राजनीति के रंगमहल में दो नक्शे होते हैं। जब आपकी राजनीति शक्तिवान होती है तो आपके रंगमहल में प्रवेश पाने के लिए दस दरवाजे होते हैं। राजनीति में शक्ति से बड़ा मूल्य कोई नहीं होता है। जब आपकी राजनीतिक शक्ति क्षीण होने लगती है, तब शक्ति के रंग उतरने से बेरंग हुए महल में निकासी के दस द्वार खुल जाते हैं। दसों द्वार पर महल से निकसने वाले तात्कालिक कारण चाहे कुछ भी बताएं, मूल में है शक्तिहीन होना। शक्ति की पौष्टिक खुराक शक्ति ही होती है। केंद्रीय सत्ता से च्युत होने के बाद कुपोषित कांग्रेस के पास संगठनात्मक रूप से कुछ नहीं बचा था, इसलिए नेताओं के वहां से निकलने का दौर शुरू हो गया। शुरू में राजनीतिक अहंकार में राहुल गांधी ने इसे पार्टी की सफाई माना था। वहीं आज के दौर में सवाल यह है कि अपना हित देख कर कांग्रेस से निकल जाने वाले बिट्टू गद्दार हैं तो क्या कांग्रेस को नुकसान पहुंचाते हुए उसके साथ बने रहने वाले शशि थरूर ताजा हालात में वफादार हैं? कांग्रेस के दस दरवाजों से निकस गए नेताओं पर बेबाक बोल।
‘नियंत्रण ही शक्ति है।’ यह फिल्मी संवाद राजनीति के संदर्भ में अहम है। राजनीतिक शक्ति के संदर्भ में बात की शुरुआत करने का मकसद राहुल गांधी हैं। कुछ समय पहले उन्होंने संसद में भगवान शिव की अभय मुद्रा के बारे में बात की थी और उनका ‘डरो मत’ संवाद लोकप्रिय हुआ था। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर राहुल गांधी खुद शक्ति के प्रतीक हैं। यह शक्ति उन्हें पारिवारिक पूंजी के रूप में मिली है। वे गर्व से इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की शहादत के बारे में बात कर सकते हैं।
समसामयिक मंच पर आपका किरदार कैसी भूमिका निभाता है, यह बहुत हद तक आपकी पारिवारिक पूंजी का परिवेश तय करता है। इसी पूंजी की बदौलत राहुल गांधी राजीति में फीनिक्स पक्षी की तरह हैं। एक तरफ उनके खात्मे का एलान होता है, दूसरी तरफ वे अपनी ही राख से शक्ति अर्जित करते हुए अपना नया रूप धर लेते हैं। तभी उनके समर्थक कहते हैं, ‘टाइगर जिंदा है’। इंसानी बस्ती जंगल से भी बाघ या शेर के प्रतीक को ही क्यों लाती है? हम किसी की प्रशंसा में यह क्यों नहीं कहते कि वह गिलहरी है या खरगोश है। क्योंकि शेर, शक्ति का प्रतीक है। हिंसक, अपने से कमजोर जानवरों को खाने के बावजूद इंसानी बस्ती में शेर, शक्ति के स्वरूप में ही पूज्य है। लेकिन राख से निकल कर साख बनाने की सुविधा सबके पास नहीं है।
जार्ज आरवेल अपने उपन्यास ‘1984’ में कहते हैं कि शक्ति का उद्देश्य ही शक्ति प्राप्त करना होता है। राजनीतिक संदर्भ में ‘1984’ कई तरह के संदर्भ लेकर आती है। हरि अनंत हरि कथा अनंता सरीखा। ‘1984’ एक राजनीतिक उपन्यास है और राजनीति का अ शक्ति से शुरू होकर उसके ज्ञ का समापन भी शक्ति पर होता है। मानव की चेतना ही ऐसी है कि वह शक्ति की तरफ आकर्षित होती है। कुदरत में उसकी पहली प्रेरणा शक्ति का संचय करना ही होती है। इसलिए मानव इतिहास का सबसे लोकप्रिय सिद्धांत ‘ताकतवर की विजय’ भी शक्ति को ही सलाम करता है।
2014 के बाद कांग्रेस का उद्देश्य भी शक्ति प्राप्त करना ही है। एक वो समय भी था, जब मौजूदा सत्ताधारी पार्टी दो सांसदों के साथ ‘हम दो हमारे दो’ के नाम से हंसी का पात्र बनती थी। मुख्यधारा का वैचारिक तबका कांग्रेस से ही जुड़ाव रखना चाहता था। लेकिन 2014 के बाद से कांग्रेस सत्ता की शक्ति की प्रतीक नहीं रही। इसलिए कांग्रेस को छोड़ने वाले नेताओं की कतार लग गई। बहाना चाहे, देशभक्ति का हो, या आंतिरक लोकतंत्र का, कड़वा सच यही था कि कांग्रेस के पास सत्ता की शक्ति नहीं है। राजनीति में लोग शक्ति हासिल करने के लिए आते हैं। उन्हें जिधर भी शक्ति दिखती है, उधर के लिए अपने तर्क खोज लेते हैं।
शक्ति में संशय का पहला प्रमाण होता है कि आप असंसदीय होते हैं
पिछले लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी खुद भी विपक्ष की शक्ति के रूप में उभरे और उन्होंने संसद के अंदर अपनी शक्तिशाली छवि का बखूबी इस्तेमाल किया। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी की शारीरिक भाषा के अंतर पर गौर फरमाया जा सकता है। वही अंतर 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद देखा जा सकता है, जब उन्हें राज्यों के विधानसभा चुनाव में लगातार हार का सामना करना पड़ा। हार के बाद उनकी भाषा की शक्ति में संशय दिखा। शक्ति में संशय का पहला प्रमाण होता है कि आप असंसदीय होते हैं।
