भारत के आजाद होने के बाद देश का स्व-निर्मित संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ। इसमें प्रत्येक नागरिक को समानता, समता और गरिमा के साथ जीवन यापन करने के लिए आवश्यक प्रावधान निहित थे। इनके क्रियान्वयन के लिए देश को अपनी संसद की संरचना करने का उत्तरदायित्व मिला। साथ ही हर प्रकार की विविधता से परिपूर्ण संप्रभु राष्ट्र के संचालन और पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी भी मिली। अंग्रेजों के शोषण के कारण देश आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत कठिन स्थिति में था। मगर भारत को उसके परंपरागत ज्ञान, त्याग और वैश्विकता से अलग नहीं किया जा सका था। परिणामस्वरूप द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्वतंत्र होने वाले राष्ट्रों में भारत के संविधान ने अपना अग्रणी स्थान बनाया और उसके क्रियान्वयन ने इसे सिद्ध भी कर दिया है। लोकतंत्र में संविधान सत्ता पक्ष को मार्ग दिखाता है और विपक्ष को विकल्पों के साथ सकारात्मक आलोचना के ऐसे अवसर प्रदान करता है, जो उसे सत्ता में वापसी की राह दिखाते हैं।
यह अपेक्षित ही है कि सत्ता पक्ष हर समय दोहराता है कि वह निष्ठापूर्वक संविधान का पालन कर रहा है। जबकि विपक्ष इसे नकारता है। कौन सही है- कौन नहीं, इसका फैसला जनता विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में करती रही है। यह राजनीति में शालीनता के स्तर का मापक होता है कि जो चुनाव में विजयी न हो पाए, वह भी विनम्रता से जन-निर्णय को स्वीकार कर ले। मगर इस मामले में हम कमजोर होते जा रहे हैं! दुर्भाग्य से शालीनता, समता, समादर, सौम्यता, जैसे व्यावहारिक तत्त्व राजनीति में ढूंढ़ पाना लगातार कठिन होता जा रहा है। भारत का संविधान निर्माण करने वाले अधिकांश लोग वे थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी की थी और जो देश को भली-भांति समझते थे। भीम राव आंबेडकर और राजेंद्र प्रसाद की संविधान निर्माण में अग्रणी भूमिका थी। दोनों ही विद्वान और प्रखर अध्येता थे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं संविधान सभा की अंतिम बैठक में इन दोनों के भाषण के कुछ विशेष अंश, जो उनकी दूरदृष्टि की उज्ज्वलता तथा सटीकता को दर्शाते हैं। उनकी चिंताओं ने अब वह स्वरूप ले लिया है, जिसकी आशंका उन्होंने जताई थी। आंबेडकर ने आगाह किया था कि संविधान और उसके बाद की राजनीति दुहाई तो समता और समानता की देगी, लेकिन जो सामाजिक और सांस्कृतिक दूरियां सदियों में पनपी थीं तथा जो सांप्रदायिक दूरियां भारत विभाजन से जन्मी थीं, वे संविधान की व्यवहारिकता को प्रभावित करेंगी।
26 नवंबर, 1949 को राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि राष्ट्रहित और जन-कल्याण इस पर निर्भर करेगा कि देश का शासन तंत्र कैसे चलता है और उसे चलाने वाले लोग कैसे हैं। यदि चयनित प्रतिनिधि चरित्रवान और ईमानदार होंगे, तो अनेक कमियों के रहते हुए भी यह संविधान लोक कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकेगा। इससे पहले 25 नवंबर, 1949 को डा आंबेडकर ने आगाह किया था कि संविधान समता और बराबरी पर जोर देगा, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में लंबे समय से चल रहे विरोधाभास अनेक अवरोध उत्पन्न करेंगे। ऐसे में संवैधानिक लोकतंत्र को व्यावहारिकता में चल रही अलोकतांत्रिक परंपराओं का सामना करना पड़ेगा! स्पष्ट है कि यह आमजन की और राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी होगी कि इन दूरियों को समाप्त किया जाए। संविधान की आत्मा को समझ कर उसके क्रियान्वयन के लिए जो आवश्यक तत्त्व इन दोनों के भाषणों से निकलते हैं, वे हैं अनुकरणीय नेतृत्व तथा नागरिकों का चयनित नेताओं और उनके चरित्र पर विश्वास बने रहना। प्रारंभ तो सही दिशा में हुआ था, लेकिन सत्ता के आकर्षण से अनेक राजनेता दिग्भ्रमित होते रहे और वे संविधान की मूल भावना से मुंह फेर कर देशहित ही भूल गए।
