सुपर कंप्यूटर केवल वैज्ञानिक उपकरण नहीं हैं, बल्कि किसी भी देश की तकनीकी संप्रभुता, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और सामरिक शक्ति के महत्त्वपूर्ण सूचक हैं। दुनिया के सबसे शक्तिशाली सुपर कंप्यूटरों की प्रतिष्ठित सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त करना केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि वैश्विक तकनीकी नेतृत्व का प्रतीक भी है। विडंबना यह है कि जिस समय हमारी जेब में रखा स्मार्टफोन कुछ दशक पहले के सुपर कंप्यूटरों से भी अधिक सक्षम हो चुका है, उसी दौर में आधुनिक सुपर कंप्यूटर की उपलब्धियां आम जन की चर्चा से लगभग गायब हैं। हाल ही में जब चीन के सुपर कंप्यूटर ‘लाइनशाइन’ ने अमेरिका के ‘एल कैपिटन’ को पीछे छोड़ते हुए इस सूची में पहला स्थान हासिल किया, तब भी भारत में इस महत्त्वपूर्ण घटना पर अपेक्षित चर्चा नहीं हुई। यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि वर्ष 2017 के बाद पहली बार चीन को दुनिया का सबसे तेज सुपर कंप्यूटर बनाने का तगमा मिला है।
इस लिहाज से भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। नवीनतम टॉप-500 की सूची में भारत का सुपर कंप्यूटर ऐरावत-पीएसएआई 188वें स्थान पर है। ऐसे में सवाल केवल क्रम स्थान का नहीं, बल्कि इस बात का है कि भविष्य की एआई-आधारित अर्थव्यवस्था और वैज्ञानिक प्रतिस्पर्धा में भारत अपनी क्षमता को किस गति से विकसित कर पाएगा। सुपर कंप्यूटर की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले शीर्ष सूची पर नजर डालने से पता चलता है कि इसमें शुरुआती दस में से चार अमेरिका के तथा जर्मनी, जापान, स्विट्जरलैंड, फिनलैंड और इटली के एक-एक सुपर कंप्यूटर शामिल हैं। इनमें अब पहले नंबर पर चीन का ‘लाइनशाइन’ है।
इन उपलब्धियों के बीच भारत की सुपर कंप्यूटिंग की तस्वीर थोड़ी निराश करती है। टॉप-500 की सूची में ऐरावत-पीएसएआई 188वें, अर्क सुपर कंप्यूटर 196वें, अरुणिका 251वें, प्रत्यूष 338वें और अर्क एआई-एमएल 469वें स्थान पर हैं। हालांकि अब उम्मीद वर्ष 2024 से जारी की गई नई श्रृंखला के सुपर कंप्यूटरों यानी ‘परम-रुद्र’ से जगी है, जो देश के अलग-अलग विज्ञान केंद्रों में तैनात किए गए हैं। मगर यह सच है कि सुपर कंप्यूटिंग के करिश्मे की अब कोई ज्यादा चर्चा नहीं कर रहा है और न ही कहीं इसकी ज्यादा फिक्र दिखाई दे रही है।
विज्ञान जगत से बाहर सुपर कंप्यूटिंग की हलचलों पर कम ध्यान दिए जाने के संभवतः दो कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि आज की दुनिया में इतने ज्यादा तकनीकी करिश्मे हो रहे हैं कि कोई बड़ा तहलका होने तक किसी बड़े बदलाव को भी सामान्य माना जाता है। दूसरा कारण यह है कि अब पूरी दुनिया में सेमीकंडक्टर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में तेजी से काम होने के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में सुपर कंप्यूटरों से संबंधित नए घटनाक्रम की अपेक्षित चर्चा नहीं हो रही है।
मगर सुपर कंप्यूटरों की भूमिका को देखते हुए कहना होगा कि किसी भी तकनीकी उन्नति का आज भी ये अहम आधार हैं। इसलिए चीनी सुपर कंप्यूटर की खबर यह जानने का अवसर पैदा करती है कि आखिर इस समय सुपर कंप्यूटिंग में भारत कहां पर है। हमारे देश में सुपर कंप्यूटर की कोई चर्चा अक्सर इस संदर्भ के साथ शुरू होती है कि एक जमाने में अमेरिका ने हमें मौसम की भविष्यवाणी करने के उद्देश्य से इस्तेमाल में लाए जाने वाले सुपर कंप्यूटर को देने से इनकार कर दिया था।
