृहकार्य न करने के पीछे पारिवारिक तनाव, सीखने में कठिनाई, ध्यान संबंधी समस्या या कोई भावनात्मक वजह हो सकती है? क्या शिक्षक को यह प्रशिक्षण दिया जाता है कि गुस्से में प्रतिक्रिया देने के बजाय कक्षा को कैसे संभालना है
यही वह क्षेत्र है जहां शिक्षक प्रशिक्षण की गंभीरता सामने आती है। कक्षा प्रबंधन हिंसा से नहीं, कौशल से आता है। बच्चों को डराना आसान है। उन्हें समझना कठिन है। अच्छा शिक्षक वही है जो कठिन रास्ता चुनता है। हर घटना के बाद केवल शिक्षक को निलंबित कर देना सबसे आसान तरीका है। इससे तत्काल जन आक्रोश शांत हो सकता है, लेकिन समस्या समाप्त नहीं होती।
भारत में शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है। स्कूलों की फीस, सुविधाएं और परिणामों की चर्चा खूब होती है। मगर बच्चे के अधिकारों की चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। अभिभावक फीस देते हैं, लेकिन बच्चा स्कूल में कोई ‘ग्राहक’ नहीं है। वह भी अधिकार संपन्न नागरिक है। उसकी गरिमा है। उसकी आवाज है। उसका मानसिक स्वास्थ्य है। सुरक्षा का अधिकार है। विद्यालय का दायित्व केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना नहीं है। उसका दायित्व ऐसा वातावरण बनाना है जिसमें बच्चा प्रश्न पूछ सके, गलतियों से सीख सके और अपनी बात कह सके।
जिस कक्षा में गलती करने से बच्चा डरता है, वहां सीखने की प्रक्रिया आधी मर चुकी होती है। शिक्षा का सबसे बुनियादी पैमाना यह होना चाहिए कि क्या हमारा बच्चा सुबह स्कूल जाते समय खुश है या नहीं? क्या गृहकार्य की एक कापी बच्चे के जीवन से बड़ी हो सकती है? ये कुछ सवाल हैं जिनका हमें सामना करना होगा।
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हमारे समाज में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि घर का काम मुख्य रूप से महिलाओं की जिम्मेदारी है और बाहर जाकर कमाना पुरुषों का दायित्व। मगर बदलते समय के साथ परिवार की यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। जब कक्षा छह के सामाजिक विज्ञान के एक पाठ में बच्चों से पूछा गया कि ‘क्या पिता खाना बना सकते हैं’ और ‘क्या मां घर के बाहर काम कर सकती हैं’, तो चर्चा केवल एक पाठ तक सीमित नहीं रही। पढ़िए पूरी खबर…
