बहुत दिनों बाद दिल्ली आना हुआ पिछले सप्ताह। सीधे जंतर-मंतर गई। दोपहर का समय था और धूप इतनी तेज कि बिना सिर ढके खड़ा होना मुश्किल था। गाड़ी को थोड़ी दूर खड़ी करके मैं पैदल चली। दोनों तरफ गाड़ियां लगी हुई थीं और प्रदर्शनकारियों को देखने से पहले दिखे पुलिसवाले इतने सारे कि जैसे जमा होते हैं तब, जब गड़बड़ी होने की आशंका रहती है। मेटल डिटेक्टर से जब गुजरी, तो देखा कि सड़क के दोनों तरफ प्लास्टिक की बोतलें और अलग किस्म का कूड़ा पड़ा हुआ था। थोड़ा आगे गई, तो देखा कि वामपंथी दलों के विद्यार्थी संगठनों के कार्यकर्ता बैठे हुए थे।

थोड़ा और आगे गई, तो देखा कि मंच के सामने एक आदमी भाषण दे रहा था उस किस्म का जैसे मामूली कार्यकर्ता देते हैं नेताओं के मंच पर आने से पहले। मंच पर काकरोच जनता पार्टी के कुछ नेता बैठे हुए थे, लेकिन अभिजीत दिपके नहीं दिखे। यह सोच ही रही थी कि मेरे साथ खड़े हुए एक आदमी ने कहा कि ‘वे आ रहे हैं’। ‘वे’ दिपके थे जो अति-विनम्रता से सब लोगों के हाथ पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे, जैसे उनको धन्यवाद कहना चाह रहे हों। मुझ तक पहुंचे, तो मैंने नमस्ते करना चाहा, लेकिन उन्होंने हाथ मिलाया। उनके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट थी और थोड़ा आश्चर्य, तो मैंने उनको कहा कि मैं एक पत्रकार हूं।

दिपके आगे बढ़े, तो मेरे बगल में खड़े एक आदमी ने कहा, ‘मुझे मालूम था कि आप पत्रकार हैं।’ यह आदमी कोई चालीस साल का था। मैंने उससे पूछा कि वह कहां से आया है और किस वास्ते, तो उसका जवाब यह था, ‘मैं नोएडा में रहता हूं और जबसे यह प्रदर्शन शुरू हुआ है, मैं यहां रोज आता हूं समर्थन जताने। ये लोग अच्छा कर रहे हैं देश के लिए।’

इतने में मुझे दो-तीन नौजवान दिखे, जिन्होंने बताया कि वे आजमगढ़ से आए हैं समर्थन जताने इसलिए कि उनके कुछ दोस्त हैं जो पर्चा लीक होने के शिकार रहे हैं। आसपास कोई इतनी भीड़ नहीं थी, लेकिन जो लोग मिले, वे सब अपनी मर्जी से आए थे किसी राजनीतिक दल के कहने पर नहीं आए थे।

यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि मैं सोनम वांगचुक की इज्जत करती हूं और उनको राष्ट्रविरोधी बिल्कुल नहीं मानती हूं, लेकिन उनके आमरण अनशन से सहमत नहीं हूं। इस किस्म के सत्याग्रह मुझे पसंद नहीं हैं। मैं मानती हूं कि ऐसे आमरण अनशन से सरकार पर दबाव डालना गलत है और बेमतलब भी। मगर जिस वजह से काकरोच जनता पार्टी बनी है, उसका मैं दिल से समर्थन करती हूं।

जब जनता के चुने हुए जनसेवक बहरे हो जाते हैं, तो उन तक अपनी आवाज को पहुंचाना मुश्किल होता है। काकरोच जनता पार्टी पैदा हुई है अपनी आवाज बुलंद करने के लिए, ताकि कभी न कभी प्रधानमंत्री के दफ्तर तक संदेश पहुंचे कि शिक्षा क्षेत्र में जो खराबी आई है, उसकी जवाबदेही शिक्षा मंत्री की है। कुछ और नहीं कर सकते हैं, तो कम से कम इस्तीफा तो दे सकते हैं।

संयोग से पिछले सप्ताह यही बात एक मोदी भक्त से कहने का मुझे अवसर मिला। यह व्यक्ति न पत्रकार है न राजनीतिक, लेकिन दिल्ली के ऊंचे गलियारों में घूमता है, इसलिए जानता है अच्छी तरह कि उनमें चर्चा क्या हो रही है। मैंने जब धर्मेंद्र प्रधान की जवाबदेही का उससे जिक्र किया, तो उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रधानमंत्री का पक्का इरादा था अपने चहेते मंत्री को बर्खास्त करने का, लेकिन जब काकरोच जनता पार्टी ने अपना प्रदर्शन शुरू किया, तो इस काम को उन्हें रोकना पड़ा इसलिए कि भारत के प्रधानमंत्री को कभी दबाव पड़ने की वजह से फैसले नहीं लेने चाहिए।

इस व्यक्ति ने मुझे कहा कि इस नई पार्टी के तमाम नेता आम आदमी पार्टी से निकल कर आए हैं और अरविंद केजरीवाल का आशीर्वाद लेकर अपना काम कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी के कई नेता दिखे भी हैं मंच पर, इसलिए इसमें कोई शक नहीं है कि ‘आप’ से प्रेरणा लेकर प्रदर्शनकारी आगे बढ़ रहे हैं। यह बात उनके खिलाफ रही है अभी से। केजरीवाल की छवि इतनी बिगड़ी हुई है कि जब भी किसी को लगता है कि उनके कहने पर कुछ हो रहा है, तो लोग फौरन अपना समर्थन वापस ले लेते हैं।

केजरीवाल को पहली बार मैंने देखा था अस्सी घाट पर। बटवृक्ष के नीचे बैठे हुए 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान। ये वे दिन थे, जब उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देकर नरेंद्र मोदी को चुनौती देने का गलत निर्णय लिया था। मुझे उस वक्त से लगा था कि आम आदमी के चोले के नीचे यह एक ऐसा व्यक्ति है जो अपने आपको इतना खास समझता है कि मुख्यमंत्री बनते ही प्रधानमंत्री बन जाने के सपने देखने लग गया है।

काकरोच जनता पार्टी अगर बनना चाहती है देश के नौजवानों की आवाज, तो उसको विनम्रता से मेरा सुझाव यह है कि केजरीवाल से दूर रहें और वामपंथी राजनेताओं तथा राजनीतिक दलों से भी। ये ऐसे लोग हैं जिनकी आवाज फीकी पड़ चुकी है। आम लोग जान गए हैं कि ये लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन जमीन पर उनका काम इतना बेकार साबित हुआ है कि आम लोगों का इनमें अब कोई विश्वास नहीं रहा। नौजवानों को नए नेता ढूंढ़ने होंगे अगर वास्तव में वह देश में बदलाव लाना चाहते हैं। समस्या सिर्फ शिक्षा क्षेत्र में नहीं है, हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार इतना फैला हुआ है आज कि मोदी सरकार में भी भरोसा कम होने लग गया है। असली परिवर्तन के लिए नए लोग चाहिए। नई सोच चाहिए।