जब बच्ची दो साल की हो जाए और चलना शुरू कर दे, तो आमतौर पर उसकी उत्सुकता घर से बाहर निकलने की होती है। दरवाजा खुलते ही वह बाहर की दुनिया को जान लेना चाहती है। मां-पिता उसकी सुरक्षा या उससे प्यार, वजह कोई भी हो, चाहते हैं कि उसके सिर कोई अनजान जोखिम न आए। मगर बच्ची के दिमाग में जो चल रहा होता है, वह अपने आप ही दरवाजे के बाहर निकलने और समझने की कोशिश शुरू कर देती है। हालांकि घर से बाहर निकलते ही उसका सामना सामने खड़ी मोटर साइकिलों से होता है। उसका चलना अभी दुनिया को जानने का नया अनुभव होता है। उसके चलने की जगहों में आमतौर पर मां या पिता साथ होते हैं। मां या पिता का साथ एक तरह से बच्ची पर निगरानी की शक्ल में होता है, जिसे खयाल रखने या फिक्र करने के तौर पर जाना जाता है।
शहर में सभी नागरिकों को चलने के लिए खुली गलियां नसीब नहीं होती। शहर की संरचना में एक तयशुदा ढांचे में ऊपर से नीचे का क्रम है। किसी के चलने के लिए खुली गलियां है और किसी के लिए तंग गालियां। मगर इस सवाल पर सोचने वाला पिता भी उन्हीं तंग गलियों में बच्ची का हाथ पकड़े और कभी उसे अपने कंधों पर लिए रास्ते नापता रहता है।
जब हम घर से बाहर जाते हैं, तो हमें आम इंसानों के अलावा दो-तीन तरह के जीव ही देखने को मिलते है। इनमें कुत्ते, गाय और कबूतर जैसे जीव शामिल हैं। कभी-कभी इस सूची में बंदर, गिलहरी और छिपकली भी शामिल हो जाते हैं। यानी बच्ची के घर से बाहर की दुनिया के शुरुआती यथार्थ अनुभव में चारों तरफ कंक्रीट की संरचनाएं और मशीनें होती हैं तथा कुछ जीव देखने को मिलते हैं। थोड़ा और बाहर जाने पर इस दुनिया में सड़क पर भागती-दौड़ती और हार्न बजाती गाड़ियों की दुनिया भी शामिल हो जाती है।
सच यह है कि हमारे शहर के व्यस्त और तंग इलाके एक बच्चे के सीखने और जानने के शुरुआती कर्म में किस तरह एक नीरस अनुभव के रूप में शामिल हो रहे हैं। इस नीरसता को तोड़ने और उसकी दुनिया को विस्तार देने के लिए एक पिता को अपनी बेटी को शहर में दूर एक पार्क में ले जाना पड़ता है। वहां वह घास को छूकर देखती है, पेड़-पौधों को देखती है और कीट पतंगों के पीछे भागती है। हालांकि ऐसा वह घर पर भी करती है। इस प्रक्रिया में चीजों को छूकर, देखकर और टटोलकर प्रकृति के साथ अपने अनुभव संसार का विस्तार करती है। मगर उसके इस अनुभव संसार में सिर्फ वस्तुएं नहीं होतीं, बल्कि एक जीवंत संसार होता है। रवींद्रनाथ ठाकुर बच्चे के जिस स्वतंत्र अनुभव की बात करते हैं, उसका माध्यम प्रकृति से प्रत्यक्ष जुड़ाव है, जिसमें ज्ञान रटाए जाने की अपेक्षा स्वतंत्र और प्रत्यक्ष अनुभव से जुड़ा है।
एक सवाल जो बार-बार किसी के मन में आ सकता है कि बच्चे प्रकृति और उसमें खेलने के रोमांच से वंचित क्यों हैं? जबकि बचपन की दुनिया में प्रकृति और खेल महत्त्वपूर्ण होते हैं। बच्चे की सीखने-जानने की दुनिया से प्रकृति और खेल का अटूट रिश्ता होता है। बच्चे अपनी प्रकृति को देखकर और उस माहौल में खेलकर स्फूर्ति का अहसास करते हैं और उनके सीखने के अनुभव गहरे और अटूट होते हैं। बंद कमरे और तंग गलियों की जगह प्रकृति खुली किताब की तरह होती है।
खुले प्राकृतिक वातावरण में एक बच्ची कीट-पतंगों के पीछे दौड़कर, भागकर, चीजों को छूते हुए, मिट्टी और घास पर गिरते और उठते हुए इन सबको महसूस करती है। प्रकृति और खेल के साथ उसका यह जुड़ाव सिर्फ मनोरंजन का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह इन गतिविधियों के माध्यम से अपने शरीर, अपने आसपास के वातावरण और दूसरे जीवों के साथ मनुष्य के संबंध को जानती और समझती है। यह बच्चों के समाजीकरण की प्रक्रिया के बुनियादी अंगों में से एक है।
अफसोस कि विकास की जिस परिभाषा के चलते शहरों की संरचनाएं खड़ी हुई हैं और उसके फलस्वरूप उनमें जिस तरह की असमानताएं मौजूद हैं, उसमें बच्चे के सीखने की दुनिया लगातार सिकुड़ती नजर आती है। विकास की इस प्रचलित परिभाषा में सड़कों, मकानों, दुकानों और वाहनों आदि के लिए तो जगह है, लेकिन वहां आजाद चलने, खेलने, बैठने और प्रकृति से मिलने की जगहों की कमी नजर आती है।
शहर की संरचना में निहित स्थानिक असमानताएं यह तय करती है कि बच्चे का अनुभव संसार कैसा बनेगा और आगे चलकर वह दुनिया को कैसे देखेगा और बुनेगा। बच्चे के लिए पर्यावरण के बारे में रुककर सोचने के लिए उसके अनुभव जगत का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अगर वह शहरों में कंक्रीट की इमारतों और गलियों में संरचनात्मक असमानता देखते हुए बड़ा होगा और उसके प्राथमिक समाजीकरण में प्रकृति का खुलापन नहीं होगा, तो आगे चलकर वह अपनी दुनिया से मिले अनुभव के अनुसार ही नई दुनिया रचेगा।
यह वैसा ही है, जैसा हम बच्चे को शेर, हाथी, हिरण और अन्य जानवरों के खिलौने उसे दिखाते हैं और उनकी कहानियां सुनाते हैं, लेकिन असलियत में बड़े होते बच्चे उन्हें देख नहीं पाते। और एक दिन किताबों से उन्हें पता चलता है कि ये सारे जीव या तो लुप्तप्राय हैं या फिर संरक्षण के द्वारा उनको बचाने की कोशिश भर की जा रही है या फिर वे किसी चिड़ियाघर में उनके मनोरंजन का हिस्सा मात्र है।
