भारत में बाल तस्करी ने एक ऐसी गंभीर समस्या का रूप ले लिया है, जो बच्चों के अधिकारों और भविष्य को नष्ट कर रही है। तस्करी के शिकार बच्चों को न केवल शारीरिक, बल्कि मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है। बच्चों को अगवा करने के बदलते तौर-तरीके गहरी चिंता पैदा करते हैं। लापता होने वाले बच्चों के सरकारी आंकड़े रोंगटे खड़े कर देते हैं। देश भर में हर साल हजारों बच्चे लापता हो जाते हैं। औसतन हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। इस पर विडंबना यह है कि कड़े कानूनों के बावजूद लापता बच्चों की बरामदगी की दर काफी कम है।
बाल तस्कर गिरोह बच्चों को अगवा कर कई बार उन्हें बाल श्रम या भिक्षावृत्ति के जरिए अपने लिए आय के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। यही नहीं, ऐसे बच्चों को यौन शोषण और अंगों की तस्करी का दंश भी झेलना पड़ता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बाल तस्कर गिरोहों पर कानून का शिकंजा क्यों नहीं कस पा रहा है?
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी 2018 से 30 जून 2023 तक 2,75,125 बच्चे लापता हुए, जिनमें 62 हजार से अधिक लड़के और दो लाख से ज्यादा लड़कियां हैं। सबसे ज्यादा 61,102 बच्चे मध्य प्रदेश से गायब हुए, जिनमें 49,024 लड़कियां और 12,078 लड़के हैं। दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल है, जहां 49,129 बच्चे लापता हुए, जिनमें 41,808 लड़कियां और 7,321 लड़के हैं। तीसरा स्थान कर्नाटक का है, जहां 27,528 लापता बच्चों में 18,893 लड़कियां और 8,635 लड़के हैं। इसी तरह गुजरात में 20,081 लापता बच्चों में 16,432 लड़कियां और 3,649 लड़के हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस दौरान 22,964 बच्चे लापता हुए, जिनमें 15,365 लड़कियां और 7,599 लड़के हैं।
वर्ष 2024 के आंकड़े भी कम नहीं हैं, इस दौरान देश भर में 98,375 बच्चे लापता हुए, जो 2023 की तुलना में आठ फीसद ज्यादा हैं। यह और भी चिंताजनक है कि इन आंकड़ों में लड़कियों की संख्या कहीं ज्यादा है।
एक और सरकारी आंकड़ा चिंता को बढ़ाता है। वर्ष 2023 में करीब बीस हजार बच्चे ऐसे थे, जो देश की सड़कों पर रहते थे। इनमें दस हजार बच्चे ही अपने परिवारों के साथ रहते थे, बाकी सभी बेघर एवं बेसहारा थे। ऐसे बच्चे भी बाल श्रम, अंग तस्करी या यौन अपराधियों का शिकार बनते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय को केंद्र सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2020 से लगभग 36 हजार बच्चे लापता हैं, जिन्हें अब तक खोजा नहीं जा सका। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2022 में बच्चों के अपहरण के 16,262 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2023 में देश भर में कुल 91,296 बच्चे लापता हुए, जिनमें 22,460 लड़के और 68,835 लड़कियां थीं। जबकि 2022 में यह संख्या 83,350 थी। यानी लापता बच्चों की संख्या में 9.5 फीसद की वृद्धि हुई।
इन आंकड़ों को सार्वजनिक करने में बीस माह की देरी हुई और इसके लिए सत्यापन तथा मिलान का हवाला दिया गया। ये तो वे आंकड़े हैं, जो पुलिस और अन्य जांच एजंसियों के पास दर्ज होते हैं। मगर ऐसे भी कई मामले होते हैं, जो पुलिस में दर्ज ही नहीं हो पाते।
बाल श्रम पर काम करने वाली संस्था कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रन फाउंडेशन की एक रिपोर्ट बताती है कि कोविड-19 के बाद बच्चों की तस्करी के मामले 68 फीसद तक बढ़े। वर्ष 2016 से 2022 तक 13,549 बच्चों को तस्करी से बचाया गया, जिनमें से अस्सी फीसद बच्चे 13 से 18 साल के थे।
