समुद्री जीवों पर चरम मौसम का प्रभाव गहरा और बहुआयामी होता है। जलवायु आपदाओं से जूझती प्रजातियों और समुद्र संरक्षण पर संयुक्त राष्ट्र की संधि महत्त्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में समुद्री जीवन की रक्षा करना है।
भारतीय समुद्री अनुसंधान के तहत विशेष आर्थिक क्षेत्र में गहरे समुद्र के जीवों की निगरानी की जा रही है। अर्जेंटीना में शैवालों के कारण प्रदूषण से समुद्री स्तनधारियों तक पहुंचते जहरीले पदार्थों को लेकर अध्ययन किए जा रहे हैं। अत्यधिक मछलियां पकड़ने से 37.7 फीसद मत्स्य भंडार प्रभावित हो रहे हैं।
शोध रपट बताती हैं कि 1970 के बाद से शार्क और अन्य प्रजातियों में 71 फीसद की गिरावट आई है। अब वैश्विक अभियान का लक्ष्य अगले दस वर्षों में एक लाख नई प्रजातियों का पता लगाना है। अभी चिंता की बात यह है कि शैवालों के कारण बढ़ते प्रदूषण से कई समुद्री प्रजातियां विलुप्त होती जा रही हैं।
गहरे समुद्र की 90 फीसद प्रजातियां आज भी अज्ञात
भारतीय समुद्री क्षेत्र में मार्च 2025 तक समुद्री जीवों की गणना के लिए चलाए अभियान के तहत 850 से अधिक नई समुद्री प्रजातियों की खोज की गई थी। तमिलनाडु तट पर ‘फिनलेस स्नेक ईल’ और बंगाल की खाड़ी में ‘सी स्लग’ जैसी नई प्रजातियां खोजी गई हैं। ये खोजें समुद्री जैव विविधता को समझने के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए नई प्रजातियों की खोज आवश्यक है, क्योंकि गहरे समुद्र की 90 फीसद प्रजातियां आज भी अज्ञात हैं।
तमिलनाडु के कोलाचेल तट पर ‘स्नेक ईल’ की नई प्रजाति खोजी गई है। इसी तरह बंगाल की खाड़ी के तट पर खोजी गई हेड शील्ड ‘सी स्लग’ की एक नई प्रजाति है। शोधकर्ताओं ने छह हजार मीटर से अधिक की समुद्री गहराई से ‘वेलरोपिलिना ग्रेटचेनाई’ नामक एक दुर्लभ घोंघा खोजा है। ये प्रजातियां समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को समझने और संरक्षण के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
समुद्री जैव विविधता पर ताजा अनुसंधान (2025-2026) जलवायु परिवर्तन, प्रजातियों के प्रवास और गहरे समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र पर केंद्रित है। गौरतलब है कि 2026 में लागू ऐतिहासिक समुद्री समझौता अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र की जैव विविधता की रक्षा करेगा। समुद्री जीवन की खोज को गति देते हुए महासागरीय जनगणना में 866 नई समुद्री प्रजातियों की पहचान की जा चुकी है।
दस फीसद समुद्री प्रजातियों का ही दस्तावेजीकरण किया जा सका
उल्लेखनीय है कि 71 फीसद क्षेत्रफल में फैला महासागर पृथ्वी पर जीवन का मूलभूत आधार है। इसकी विशाल जैव विविधता जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक है और यह लाखों लोगों के स्वास्थ्य, आजीविका और खाद्य सुरक्षा को बनाए रखने में मदद करती है। फिर भी, महासागर का अधिकांश भाग अनछुआ ही है और अब तक केवल लगभग दस फीसद समुद्री प्रजातियों का ही दस्तावेजीकरण किया जा सका है।
इसके रहस्यों को उजागर करना जैव विविधता की रक्षा, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करने और एक स्थायी भविष्य सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सामान्यत: किसी नई प्रजाति की आधिकारिक पहचान में एक दशक अथवा इससे अधिक समय भी लग जाता है।
समुद्री जीवन की पहचान में तेजी लाने के वास्ते सामाजिक नवाचार के लिए समर्पित कई गैर-लाभकारी संस्थाएं भी समुद्री विज्ञान को संरक्षित कर रही हैं। उन्हीं में से कुछ संस्थाएं एक अप्रैल 2023 से ‘महासागर-जनगणना’ में जुटी हैं। एक दशक में दस लाख नई प्रजातियों की पहचान करना उनका लक्ष्य है।
नई प्रजातियों की खोज के दौरान हिंद महासागर के पास कोकोस कीलिंग द्वीप समूह में 1175 से 1896 मीटर की गहराई में कई नई प्रजातियों की खोज की गई है। अल नीनो के कारण ‘जंबो स्क्वीड’ के प्रवास मार्गों और प्रजनन समय में बदलाव देखा गया है। ‘नेचर’ की रपट के अनुसार यह समुद्र के बढ़ते तापमान का सीधा असर है।
