हमारी चेतना की जमीन हमारे जीवन को संचालित करने वाले निर्णयों से ही उपजती है। जीवन में कई बार ऐसी परिस्थिति बनती है, जब हमारा मानस निर्णय तो लेता है, लेकिन उन निर्णयों में स्थायित्व नहीं रहता। वे भविष्य में टिक नहीं पाते। चेतना सबकी एक ही होती है। फर्क होता उन मूल्यों का, जो हमारी चेतना में मौजूद रहते हैं। इन मूल्यों के अनुसार ही हमारी चेतना किसी घटना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। ये मूल्य ही इस बात का निर्धारण करते हैं कि वे कौन-से तत्त्व और कार्य होंगे, जो हमें अपराध-बोध से भरेंगे और हमें अपराध-बोध से मुक्त रखेंगे।
जीवन में कभी-कभी ऐसा पड़ाव भी आता है, जब हमारी चित्त अवस्था स्थिर नहीं होती। वैसे भी वह स्थिर नहीं, गतिशील है। वह ठहराव नहीं, निरंतर खोज है, लेकिन यहां अस्थिर होने का आशय विचलन से है। भीतर के प्रश्नों की यात्रा ठहरती नहीं। वह एक ऐसे प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां आंतरिक खोज अपने ही छायापथ पर चलती है। मगर अस्थिर मन में जब कोई हमारे अनुकूल काम होता दिखाई देता है, तब मन अपने आप ही किसी आंतरिक उत्साह से भर जाता है। वह छोटा-सा उत्साह कितने दायित्वों को निभाने की ऊर्जा दे देता है, हम इसकी पूर्व से कल्पना भी नहीं कर सकते। जैसे अवसाद और आत्महत्या के केंद्र में होता है सहनशीलता का अभाव, ठीक वैसे ही उत्साह और जागरूकता के केंद्र में प्रोत्साहन भी एक कड़ी है।
जीवन में ऐसे कई अवसर आते हैं जब हम उत्साहित होकर किसी लक्ष्य को साधते हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में उस लक्ष्य का अपेक्षित परिणाम नहीं पाते। ठीक इसके उलट, एक व्यक्ति के भीतर किसी काम या लक्ष्य को हासिल करने की क्षमता तो हो, लेकिन उसके भीतर उत्साह की कमी हो, तो उसके लिए आसान राह भी मुश्किल होगी। इसके अलावा, एक स्थिति यह भी होती है कि क्षमता और उत्साह से लैस व्यक्ति को भी अगर कोई निराशा में डुबो दे, उसका उत्साह भंग कर दे, तो किसी काम को आसानी से पूरा करने की उसकी क्षमता विपरीत दिशा में प्रभावित होती है।
कहने का आशय यह कि अगर हमारा चित्त किसी विषय में उत्साहित रहता है, तो हम अन्य विषयों में भी अपना उत्साह दिखाते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने एक जगह लिखा है- उत्साह वास्तव में कर्म और फल की मिली-जुली अनुभूति है, जिसकी प्रेरणा से तत्परता आती है। अगर फल दूर ही दिखाई पड़े, उसकी भावना के साथ उसका लेश मात्र भी कर्म या प्रयत्न के साथ-साथ लगाव न मालूम हो, तो हमारे हाथ-पांव कभी न उठें और उस फल के साथ हमारा संयोग ही न हो। इसमें कर्म-शृंखला की पहली कड़ी पकड़ते ही फल के आनंद की भी कुछ अनुभूति होने लगती है। अगर हमें यह निश्चय हो जाए कि अमुक स्थान पर जाने से हमें किसी प्रिय व्यक्ति का दर्शन होगा, तो उस निश्चय के प्रभाव से हमारी यात्रा भी अत्यंत प्रिय हो जाएगी। अगर हम किसी बात पर गुस्सा हुए बैठे हैं और इसी बीच में कोई दूसरा आकर हमसे कोई बात सीधी तरह भी पूछता है, तो भी हम उस पर झुंझला उठते हैं। यह सब मनोस्थिति द्वारा संचालित होता है और मनोस्थिति परिस्थितिजन्य होती है।
हम सभी किसी न किसी रूप में एक भय की ग्रंथि से जूझते हैं। ऐसे में संवाद एक उत्साह की चिंगारी जरूर है। दरअसल, दुख के वर्ग में जो स्थान भय का है, आनंद वर्ग में वही स्थान उत्साह का है। ऐसे में संवाद को मानव समाज की रीढ़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। यहीं से विचार की दोहरी प्रक्रिया शुरू होती है। संवाद का उपक्रम सत्संग भी है। जहां हम अपने मन के भावों को पलायन करने के बजाय अपने छूटे हुए अंतरंग की बुनियादी बुनाइयां बुनने लगे। नीरसता व्यक्ति को नकारात्मक और निरुत्साही बनाती है, तो उसमें मन की अस्थिर अवस्था की केंद्रीय भूमिका रहती है। इसलिए उत्साह में चिंतन की स्थिति बनी रहे, जिसे हम जागरूकता की परिपक्व अवस्था भी कह सकते हैं। बस उत्साह क्षणिक उद्वेगयुक्त होता है, इसलिए उसमें जागरूकता का होना पहली शर्त है।
हमारे उत्साह में हमारी चेतना की भूमिका सर्वोपरि है। चेतना के स्तर पर कभी कोई भेद भी नहीं होते, तो भेद हमेशा विचारों के स्तर पर होते हैं। ज्यादातर लोग अपनी चेतना को शुद्ध ही मानकर चलते हैं। तर्क-वितर्क से उसे न्यायसंगत ठहरा देते हैं। ऐसे में जीवन में घटित घटनाओं में अपनी निजी चेतना को शुद्धि की कसौटी पर स्वयं कसकर देखना चाहिए। हम दंग रह जा सकते हैं कि जो कुछ भी हमारे साथ हुआ, उसके केंद्र में हमारी चेतना है। शुद्ध चेतना जो हमारे कार्य को स्वयं निदेशित करे, किसी दूसरे की चेतना उसकी वैचारिकी का अनुगमन करना होगा। अपनी चेतना को परिष्कृत भी करना पड़ता है और इसमें सबका अपना अलग तरीका होता है, सबके अनुभव अलग। उत्साह और जागरूकता में चेतना की अहम भूमिका रहती है। चेतना में सांस्कृतिक मूल्यों की पहचान उसकी परिधि में निहित है। जीवन दर्शन और परिवेश इसके रसायन हैं। चेतना निरंतर परिष्कृत होने की प्रक्रिया है, क्योंकि जो आज है, कल वह अनुभव भी रहे, यह जरूरी नहीं। राम और रावण दोनों में चेतना थी, लेकिन भिन्न स्तर की।
अपने उत्साह को बढ़ाने की कुंजी यह है कि हम अपने स्वार्थ से परे किसी ऐसे उद्देश्य के प्रति समर्पित हो जाएं, जिसके प्रति हमारी गहरी लगन हो, जिसमें हमारी चेतना की परिष्कृत अवस्था हो। दूसरों से अर्जित नहीं, स्व-अनुभव से अर्जित। यह उद्देश्य हमें प्रतिबद्धता देगा।
