एक चेतावनी चार मई के बाद गुंडों को उल्टा लटका कर सीधा कर देंगे! फिर एक जवाब – चार मई के बाद देखते हैं दिल्ली का कौन आपको बचाने आता है! चार मई की सुबह – चैनलों में मतदान बाद सर्वेक्षण को लेकर भिड़ंत जारी रही। भाजपा मतदान बाद जनमत सर्वेक्षण में आठ में से छह में जीतती दिखी, जबकि तृणमूल कांग्रेस दो में जीतती दिखी। तनाव जारी रहा। अंत में आए परिणाम और उनके साथ आई ‘चार मई’ की ‘क्रांति’। तृणमूल कांग्रेस साफ, और भाजपा को तगड़ा बहुमत मिला। ममता दीदी को बड़ा झटका लगा। वे अपने गढ़ भवानीपुर चुनाव क्षेत्र से हार गईं और भाजपा के बड़े नेता शुभेंदु अधिकारी 15,000 मतों से जीत गए।

मतगणना के दौरान अपनी आसन्न हार को देखते हुए ममता दीदी का मतदान केंद्र में घुसना और देर तक बैठे रहना सामने आया। फिर सुरक्षा बलों पर धक्का-मुक्की के आरोप लगाए गए। अंत में भाजपा की प्रचंड जीत और तृणमूल कांग्रेस की करारी हार हुई और बंगाल में लोगों का जश्न मनाया गया।

बंगाल के नतीजों ने बदल दी राष्ट्रीय राजनीति की दिशा

दिल्ली में भाजपा मुख्यालय में शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधन दिया कि ‘अंग, बंग और कलिंग’ में भाजपा की जीत हुई है। बंगाल में ‘भय’ की जगह ‘भरोसे’ की जीत हुई है। कई चैनलों ने इसे ‘हिंदुत्व की जीत’, ‘सनातन की जीत’, ‘हिंदू एकजुटता की जीत’ बताया। कुछ ने इसे ध्रुवीकरण की जीत कहा, तो कुछ ने कहा कि इससे 2027 के उत्तर प्रदेश चुनावों और 2029 के आम चुनावों में भाजपा की जीत का रास्ता साफ हो गया है।

बंगाल की जनता के दमित विक्षोभ की अभिव्यक्ति भी दिखाई दी। कोई नाच रहा था, कोई गा रहा था, कोई झालमूड़ी और संदेश बांट रहा था। ढोल-चंग बज रहे थे, गुलाल लग रहा था, स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बच्चे सभी शामिल थे। कुछ लोग कह रहे थे कि पंद्रह साल की तानाशाही खत्म हुई, दमन खत्म हुआ।

कुछ का कहना था कि अब तक वे कुछ बोल भी नहीं सकते थे, और अगर कुछ कहा जाता तो खैर नहीं थी। न वोट डालने दिया जाता था। पहली बार चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों ने उन्हें निडर होकर वोट डालने की आजादी दी।

ममता बनर्जी की राजनीति इस बार क्यों नहीं चली

चार मई की हार के बाद ममता दीदी को इस्तीफा देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने नहीं दिया। वे कहने लगीं कि वे हारी नहीं हैं, बल्कि हराई गई हैं। भाजपा और चुनाव आयोग ने मिलकर सौ सीटें चुराई हैं। वे अदालत जाएंगी, जरूरत पड़ी तो अंतरराष्ट्रीय अदालत तक जाएंगी। वे लोकतंत्र और संविधान बचाने की बात करने लगीं।

‘इंडिया’ के एक बड़े नेता ने पहले आरोप लगाया कि बंगाल में भाजपा के प्रवेश के लिए दीदी जिम्मेदार हैं। लेकिन जब दीदी हार गईं, तो उन्होंने इसे वोट चोरी बताया। कहा गया कि पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव भी चोरी किए गए। ‘इंडिया’ के एक अन्य नेता भी दीदी से मिलने पहुंचे, आंसू पोंछे और कहा कि चुनाव की चोरी की गई है। पहले उत्तर प्रदेश में हुई, आगे भी हो सकती है।

इसके बाद बंगाल का असली हिंसक चेहरा सामने आया। चुनाव परिणाम के दो दिन बाद रात में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की उनकी कार में उनके घर के पास हत्या कर दी गई। इस घटना ने बंगाल की हिंसा को फिर से बहस में ला दिया।

कुछ लोगों ने इसे हार की बौखलाहट बताया, तो कुछ ने कहा कि चुनाव के दौरान दी गई धमकियों का यह परिणाम है। इसके बाद यह हत्या भी उसी तरह बहस में निपटाई गई जैसे अन्य घटनाएं की जाती हैं। हर वक्ता और प्रवक्ता पहले अहिंसा का संदेश देता है, फिर हत्या की निंदा करता है और साथ ही प्रशासन, चुनाव आयोग और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है।

इसी बीच राज्यपाल ने बंगाल की पिछली विधानसभा और मंत्रिमंडल को भंग कर दिया। इससे ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने का मामला अप्रासंगिक हो गया और नई विधानसभा तथा नए मुख्यमंत्री के शपथ समारोह का मार्ग प्रशस्त हो गया।

असम, केरल और पुदुचेरी में मिले जनादेशों पर कोई विवाद नहीं हुआ, लेकिन तमिलनाडु में मामला अटक गया। तमिल फिल्मी हीरो जोसेफ विजय का दल टीवीके बहुमत से दस-ग्यारह सीटें कम रह गया। कांग्रेस के पांच सदस्य उनके साथ आए, फिर भी बहुमत नहीं बना। जोसेफ विजय जब राज्यपाल के पास गए तो उन्हें कहा गया कि पहले बहुमत सिद्ध करें, तभी शपथ ली जाएगी। इसी बिंदु पर संविधान विशेषज्ञों में बहस छिड़ गई।

एक पक्ष का मानना था कि विजय सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं, इसलिए राज्यपाल को उन्हें बहुमत सिद्ध करने का अवसर देना चाहिए था। लेकिन राज्यपाल अपने निर्णय पर अडिग रहे।

अंत में यह चर्चा भी उठी कि लोकतंत्र में स्थिति ऐसी हो गई है कि कोई हारकर भी इस्तीफा नहीं देता और कोई जीतकर भी समय पर शपथ नहीं ले पाता। तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद पार्टी के कुछ प्रवक्ता चेहरे अचानक दयनीय और उपहास के पात्र बनते दिखे। एक प्रवक्ता ने टीवी पर माफी मांगते हुए कहा कि वह दबाव में थे और सिर्फ प्रवक्ता थे, नेता नहीं। इसी संदर्भ में कहा गया कि “छुरी बन, कांटा बन ओ माई सन! सब कुछ बन, किसी का प्रवक्ता नहीं बन!”