आए दिन क्रूरता और स्त्रियों की गरिमा का हनन करने वाले अपराधों के ब्योरे मन को झकझोर देते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि हिंसा और यौन शोषण की घटनाओं में वर्ष 2000 के बाद लगातार वृद्धि हो रही है। यदि पिछले एक दशक के आंकड़े ही निकालकर देखें, तो पता चलता है कि समाज अराजकता और शोषण की राह पर आगे बढ़ रहा है। इसमें वह कथित सभ्य समाज भी है, जो खुद को पढ़ा-लिखा और उच्च मानता है। दूसरों का भरोसा जीतकर धोखा देने या विश्वासघात करने वालों की संख्या भी इस समय बढ़ गई है। ऐसे में किसी पर भी यकीन करना मुश्किल होता जा रहा है।
आज एक तरफ समाज में शिक्षा, रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य, सुरक्षा और आर्थिक प्रगति से आम आदमी में खुशहाली लाने की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ समाज में बढ़ती हैवानियत बता रही है कि समाज आज किस दिशा में जा रहा है। राज्य सरकारें आम आदमी की सुरक्षा पहले से बेहतर होने का दावा करती रही हैं, लेकिन बढ़ते अपराध इस दावे को झुठलाते हैं।
गौर करें तो 16 दिसंबर 2012 से लेकर 2026 के दौरान हैवानियत की घटनाओं में ही वृद्धि नहीं हुई है, बल्कि क्रूरता का स्तर भी चरम पर पहुंच गया। वर्ष 2012 में दिल्ली में निर्भया कांड ने पूरे देश को उद्वेलित कर दिया था।
निर्भया मामले के बाद केंद्र सरकार ने सुरक्षा मानकों में कई सुधार किए, बावजूद इसके क्रूरता की हदें पार करने वाली घटनाएं होती रहीं। इस पर पुलिस और सुरक्षा से जुड़ी अन्य एजेंसियों पर सवाल खड़े किए गए। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इंसानियत को तार-तार करने वाली घटनाएं घटती रही हैं।
दिल्ली में फ्लैट में मिला डीयू की असिस्टेंट प्रोफेसर का शव, हत्या की आशंका
निर्भया कांड के बाद महिलाओं और लड़कियों की असुरक्षा को लेकर एक राष्ट्रीय बहस शुरू हो गई थी। इसके बाद केंद्र ने आपराधिक कानूनों में संशोधन, निर्भया फंड की स्थापना, त्वरित सुनवाई अदालतों की शुरुआत के साथ किशोर अपराध कानून पर पुनर्विचार किया। फिर भी आपराधिक घटनाओं में कोई कमी नहीं आई।
वर्ष 2018 में जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में अपहरण, बलात्कार और हत्याकांड ने निर्भया कांड की यादें फिर ताजा कर दी थीं। फिर 2019 में हैदराबाद में महिला चिकित्सक की हत्या, 2020 में हाथरस कांड और इसी वर्ष उन्नाव में हुई घटना ने पूरे देश को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया था। मुंबई में 2013 में महिला फोटो पत्रकार और बाद में एक अन्य महिला से सामूहिक बलात्कार, अजमेर में सामूहिक यौन शोषण तथा बदायूं में दो किशोरियों के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या इंसानियत को तार-तार करने वाली घटनाएं थीं।
सवाल यह है कि कठोर कानून, त्वरित सुनवाई अदालतों के गठन और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने के बाद भी घटनाओं में कमी क्यों नहीं आई है? सवाल यह भी है कि शिक्षा का स्तर और जागरूकता बढ़ने के बावजूद बाल यौन शोषण में कमी आने के बजाय लगातार बढ़ोतरी क्यों हो रही है?