संसद में अभय मुद्रा दिखाने वाले, संविधान की किताब साथ में रखने वाले राहुल गांधी के साथ यह सुविधा तो कतई नत्थी नहीं हो सकती कि वे संसद परिसर में असंसदीय शब्द बोलें। केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने के दौरान जब उन्होंने पूर्व कांग्रेस नेता व केंद्रके मौजूदा मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को देखा तो उन्हें गद्दार कहा। बिट्टू को जब लगा कि कांग्रेस के लिए आगे की शक्ति बटोरना तो दूर की बात वह मौजूदा शक्ति का भी इस्तेमाल नहीं कर पा रही है, तो अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। यही हाल अरविंदर सिंह लवली के साथ था। दिल्ली में कांग्रेस के नीतिगत असमंजस को लेकर ही वे भी कांग्रेस के कूचे से निकले थे।
दिल्ली विधानसभा चुनाव से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक में कांग्रेस ने हर फैसला लेने में इतनी देरी की, जिसका सीधा नुकसान गठबंधन को हुआ। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की देरी को दुरुस्त करना नामुमकिन था। इतनी बड़ी राजनीतिक गलतियों के बीच भी राहुल गांधी कांग्रेस को छोड़ कर जाने वाले को संसद परिसर के अंदर गद्दार कहने की सुविधा बचाए रखना चाहते हैं।
राहुल गांधी जिस संविधान की किताब के अग्रदूत बने हुए हैं, वही किताब किसी नेता को अधिकार देती है कि वह एक राजनीतिक दल को छोड़ कर दूसरे राजनीतिक दल में जा सकता है। हां, इसके नियमन के लिए दल-बदल कानून बना हुआ है। तो क्या एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने को गद्दार कहा जा सकता है? नहीं, यह एक असंवैधानिक शब्द है और कम से कम संसद परिसर के अंदर इसके इस्तेमाल से बचना चाहिए।
राहुल गांधी अभी विपक्ष के नेता के तौर पर संसद में जिस तरह से सत्ता पक्ष पर आक्रामक होते हैं, विपक्ष के राजनीतिक दलों का एक तबका अगर उन्हें सदन में नेता का मान देता है तो इसलिए कि उन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में शक्ति हासिल की थी। यह सारा आकर्षण कांग्रेस की जीती 99 सीटों को लेकर है। लेकिन जम्मू कश्मीर के चुनाव से लेकर महाराष्ट्र के चुनाव के बाद उन्हीं लोगों ने राहुल गांधी की आलोचना की जो उन्हें राजनीतिक खेवनहार मान रहे थे। उमर अबदुल्ला ने स्पष्ट शब्दों में कांग्रेस की आलोचना करते हुए अपना राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट किया था।
शक्ति, वह भी राजनीतिक शक्ति बहुत क्षयशील होती है। इसमें लगातार इजाफा न किया जाए तो यह तेजी से घटती भी जाती है। कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति का क्षय इसलिए हुआ कि इसमें इजाफे की सभी कोशिशें बंद कर दी गई थी। जो लोग सिर्फ शक्ति के लिए कांग्रेस में थे, उनका यहां रहना मुश्किल हो चुका था। सत्य यह है कि कांग्रेस में अभी वे ही लोग हैं, जिन्हें आगे शक्ति हासिल करने की उम्मीद है।
वैसे राहुल गांधी को बिट्टू जैसे नेता का अहसानमंद होना चाहिए, जिन्होंने अपने हित को देखते हुए अपना अलग रास्ता तय कर लिया। कांग्रेस को असली खतरा उन लोगों से है जो पार्टी में रह कर भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। दक्षिण में कांग्रेस की जो शक्ति बची हुई है, वह इन लोगों के रहते और कितनी बची रह जाएगी कहना मुश्किल है। कर्नाटक में सिद्धरमैया और शिवकुमार गुट की कलह कांग्रेस को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचा चुकी है। केरल में निगम चुनावों में कांग्रेस की बढ़त देख कर शशि थरूर सोच रहे हैं कि विधानसभा चुनाव तक इंतजार कर ही लिया जाए। सवाल यह है कि इस सोच के साथ क्या थरूर कांग्रेस के साथ वफादारी कर रहे हैं?
कुछ समय पहले जब कांग्रेस छोड़ने वाले नेताओं की कतार लग गई थी तब राहुल गांधी ने इसे पार्टी की सफाई के तौर पर ही देखा था। राहुल गांधी को अभी भी इसी रुख पर कायम रहना चाहिए। जिन्हें शक्ति हासिल करने के लिए कांग्रेस की संगठनात्मक शक्ति बढ़ाने में रुचि नहीं है, उनके पार्टी में रहने का क्या फायदा हो सकता था?
यह कैमरा और इंटरनेट का समय है। एक असंवैधानिक बात कह कर आप उन सैकड़ों संवैधानिक बातों की लड़ाई को कमजोर कर देते हैं, जिसके लड़ने का आप दावा कर रहे हैं। यह संसद सत्र भी आपकी विपक्ष वाली शक्ति के नाम होना था, लेकिन संसद में असंसदीय बात कह आपने अपनी छवि कमजोर कर दी। लोकतांत्रिक ढांचे में राजनीतिक लड़ाई बहुत नाजुक होती है। एक गलत शब्द कह कर आप अपनी ही लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं। उम्मीद है आगे आप अपनी मजबूत लड़ाई में कमजोर शब्दों का प्रयोग नहीं करेंगे।
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