वैश्विक प्रगति की दौड़ में, जहां मानव सभ्यता सतत विकास को आत्मसात करने का प्रयास कर रही है, वहीं जलवायु परिवर्तन एक अदृश्य, लेकिन दुर्जेय अवरोध के रूप में उभरा है। आज के विश्व में संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में निहित आर्थिक समृद्धि, सामाजिक समानता और पर्यावरणीय संतुलन के त्रिविमीय उद्देश्य बाढ़, सूखा और प्राकृतिक आपदाओं की भंवर में उलझ जाते हैं।
जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय आपदा नहीं, बल्कि बहुआयामी चुनौती है। यह आर्थिक असमानता को गहरा रही है और सामाजिक स्थिरता को संकट में डाल रही है। यह संकट केवल मौसमी अनियमितताओं तक सीमित नहीं है। यह प्रणालीगत विफलता का भी द्योतक है।
हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदों के तेजी से पिघलने से जल संसाधनों का संकट बढ़ रहा है। यह स्थिति भारत की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगी, जहां साठ फीसद से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रपट चेतावनी देती है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाती है, तो सतत विकास लक्ष्य जैसे- सबको भोजन, स्वच्छ जल, आर्थिक समानता, जलवायु कार्रवाई जैसे लक्ष्य असाध्य हो जाएंगे।
इन लक्ष्यों को प्राप्त करने की अवधि वर्ष 2030 निर्धारित है। वैश्विक लक्ष्यों में गरीबी खत्म करना, पर्यावरण की रक्षा, नवाचार, टिकाऊ उपभोग, आर्थिक असमानता को कम करना और सभी के लिए शांति और न्याय सुनिश्चित करना शामिल है। जबकि ऊर्जा संसाधनों पर एकाधिकार के लिए हो रहे युद्ध इस बात का संकेत है कि सतत विकास और समावेशी समाज के निर्माण का संयुक्त राष्ट्र का स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा। पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष न केवल रणनीतिक नुकसान है, बल्कि यह एक बड़ा पर्यावरणीय संकट है। इसके प्रतिकूल परिणाम दीर्घकालिक होंगे।
ब्रिटेन स्थित पर्यावरणीय शोध संस्था ‘कन्फ्लिक्ट एंड एन्वायरनमेंट आब्जर्वेटरी’ ने युद्ध के दौरान तीन सौ से अधिक जगहों को चिह्नित किया है, जहां पर्यावरण को गंभीर नुकसान हुआ है। ईरान की तेल रिफाइनरियों पर हुए हमलों से हजारों टन तेल समुद्र में पहुंच रहा है, जो समुद्री जीवों के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर रहा है। विस्फोट से विषैला धुआं श्वास रोग को बढ़ावा दे रहा है।
इतना ही नहीं, ऊर्जा, खाद्य संकट, गरीबी और महंगाई विकासशील राष्ट्रों के लिए विशेष रूप से जटिल समस्या है। जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट की समस्या पहले से बढ़ रही है। खाद्य संकट पर एक वैश्विक रपट के अनुसार 53 देशों में 29 करोड़ पचास लाख से अधिक लोग गंभीर भुखमरी से प्रभावित हैं। भारत सहित विकासशील देशों में कृषि पर वर्षा और मौसम का गहरा असर देखने को मिलता है। यहां के किसानों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। यह समस्या करीबन हर साल सामने आती है।
दूसरी ओर कहा जा रहा है कि गेहूं और धान जैसी प्रमुख फसलों की कुल उपज में छह से 25 फीसद और धान में तीन से 15 फीसद तक कमी आ सकती है। अनियमित मानसून, सूखा और बाढ़ कृषि उत्पादन को अस्थिर कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट भी बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रपट से पता चला है कि वर्तमान समय में हर दूसरा व्यक्ति जल संकट की समस्या से जूझ रहा है।
विश्व बैंक ने अपने एक अध्ययन में अनुमान लगाया है कि स्वच्छ जल की कमी से प्रत्येक वर्ष 260 अरब डालर का नुकसान होता है। स्थिति गंभीर है क्योंकि अब दुनिया को आगाह किया जा रहा है कि जल संकट से जूझ रहे देशों को वर्ष 2050 तक आर्थिक विकास में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन से उपजा आर्थिक संकट बड़ी चुनौती है। एक शोध में कहा गया है कि 2060 तक वैश्विक स्तर पर 3.75 ट्रिलियन डालर का नुकसान हो सकता है। दुनिया भर के देशों में जलवायु परिवर्तन और युद्ध के कारण सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट दर्ज किया गया है। भारत भी जलवायु परिवर्तन का खमियाजा भुगत रहा है।