कठिन समय में भी संविधान ने लोकतंत्र की मूल भावना से अपने समृद्ध होने के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए। वर्ष 1977 का लोकसभा चुनाव अपने आप में ऐतिहासिक था, देश में पहली गैर-कांग्रेस सरकार बनी, सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्वक और गरिमा के साथ हुआ। जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर इंदिरा गांधी के विरोध में जनमत बना, अनेक विरोधी दल साथ आए और कांग्रेस हारी। जो कुछ संवैधानिक व्यवस्था में 25 जून 1975 को आपातकाल लगाने पर बिखर गया था, वह वर्ष 1977 में सारे विश्व के समक्ष सशक्त होकर उभरा। चुनाव में जनता ने अपने उत्तरदायित्व का आकलन किया और जो पीढ़ियों से कांग्रेस के समर्थक थे, वे भी अपने निर्णय तथ्यों के आधार पर ले सके। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने भारत को पत्र लिखकर बधाई दी और इसे अमेरिकी लोगों समेत समूचे वैश्विक समुदाय के लिए प्रेरणादायक बताया। उस समय राष्ट्रव्यापी स्तर पर सामान्य जन ने अपने मत के महत्त्व और ताकत को पहचाना। मगर वह नवनिर्वाचित लोकसभा केवल ढाई साल ही चल सकी। जो सत्ता में आए, वे स्थिति को संभाल नहीं पाए और देश की जनता ने अगले चुनाव में इंदिरा गांधी को पुन: सत्ता सौंप दी।
देश में एक ऐसी पीढ़ी अभी भी मौजूद है, जिसने वर्ष 1952 के बाद के सभी चुनाव देखे हैं और वे उस परिवर्तन के साक्षी रहे हैं, जिसमें अपवाद छोड़कर त्याग और जन-कल्याण की संस्कृति को हाशिए पर धकेल दिया गया तथा संग्रहण, लालच तथा स्वार्थ को जमकर बढ़ावा दिया गया। संसद की कार्यवाही प्रारंभिक वर्षों में जिस शालीनता से चलती थी, वह नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय थी। पक्ष-विपक्ष में किसी प्रकार की कटुता या वैमनस्य का कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता था। संविधान विशेषज्ञ डा सुभाष कश्यप ने अपनी एक पुस्तक में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी द्वारा प्रस्तुत एक संशोधन पर उनके और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच संवाद का जिक्र किया है, जो आज के संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण समझ प्रदान करता है। जब नेहरू ने राजगोपालाचारी से कहा कि बहुमत मेरे साथ है, तो उन्होंने कहा कि यह बात बिल्कुल सही है कि बहुमत आपके साथ है, लेकिन तर्क मेरे साथ हैं। उसके बाद पंडित नेहरू ने उनके तर्क के आधार पर पूर्ण संशोधन को स्वीकार कर लिया।
ऐसे अनेकानेक संदर्भ याद किए जा सकते हैं जो दलगत विचारधारा से ऊपर उठकर देशहित और जनकल्याण के लिए कार्य करने के प्रति प्रेरित करते हैं। आज हम कहां पहुंचे हैं? पहले के दशकों में यह कल्पनातीत था कि कोई राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि विरोध के नाम पर संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाएगा, मगर आज संसद में ऐसे दृश्य अनेक बार देखने को मिल जाते हैं। ऐसे जनप्रतिनिधि जब यह कहते हैं कि वे संविधान का तथा आंबेडकर और राजेंद्र प्रसाद जैसे लोगों का सम्मान करते हैं, तो यह देश की जनता के लिए महज छलावा लगता है। यह याद रखना होगा कि जब तक देशहित और लोक कल्याण की भावना को राजनीतिक विचारधारा एवं निजी स्वार्थ से ऊपर नहीं रखा जाएगा, तब तक संविधान के मूल तत्त्व और लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखना आसान नहीं होगा।