वर्ष 2012 में केंद्र सरकार ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण के लिए अधिनियम-2012 नामक एक विशेष कानून पारित किया था और बच्चों के साथ हुए अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की स्थापना की। मगर दस वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि न्यायालयों की स्थापना के बाद 2023 तक पाक्सो से संबंधित दो लाख 43 हजार से अधिक मामले लंबित थे।
एक सर्वेक्षण के मुताबिक हर दस बच्चों में से एक बच्चा यौन शोषण और हिंसा से प्रभावित है। इसी तरह यौन शोषण के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की औसत उम्र नौ साल है।
हिंदू महिलाओं को धर्मांतरण के लिए मजबूर करते हैं, पुणे में विप्रो की पूर्व कर्मचारी ने लगाया आरोप
सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में, जहां पिछले आठ वर्षों में आम आदमी की सुरक्षा पर सबसे ज्यादा गौर किया गया, वहां भी यौन अपराध की दर में कमी नहीं आई है। अक्तूबर 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में कुल अपराधों में से बच्चों के साथ किए गए अपराध 45 प्रतिशत से अधिक हैं। इससे साबित होता है कि बच्चों के साथ हिंसा, क्रूरता और बलात्कार के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। यह तब है जब अपराधी की क्रूरता को देखते हुए उसे अधिकतम सजा दिए जाने का प्रावधान है। इसका मतलब है कि वर्ष 2012 में बनाया गया पाक्सो कानून अपराधियों पर नकेल कसने में नाकाम रहा है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक बाल यौन शोषण, बच्चों के साथ क्रूरता और हिंसा वाले मामलों में ज्यादातर मामले अपहरण किए गए बच्चों से संबंधित हैं। अपहरण के मामलों में लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा है। इसके अलावा मानव तस्करी के मामले भी बहुत बड़ी संख्या में सामने आए हैं।
ये आंकड़े बयान करते हैं कि बाल यौन शोषण रोकने के लिए केवल कानून ही काफी नहीं है, बल्कि बच्चों को हर तरह से जागरूक करने की भी जरूरत है। चिंता की बात यह है कि ऐसे कई मामलों में सगे-संबंधियों ने भी भरोसा तोड़ा। हजारों की संख्या में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। इस साल रामभुवन का मामला चर्चा में रहा।
सवाल यह है कि समाज में रिश्तों की पवित्रता पर दाग लगाने वालों की संख्या लगातार क्यों बढ़ रही है? रिश्तों की विश्वसनीयता खत्म होना सभ्य समाज के पतन का सूचक है, फिर आर्थिक, शैक्षिक और विचारात्मक विकास का क्या मतलब रह जाता है?
यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 20 वर्ष से कम उम्र की कम से कम 12 करोड़ लड़कियों का हर साल यौन शोषण किया जाता है। इनमें 90 प्रतिशत लड़कियों ने स्वीकार किया कि उन्हें यौनकर्मी बनाने के लिए ले जाने वाला व्यक्ति परिचित, दोस्त या उनका ही सगा था। इस सर्वेक्षण से पता चलता है कि जान-पहचान के लोग ही नाजायज फायदा उठाते हैं।
सवाल यह है कि जब ऐसे लोगों में कानून का डर खत्म हो गया है और संबंधों की पवित्रता को तार-तार करने वालों की बाढ़ आ गई हो, तो समाज में महिलाओं, लड़कियों और बच्चों को किस तरह सुरक्षित किया जा सकता है? समाज में बढ़ती अपराध की प्रवृत्ति में यदि अपने ही लोग दाग लगाने लगे हों, तो आपसी रिश्तों को कैसे बचाया जा सकता है?
आज के दौर में जब बच्चों का सारा ध्यान मोबाइल गेम, रील और वीडियो पर केंद्रित हो गया हो, तो उनको समझाने के लिए कौन-सा तरीका बेहतर रहेगा? कठोर कानून का भी लोगों में डर नहीं है, तो यौन अपराधों को किस तरह रोका जाएगा?
देश में परिवार का स्वरूप भी कमजोर पड़ रहा है। बच्चे एकाकी जिंदगी जीने के अभ्यस्त हो गए हैं। वे बिना सोचे-समझे अनजान लोगों पर भरोसा कर लेते हैं और अपने साथ हुई घटना माता-पिता को नहीं बताते। यही वजह है कि अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति बच्चों को लालच देकर उनका शोषण करने लगते हैं। यह स्थिति बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो रही है। इसको रोकने के लिए परिवार और समाज को जागरूक करने की जरूरत है। बच्चों को जब तक हर तरह से जागरूक नहीं बनाया जाएगा, तब तक उन्हें बचाना संभव नहीं।
यह भी पढ़ें: बातों के सफर में बदलते अर्थ और रिश्तों के बीच बढ़ती खामोशियों में उलझे लोग
एक व्यक्ति जब किसी दूसरे व्यक्ति को तीसरे व्यक्ति के बारे में दिल खोलकर दिमाग से बताता है, तो उसके दो इरादे हो सकते हैं। पहला, हल्के-फुल्के हास्य-व्यंग्य में लिपटा वक्त बिताने वाला नजरिया। जैसे गरमी के मौसम में पानी में नमक-चीनी के साथ थोड़ी ज्यादा काली मिर्च डालकर पीना और पिलाना। दूसरे इरादे के तहत यह सुनिश्चित करना कि दूसरा व्यक्ति बातचीत की खट्टी और कड़वी प्रतिक्रियाएं तीसरे व्यक्ति तक जरूर पहुंचा दे। कई बार ऐसा होता है कि दूसरों की कुछ बातें या व्यवहार का स्वाद पसंद नहीं आता। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