वर्ष 2022 में जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के सकल घरेलू उत्पाद में आठ फीसद का नुकसान हुआ। मानव जनित जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले वर्ष वैश्विक आर्थिक उत्पादन में लगभग 6.3 फीसद की कमी दर्ज की गई है। एशिया-प्रशांत के देशों में 2050 तक कुल सकल घरेलू उत्पाद का 2.6 फीसद नुकसान होने की संभावनाएं जताई गई हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अफ्रीका के देशों में क्रमश: 14.1 और 11.2 फीसद कुल सकल घरेलू उत्पाद का नुकसान हो सकता है।
युद्ध और जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के लिए घातक है। एक तथ्य यह भी है कि वैश्विक स्तर पर हर दो सेकंड में एक नवजात का जन्म समय से पहले हो रहा है, वहीं हर 40 सेकंड में इनमें से एक शिशु की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान मुताबिक वर्ष 2030-2050 के बीच जलवायु परिवर्तन से हर साल 2.5 लाख मौतें होंगी। वायु प्रदूषण से पूरी दुनिया में स्वास्थ्य संकट गहरा रहा है। युद्ध और जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया में गरीबी, आय की असमानता और खाद्यान्न संकट के साथ भुखमरी जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।
आय में लगातार बढ़ती असमानता और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की वजह से दुनिया में करीब तीन अरब आबादी पोषक आहार से दूर हो जाएगी, जिससे कई देशों में कुपोषण जैसी समस्याएं बढ़ेंगी। इससे पूरी दुनिया के सामने एक गंभीर चुनौती पैदा होगी, जिससे निपटना ज्यादातर देशों के लिए आसान नहीं होगा।
जलवायु परिवर्तन, गरीबी, असमानता, स्वच्छ ऊर्जा, और पर्यावरण संरक्षण जैसे मुद्दे किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं, लेकिन अब यह स्पष्ट है कि कुछ देशों के बीच युद्ध के कारण पूरी दुनिया में मानवता खतरे में है। इसी के साथ पशु-पक्षियों का जीवन भी संकट में है। पर्यावरण हितैषी मूक जीवों की चिंता इस समय किसी को नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध और मानवता के लिए बनाए गए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय नियम सिर्फ कमजोर देशों के लिए बने हैं।
जिनेवा सम्मेलन ने पर्यावरणीय नुकसान को युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा है। यह अचरज की बात है कि संयुक्त राष्ट्र और रेडक्रास जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं महाशक्तियों के आगे मौन हैं। युद्ध जैसी घातक विपदा खत्म होने के बाद भी पर्यावरणीय घाव लंबे समय तक बने रहते हैं। वैसे तो सतत विकास के लक्ष्य वैश्विक हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना इन लक्ष्यों को प्राप्त करना संभव नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से विकासशील देशों को वित्तीय सहायता, तकनीकी ज्ञान और नीतिगत मार्गदर्शन प्रदान करना जरूरी है। मगर विकसित देश इसमें रुचि नहीं लेते। युद्ध और जलवायु परिवर्तन की बढ़ती घटनाओं को ध्यान में रखते हुए मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सभी देशों को एक मंच पर आना होगा। यह केवल पर्यावरणीय चिंता का विषय नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी इससे खतरा है। इस संकट से निपटने के लिए हर स्तर पर समन्वित प्रयास आवश्यक है।
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युद्ध के धुएं में गुम पर्यावरण के प्रश्न प्रीति अज्ञात आज के दौर में पर्यावरण की चर्चा इतनी व्यापक हो गई है कि इससे जुड़े शब्दों का एक अंतहीन जंगल बन गया है, जिसमें हर रास्ता पृथ्वी की चिंता तक ले जाता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन, जैव विविधता और सतत विकास जैसे शब्द बार-बार गूंजते हैं। सम्मेलनों में पृथ्वी को बचाने के संकल्प लिए जाते हैं, भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित ग्रह की कल्पना की जाती है और यह घोषणा की जाती है कि पर्यावरण संकट मानव सभ्यता के सामने सबसे बड़ा खतरा है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