छोटे जीव बड़े जीवों का आधार
वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि समुद्री जीव-प्रजातियों से जुड़े आंकड़ों की तुलना से नई प्रजातियों की खोज तेज हो सकती है। कुछ वर्ष पहले जर्मनी के अनुसंधानकर्ताओं को छोटे जीवों की खोज के दौरान दो सौ से अधिक समुद्री प्रजातियों का पता चला। उनमें से दो दर्जन से ज्यादा नई प्रजातियां हैं। छोटे जीव इनका आहार होते हैं और बड़े जीवों इनको खा जाते हैं।
गौरतलब है कि ये समुद्र की सफाई भी करते हैं। समुद्र में नई प्रजातियों को पहचानना बेहद श्रमसाध्य कार्य है। एक जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया में नई प्रजातियों की पहचान की जाती है। यह अनुभव समुद्री प्राकृतिक संपदा की बेहतर पहचान को भी समृद्ध करता है।
जलवायु परिवर्तन और प्रवास के बीच गहरा संबंध है। इस समय पर्यावरण का दबाव दिख रहा है। समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, मरुस्थलीकरण और विनाशकारी मौसम कृषि को नष्ट कर रहे हैं। इससे जीव-जंतु भोजन की तलाश में मूल स्थानों से दूर अन्यत्र प्रवास करने लगे हैं। जलवायु परिवर्तन खास तौर से प्रवासी पक्षियों को प्रभावित कर रहा है, जिससे वे अनुकूल जलवायु की तलाश में अन्य स्थानों पर जा रहे हैं। प्रवासन का स्वरूप बदलने से कई क्षेत्रों, विशेषकर तटीय बसावटों में, सामाजिक और आर्थिक समस्याएं एक बड़ी वजह बन रही हैं।
जलवायु परिवर्तन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा
जलवायु परिवर्तन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है, जो महासागरों को गर्म, अधिक अम्लीय और आक्सीजन-रहित बना रहा है। इससे प्रवाल भित्तियां नष्ट हो रही हैं। मछलियों के प्रवास के मार्ग बदल रहे हैं और कई समुद्री प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। यह संपूर्ण समुद्री खाद्य शृृंखला और तटीय समुदायों को प्रभावित कर रहा है।
बढ़ता तापमान मूंगा भित्तियों को नष्ट कर रहा है जो समुद्री जैव विविधता के केंद्र हैं। गर्म पानी से बचने के लिए मछलियां और अन्य जीव ठंडे ध्रुवीय क्षेत्रों की ओर पलायन कर रहे हैं। गर्म पानी में आक्सीजन कम होती है, जिससे मछलियों और अन्य जीवों का दम घुट रहा है। महासागर द्वारा कार्बन डाइआक्साइड अवशोषित करने से पानी अम्लीय हो रहा है, जो शंख, घोंघे और अन्य कैल्शियम कार्बोनेट कवच वाले जीवों के खोल को गला रहा है।
तापमान में बदलाव के कारण मछलियों के प्रजनन का समय बदल रहा है, जिससे उनकी आबादी प्रभावित हो रही है। गर्म पानी में हानिकारक शैवाल तेजी से बढ़ते हैं जो समुद्री जीवों को विषैला बनाने के साथ उन्हें मार भी देते हैं। ये परिवर्तन समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के नाजुक संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। पूरे समुद्री क्षेत्र में स्थानीय प्रजातियों के विलुप्त होने का जोखिम गहराता जा रहा है।
इसीलिए नई समुद्री प्रजातियों की खोजबीन पर पूरी दुनिया में कई अनुसंधान चल रहे हैं। सैली चिशोल्म और उनकी टीम ने वर्ष 1988 में एक नए सूक्ष्म समुद्री जीव ‘प्रोक्लोरोकाकस’ की खोज की थी, जो पृथ्वी पर आक्सीजन बनाने और पर्यावरण संतुलन में अहम भूमिका निभाता है। जर्मनी के शोधकर्ताओं का दल विलुप्त होते समुद्री केंचुओं की खोज कर रहा है।
पोलैंड की प्रोफेसर आन्ना याजदेवस्का ने छोटे झींगों जैसी दर्जनों नई प्रजातियां ढूंढ़ निकाली हैं। दुर्लभ धातुओं से भरे-पूरे प्रशांत महासागर की करीब साढ़े चार हजार मीटर की गहराई में लगभग 24 नए छोटे झींगे मिले हैं। जलवायु आपदा और आक्रामक प्रजातियां बढ़ने से कम अनुसंधानित समुद्री प्रजातियां विलुप्तप्राय हो चली हैं, जिनमें समुद्री केंचुए भी हैं। ये केंचुए समुद्र की पारिस्थितिकी में अहम भूमिका निभाते हैं।
