लोग ऐसा मानते हैं कि मोबाइल ने भारतीय जीवन को कई तरह से प्रभावित किया है, पर मेरी मान्यता है कि उससे भी पहले कार के आगमन ने भी उसे काफी गंभीरता से प्रभावित किया था। कार के आते ही हमारा समाज जैसे दो हिस्सों में बंट गया- कार वाले लोग और बिना कार वाले लोग। आमतौर पर होता यही है कि कार में बैठते ही हम अपने आप को साथ के बहुत से लोगों की दुनिया से अलग कर लेते हैं। उस दुनिया से, जिसमें लोग किसी सड़क पर थूकते हैं और उसी सड़क पर चलते भी हैं। उस दुनिया से, जिसमें लोग अपना सामान खुद ढोते हुए चलते हैं और जिसमें लोगों के लिए बहुत दूर की किसी जगह जाने के लिए सार्वजनिक वाहन ही एकमात्र विकल्प है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि मनोवैज्ञानिक तौर पर कार किसी व्यक्ति को बाहरी दुनिया से जैसे एक सुरक्षित पनाहगाह में ले जाती है। कार में बैठ कर उसे ऐसा लगता है, जैसे उसने बहुत से आक्रामक बलों से रक्षा के लिए कोई कवच धारण कर लिया हो। जैसे लोग पहले अपने किसी रिश्तेदार से या किसी परिचित से आलंबन की उम्मीद करते थे, वैसे अब वे अपने लिए सहारा कार, भूखंड या बैंक में रखे हुए धन में ढूंढ़ते हैं।

अपनी निजी कार में बैठे हुए कोई अपने साथ के बहुत से लोगों से, अपने मां-बाप और उनके सपनों से कट जा सकता है। लोगों को पता भी नहीं चलेगा और वे सबसे कट जाएंगे। हालांकि इस बात को कोई भी आसानी से समझ सकता है कि भारत में लोगों के लिए आवागमन की सुविधा को बेहतर बनाना है, तो इसके लिए सार्वजनिक परिवहन सेवा को मजबूत करना होगा। मगर आम आदमी के लिए इस सार्वजनिक परिवहन सेवा का हाल आज किसी से छिपा नहीं है ।

एक पहलू यह भी है कि किसी व्यक्ति या परिवार की आर्थिक स्थिति पर कार एक बड़ा बोझ है। कार का होना लोगों को आलसी और फिजूलखर्ची बनाता है। अपनी आय का बहुत बड़ा भाग व्यक्ति कार पर खर्च कर डालता है। एक व्यक्ति की तनख्वाह लंबे समय तक अटकती है, तो वह उधार लेकर अपना काम चलाता है। लंबे समय के बाद जब उसे अपनी तनख्वाह का बकाया पैसा मिला, तो उसने देखा कि उसका बहुत बड़ा हिस्सा वह कार से इधर-उधर घूमने में उड़ा चुका होता है। कार पास में हो, तो व्यक्ति का अकारण ही कहीं भी उसी से जाने का मन हो जाता है। एक बार कार का चस्का लग जाए, तो बस या ट्रेन से यात्रा करना परेशानी भरा लगने लगता है।

कार श्रेष्ठता, शक्ति, प्रगति और साहसिक यात्रा का झूठा आभास कराती है, जबकि वास्तव में वह व्यक्ति पर एक तरह का बोझ और जिम्मेदारी लादती है। साइकिल चलाना हमारे जीवन को ज्यादा अर्थपूर्ण बनाता है, क्योंकि वह हमारी शारीरिक ऊर्जा को उपलब्धि और साहसिक यात्रा में बदल देता है।

हर व्यक्ति को किसी उपलब्धि के लिए स्वयं कुछ प्रयास और श्रम करना पड़ता है। पर कार को बहुत से लोग एक ऐसी ‘रेडीमेड’ या तैयार उपलब्धि के रूप में देखते हैं, जिसे एक व्यक्ति दूसरे के पास बिना कोई श्रम किए स्थानांतरित कर सकता है। कार के स्वामित्व से ही व्यक्ति की अर्हता में वृद्धि हो जाती है, ऐसी गलतफहमी बहुत-से लोगों को होती है। एक अमीर पिता अपने लड़के या लड़की को एक मंहगी कार दिला कर इस तरह की गलतफहमी पाल लेता है। अपने किसी गुणविहीन पुत्र को एक उम्दा कार दिला कर कई अमीर पिता यह मान लेते हैं कि उन्होंने अपनी संतान को सामाजिक दृष्टि से अधिक महत्त्त्वपूर्ण और सम्मानित बना दिया। इस तरह की सोच हास्यास्पद है, पर कारों के व्यापारी इस मनोवैज्ञानिक सोच से भलीभांति वाकिफ होते हैं।

कार से कहीं भी जाना-आना एक तरह का नशा है, जिसकी लत एक बार लग जाने पर बहुत मुश्किल से ही छूटती है। कार हाथ में आते ही आदमी अपनी हर इच्छित जगह जाने के लिए उतावला हो जाता है। कई बार गैरजरूरी तरीके से भी। इसके लिए उसे कितना पेट्रोल और पैसा खर्च करना पड़ेगा, इस बारे में वह अक्सर सोचना ही बंद कर देता है। अगर कार में घूमने वाला व्यक्ति परिस्थितिवश आवागमन के लिए किसी अन्य सार्वजनिक साधन का उपयोग करने के लिए मजबूर हो जाए, तो वह और उसके परिचित इसे उसके ‘वर्गच्युत’ हो जाने के रूप में ही देखते हैं। कई समृद्ध बुजुर्गों में अक्सर बहुत इधर-उधर जाने की शारीरिक क्षमता शेष नहीं रहती, फिर भी किसी कार का उपयोग करने के लिए वे महीने की तनख्वाह देकर एक ड्राइवर रखते हैं।

कार का स्वामित्व किसी व्यक्ति की सामाजिक चेतना को बड़ी गहराई से प्रभावित करता है। ऐसा व्यक्ति अक्सर किसी कार वाले को ही अपनी मैत्री और संबंधों के योग्य मानता है। कार-विहीन व्यक्ति ऐसे लोगों की नजर में अक्सर एक कमतर इंसान होते हैं। ऐसे उदाहरण आम हैं, जिनमें किसी कार के मालिक ने गरीब लोगों के साथ सिर्फ इसलिए दुर्व्यवहार किया, क्योंकि उसकी वजह से उसकी कार में कहीं खरोंच लग गया। कार यात्रा का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे हम समाज के अन्य लोगों के साथ यात्रा के अनुभवों से वंचित हो जाते हैं। उनके बारे में, उनके व्यवहार के बारे में, उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति के बारे में, उनकी परेशानियों के बारे में, उनकी सोच के बारे में जानने के एक अमूल्य अवसर को हम अपनी कार-यात्रा की वजह से खो देते हैं। यह जनतंत्र की मूल भावना और उसके मूल उद्देश्य से ही दूर चले जाने जैसा है। कार खरीदने में समर्थ होते हुए भी यदि कोई कार नहीं रखता है, तो इसे जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति उसकी किसी प्रतिबद्धता के द्योतक के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।