नब्बे के दशक में भारत पर लगाई गई इस पाबंदी का नतीजा यह निकला कि सरकार के निर्देश पर सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक), पुणे के वैज्ञानिकों ने वर्ष 1991 में ‘परम 8000’ नामक पहला सुपर कंप्यूटर बना दिया। उस समय भारत विश्व का तीसरा और एशिया का दूसरा ऐसा देश था, जिसने सुपर कंप्यूटर बनाने में सफलता हासिल की थी। इसके बाद सुपर कंप्यूटिंग के क्षेत्र में भारत चरणबद्ध रूप से बढ़ा, जिसकी एक उपलब्धि ‘परम रुद्र’ नामक तीन नए सुपर कंप्यूटरों का विकास है।
इस श्रेणी के तीन सुपर कंप्यूटरों में से पहला सुपर कंप्यूटर पुणे स्थित जायंट मीटरवेव रेडियो टेलीस्कोप (जीएमआरटी) में लगाया गया है। वहां यह सुपर कंप्यूटर खगोलीय संकेतों को समझने और विशेष रूप से ‘फास्ट रेडियो बर्स्ट’ (रेडियो संकेतों) को पकड़ने के लिए आंकड़ों को तेजी से जुटाने में अपनी भूमिका निभाएगा।
दूसरे ‘परम रुद्र’ की स्थापना दिल्ली स्थित इंटर यूनिवर्सिटी एक्सेलेरेटर सेंटर (आईयूएसी) में की गई। यहां इसकी भूमिका पदार्थ विज्ञान और परमाणु भौतिकी के क्षेत्र में अनुसंधान की गति में तेजी लाने में योगदान देना है। कोलकाता के एस.एन. बोस सेंटर में लगाए गए तीसरे ‘परम रुद्र’ सुपर कंप्यूटर की मदद से भौतिकी, अंतरिक्ष विज्ञान और पृथ्वी की संचालन संबंधी गतिविधियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा। इन तीनों में से दिल्ली स्थित आईयूएसी में स्थापित सुपर कंप्यूटर की क्षमता सबसे ज्यादा है।
अब सुपर कंप्यूटरों की जो शीर्ष सूची हर साल तैयार होती है, उसमें प्रायः अमेरिका और चीन के सुपर कंप्यूटर अव्वल आते हैं। जबकि खुद को कंप्यूटिंग का पुरोधा कहने वाला भारत इस मामले में काफी पिछड़ा हुआ है।
सवाल है कि क्या हमने हार मान ली है और सुपर कंप्यूटिंग के मैदान को दूसरों के लिए खाली छोड़ दिया है। यदि नहीं, तो आखिर इस क्षेत्र में पिछड़ने का कारण क्या है? असल में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में यह बात काफी मायने रखती है कि किसी देश में इससे जुड़ी परियोजनाओं और शोधकार्यों की शुरुआत कब से की गई है।
भारत ने पहला सुपर कंप्यूटर ‘परम 8000’ बनाने की तरफ तब कदम बढ़ाए थे, जब अमेरिका ने सुपर कंप्यूटर देने से इनकार कर दिया था। इस दिशा में दूसरी बड़ी पहल वर्ष 2015 में हुई, जब राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस प्लान 2.0 (एनईजीपी) के अंतर्गत हर किस्म की सरकारी सेवाओं को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के मंच पर ले आने की योजना लागू की गई। इसका उद्देश्य आम जनता को शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य और साइबर सुरक्षा समेत कई अन्य क्षेत्रों की सेवाएं घर बैठे उपलब्ध कराना है।
इस महाभियान की सफलता चूंकि कंप्यूटिंग के अत्याधुनिक इंतजामों से जुड़ी है, लिहाजा सरकार ने 4500 करोड़ रुपये की लागत से देश में 73 सुपर कंप्यूटर बनाने का फैसला भी किया था। कह सकते हैं कि ‘परम रुद्र’ नामक तीन नए सुपर कंप्यूटरों की स्थापना इसी सिलसिले की एक अहम कड़ी है। इससे सुपर कंप्यूटिंग में भारत की हैसियत में सुधार तो होगा, लेकिन यह गति अभी बहुत धीमी है।
चिंता इस बात की है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे नए क्षेत्रों की भावी जरूरतों के लिए हमें सुपर कंप्यूटरों के मामले में एक बार फिर पश्चिमी मुल्कों का मोहताज न बनना पड़े। खुली बाजार व्यवस्था में हम अपनी जरूरत के मुताबिक अधिक क्षमता वाला कोई सुपर कंप्यूटर कहीं से भी हासिल कर सकते हैं, पर सुपर कंप्यूटिंग के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का एक अर्थ यह है कि हमारे देश में प्रगति की तस्वीर बदलने और रुख को अपने पक्ष में मोड़ने की क्षमता है। इसलिए इस मोर्चे पर उसी तरह ध्यान देने की जरूरत है, जैसे आजकल सेमीकंडक्टर और कृत्रिम मेधा पर दिया जा रहा है।