तकनीक के इस दौर में बाल तस्करी के नए तौर-तरीके सामने आना चिंता बढ़ाता है। इसमें आनलाइन मंच का उपयोग कर दूर बैठे तस्कर पहले बच्चों से मेल-जोल बढ़ाते हैं और फिर उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लेते हैं। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर लापता बच्चों का पता लगाने की दर करीब पैंसठ फीसद है, जिसे संतोषजनक नहीं माना जा सकता। यह दर केरल में 95.9 फीसद, आंध्र प्रदेश में 85.7 फीसद, तमिलनाडु में 80.3 फीसद और मध्य प्रदेश में 69.8 फीसद है। इनमें वह आंकड़ा शामिल नहीं है, जिसमें ऐसे बच्चों की बरामदगी हुई है, जिनके लापता होने की रिपोर्ट दर्ज नहीं थी।
सबसे पहले बच्चों के लापता होने और तस्करों के जाल में फंसने के कारणों को समझने की जरूरत है। अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी के अलावा सामाजिक भेदभाव भी इसके प्रमुख कारण हैं। आर्थिक तंगी के कारण दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के बच्चों पर तस्करी का जोखिम सबसे ज्यादा होता है। इन समुदायों में माता-पिता अक्सर काम के लिए अपने बच्चों को ठेकेदारों या जान-पहचान वालों के साथ भेज देते हैं, जहां वे बाल तस्कर गिरोहों के जाल में फंस जाते हैं और उनका लौटना मुश्किल हो जाता है।
बच्चों की गुमशुदगी पर सर्वोच्च न्यायालय भी गहरी चिंता जता चुका है। इस वर्ष फरवरी में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से देश के विभिन्न हिस्सों से बच्चों के लापता होने की घटनाओं के पीछे किसी राष्ट्रव्यापी या राज्य-विशिष्ट गिरोह की मौजूदगी का पता लगाने को कहा था। साथ ही कहा था कि यह पता लगाना जरूरी है कि इन मामलों के पीछे कोई समानता है या ये आकस्मिक घटनाएं हैं।
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को सभी राज्यों से बच्चों के लापता होने के आंकड़े एकत्र करने को भी कहा था। न्यायालय ने सुझाव दिया कि बचाए गए बच्चों से पूछा जाना चाहिए कि ऐसी घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है। सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि कुछ राज्यों ने लापता बच्चों और अभियोजन से संबंधित आंकड़े दिए हैं। मगर इनका विश्लेषण तभी किया जा सकता है, जब केंद्र को पूरे आंकड़े मिल जाएं। तब अदालत ने सभी राज्यों को आंकड़े उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
देश में मानव और बाल तस्करी पर रोकथाम के लिए कई कानून मौजूद हैं। संविधान का अनुच्छेद-23 मानव तस्करी और जबरन श्रम यानी बेगार को प्रतिबंधित करता है। वहीं, अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम-1956, बाल संरक्षण अधिनियम-2012 और किशोर न्याय अधिनियम-2000 जैसे कानून भी मौजूद हैं।
इसके अलावा केंद्र सरकार मानव तस्करी रोधी इकाई स्थापित करने के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता मुहैया कराती है, ताकि सही जांच और अपराधियों का एक डेटाबेस तैयार किया जा सके। देश भर में इस तरह की आठ सौ से अधिक इकाइयां काम कर रही हैं। इन्हें निर्भया कोष से सौ करोड़ रुपए की मदद उपलब्ध कराई गई है।
इतना सब कुछ होने के बाद भी अगर देश भर में हर एक मिनट में आठ बच्चे लापता हो रहे हैं, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जाहिर है, सिर्फ कानून बना देने या सुरक्षा ढांचे के विस्तार से समस्या हल नहीं हो सकती। जरूरत कानून प्रवर्तन एजंसियों को सतर्क, संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की है। साथ ही ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे के लिए विशेष अदालतों का गठन करना भी आज के समय की मांग है, ताकि बच्चों के वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सके।
