किसी भी अर्थव्यवस्था की सबसे मूल्यवान पूंजी केवल धन, प्राकृतिक संसाधन या बुनियादी ढांचा नहीं होती। उससे भी अधिक मूल्यवान संसाधन उसके नागरिकों का समय होता है। धन की भरपाई की जा सकती है, खोया हुआ समय कभी वापस नहीं आता। इसके बावजूद भारत में सार्वजनिक नीति पर होने वाली बहसों में नागरिकों के समय की आर्थिक कीमत शायद ही कभी चर्चा का विषय बनती है। सरकारी अस्पतालों की कतारें, प्रशासनिक कार्यालयों के अंतहीन चक्कर, सार्वजनिक परिवहन का अनिश्चित इंतजार और साधारण सरकारी सेवाओं के लिए घंटों की प्रतीक्षा हमारे दैनिक जीवन का सामान्य अनुभव बन चुके हैं। इस सामान्यीकरण ने एक गहरी आर्थिक समस्या को लगभग अदृश्य बना दिया है।
अर्थशास्त्री गैरी बेकर के मुताबिक, प्रत्येक घंटे की अपनी अवसर लागत होती है। अगर करोड़ों नागरिक प्रतिदिन कार्यस्थल, व्यवसाय, शिक्षा या घरेलू उत्पादक गतिविधियों से समय निकालकर केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं में व्यस्त रहते हैं, तो अर्थव्यवस्था प्रतिदिन लाखों उत्पादक श्रम-घंटे खो देती है। इस क्षति का उल्लेख न तो बजट दस्तावेजों में मिलता है और न ही आर्थिक विकास के आंकड़ों में, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक और स्थायी होता है।
अर्थशास्त्र में पूंजी के निष्क्रिय पड़े रहने को अक्षमता माना जाता है। यही सिद्धांत नागरिकों के समय पर भी लागू होता है। जिस प्रकार बंद पड़ा कारखाना उत्पादन घटाता है, उसी प्रकार अनावश्यक प्रतीक्षा में फंसे करोड़ों लोग राष्ट्रीय उत्पादकता को कम करते हैं। दिहाड़ी मजदूर की एक दिन की आय समाप्त हो जाती है। छोटा व्यापारी अपनी दुकान देर से खोलता है। स्वरोजगार करने वाला व्यक्ति ग्राहकों से दूर रहता है। वेतनभोगी कर्मचारी अवकाश लेने को विवश होता है। विद्यार्थी पढ़ाई का समय खो देते हैं। प्रतीक्षा का आर्थिक प्रभाव व्यक्तिगत स्तर से आगे बढ़कर श्रम बाजार और राष्ट्रीय आय तक पहुंचता है। प्रतीक्षा सामाजिक असमानता का भी एक स्वरूप है। आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति निजी अस्पताल, भुगतान आधारित सेवाएं, पेशेवर एजंट या डिजिटल सहायता के माध्यम से समय खरीद लेते हैं। सीमित आय वाले परिवारों के पास यह विकल्प नहीं होता। गरीब परिवारों के लिए समय दुर्लभ संपत्ति है। जीविका और सरकारी सेवाओं के बीच संतुलन बनाना उनके लिए निरंतर संघर्ष का विषय रहता है। इसी कारण कई विद्वान प्रतीक्षा को ‘टाइम टैक्स’ कहते हैं। इसका भुगतान सबसे अधिक वही लोग करते हैं, जिनकी आय सबसे कम होती है।
इसका एक लैंगिक आयाम भी है। परिवार के बच्चों, बुजुर्गों और बीमार सदस्यों को अस्पताल, राशन की दुकान या सरकारी कार्यालय ले जाने की जिम्मेदारी प्राय: महिलाओं पर आती है। प्रतीक्षा का प्रत्येक अतिरिक्त घंटा उनके अवैतनिक देखभाल कार्य को बढ़ाता है। परिणामस्वरूप शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार और औपचारिक श्रम बाजार में उनकी भागीदारी प्रभावित होती है। समय का असमान वितरण आर्थिक असमानता को और गहरा कर देता है।
व्यावहारिक अर्थशास्त्र इस समस्या को एक अलग दृष्टि से देखता है। लोग केवल उपलब्ध सेवाओं के आधार पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि उस प्रक्रिया की अनुमानित कठिनाई को भी ध्यान में रखते हैं। अगर किसी व्यक्ति को विश्वास हो जाए कि सरकारी अस्पताल में पूरा दिन लग जाएगा, तो वह उपचार टाल सकता है। किसी सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ लेने के लिए अनेक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, तो पात्र नागरिक भी आवेदन करने से बच सकते हैं। इस तरह प्रतीक्षा सरकारी नीतियों की प्रभावशीलता को भी सीमित कर देती है।
यह प्रश्न लोकतांत्रिक शासन की गुणवत्ता से भी जुड़ा है। नागरिक जब बार-बार अस्पष्ट प्रक्रियाओं और प्रशासनिक विलंब का सामना करते हैं, तब सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति उनका विश्वास धीरे-धीरे कम होने लगता है। सार्वजनिक विश्वास किसी भी अर्थव्यवस्था की अदृश्य पूंजी होता है। संस्थाओं पर भरोसा जितना अधिक होता है, नीतियों का अनुपालन उतना सहज होता है और शासन की लागत भी उतनी कम रहती है।
एस्टोनिया, सिंगापुर इत्यादि देशों में प्रशासनिक सफलता का एक महत्त्वपूर्ण पैमाना यह है कि किसी व्यक्ति को अपना वैध कार्य पूरा करने में कितनी कम ऊर्जा और कितना कम समय व्यय करना पड़ता है। भारत को भी समय को सार्वजनिक संसाधन के रूप में स्वीकार करना होगा। आर्थिक प्रगति की चर्चा तब तक अधूरी रहेगी, जब तक नागरिकों के समय को भी राष्ट्रीय संपदा के रूप में महत्त्व नहीं दिया जाएगा।
