दुनिया के किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की साख में गिरावट पूरी मानवता के लिए स्वाभाविक चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि यहां की चारदीवारी में न केवल तरक्की की इबारत लिखी जाती है, बल्कि ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ का निर्माण भी होता है। सवाल जब उस देश से जुड़ा हो, जो उच्च कोटि के विश्वविद्यालयों का घर (इंग्लैंड) है और उसमें में भी वहां के श्रेष्ठतम विश्वविद्यालय आशंका के घेरे में हों, तो चिंता और भी गहरी हो जाती है। भरोसे की दीवार एक बार ढह जाए, तो उसे दोबारा बनाना आसान नहीं होता।
दरअसल, न्यूटन, डार्विन और स्टीफन हाकिंग जैसी विलक्षण प्रतिभाओं को पल्लवित करने वाले इंग्लैंड के वर्ष 1209 में स्थापित कैंब्रिज विश्वविद्यालय और यहां के लीवर पूल जान मूर्स नाम के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के भरोसे की दीवार बुरी तरह दरकी है। इन विश्वविद्यालयों की दुनिया में एक अलग पहचान है, मगर ये आज भी नस्लीय भेदभाव से अछूते नहीं हैं।
कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने वर्ष 2022 में एक अश्वेत शिक्षाविद डा जेसन अर्डे को 37 बरस की उम्र में अपने यहां ‘शिक्षा और समाजशास्त्र’ विषय में प्रोफेसर नियुक्त किया था।
विश्वविद्यालय को इस नियुक्ति के लिए खासी सराहना मिली, मगर यह चार बरस की चांदनी ही साबित हुई। जुलाई, 2026 में कुछ लोगों ने प्रोफेसर जेसन पर नकल करके पीएचडी करने के आरोप लगा दिए। इसके बाद पीएचडी की उपाधि देने वाले विश्वविद्यालय के स्पष्टीकरण पर यह मामला थोड़ा शांत हुआ, पर विवाद का जिन्न फिर जाग गया। कैंब्रिज विश्वविद्यालय के कुछ अधिकारियों ने ही प्रोफेसर जेसन की नियुक्ति के मानदंडों पर पर सवाल खड़े कर दिए। मीडिया में भी इस पर चर्चा हुई और विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भी इस मामले पर असंवदेनशीलता दिखाई गई, जबकि आरोप सिद्ध नहीं हुए थे। वहीं, आरोपों से व्यथित होकर प्रोफेसर जेसन ने सही से अपना पक्ष रखे बिना ही बीते पांच अगस्त को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। विश्वविद्यालय ने भी उन्हें जांच पूरी होने तक अपने पद पर बने रहने के लिए नहीं कहा।
प्रोफेसर जेसन इस प्रकरण से बहुत आहत हुए और चौदह अगस्त को अचानक उनका निधन हो गया। जांच एजंसियों ने इसे प्राकृतिक मौत माना, पर इसके लिए अप्राकृतिक कारण जिन्होंने पैदा किए, उस पर पूरा व्यवस्था तंत्र मौन है। प्रोफेसर जेसन की पीएचडी को अपनी शिकायत से विवादों में लाने वाले श्वेत अनुसंधानकर्ता नाथन काफनास को उनके अपने ही बैल्जियम स्थित गेंट विश्वविद्यालय ने नस्लीय भेदभाव के आरोप में निलंबित कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि नाथन अपने अध्ययनों के जरिए यह दावा भी कर चुके हैं कि कैसे श्वेत और अश्वेत व्यक्ति की योग्यता आनुवांशिक आधार पर तय की जाती है। कैंब्रिज में ह्ययूनवर्सिटी एंड कालेजह्ण यूनियन के महासचिव जो ग्रेडी का कहना है कि प्रोफेसर जेसन को जिस तरह का उत्पीड़न झेलना पड़ा, उससे घृणित कुछ भी नहीं हो सकता। उन्होंने इसकी गहराई से जांच करने की मांग की है।
गौरतलब है कि प्रोफेसर जेसन की मौत के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री से लेकर दुनिया भर के शिक्षक समुदाय तथा अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों की तरफ से जो सवाल उठाए गए, उसने कैंब्रिज विश्वविद्यालय की साख को गहरी चोट पहुंचाई। प्रधानमंत्री एंडी बर्नहेम ने कहा कि प्रोफेसर जेसन की मौत कई स्तरों वाली त्रासदी है। उनके इस सारगर्भित वाक्य को कुछ ऐसे समझा जा सकता है- इस मामले में बहुरूपी त्रासदी बड़े विश्वविद्यालयों की उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और उपाधि की पूरी गांरटी देने की विफलता में नजर आती है, यह त्रासदी कैंब्रिज विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष संस्थान की संवेदनहीनता भी दिखाती है। इसके अलावा यह त्रासदी एक बड़े विश्वविद्यालय के नियुक्ति के उच्च मानदंडों पर भी सवाल खड़ा करती है।
इस घटना का ताल्लुक केवल दो विश्वविद्यालयों की दीवारों के भीतर समाप्त नहीं होता, बल्कि यह पूरी दुनिया को खुद से जोड़ता है। सवाल यह है कि प्रोफेसर जेसन को पीएचडी की उपाधि प्रदान करने वाले लीवर पूल जान मूर्स विश्वविद्यालय ने अपना पक्ष रखते हुए पीएचडी में साहित्य चोरी के आरोपों से तो साफ इनकार कर दिया था, मगर जब शिकायतकर्ताओं ने आरोप को दूसरे परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया, तो संबंधित विश्वविद्यालय ने इसका पुरजोर तरीके से विरोध क्यों नहीं किया?
प्रोफेसर जेसन की पीएचडी में गड़बड़ी के आरोपों को उछालने वाले कैंब्रिज के शोधार्थी नाथन काफनास ने दावा किया था कि जेसन ने अपने शोधपत्र में कई पैरा कहीं दूसरी जगह बिना संपादन के चस्पा कर दिए।
सवाल यह भी है कि नाथन के दावे के समांतर प्रोफेसर जेसन को पीएचडी की उपाधि देने वाले विश्वविद्यालय ने शोधपत्र जमा कराने के वक्त खुद की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की। पूरी दुनिया को साहित्य चोरी जांचने के महंगे साफ्टवेयर बेचने वाले पश्चिमी देशों को क्या खुद इनकी विश्वसनीयता पर कोई संदेह है?
दूसरा, अगर मामला साफ्टवेयर की विफलता का नहीं है, तो फिर उन्हें बताना चाहिए कि आखिर परदादारी किस बात की है? शिकायतकर्ता नाथन को तो खुद ही नस्लीय भेदभाव के आरोप में उनके विश्वविद्यालय ने निलंबित कर दिया है, तो अब उनके साहित्य चोरी के आरोप भी गहरी जांच का विषय हैं। देखना होगा कि कहीं यह मामला सुविधा के अनुसार मानदंड बदलने के पूर्वाग्रह का तो नहीं है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय इस प्रकरण में बार-बार अपने रंग क्यों बदलता रहा? पहले प्रोफेसर जेसन की नियुक्ति पर जमकर वाहवाही लूटी गई। फिर उनकी पीएचडी को लेकर लगे आरोपों के साबित हुए बिना ही पूरी दुनिया में उनकी छवि को धूमिल होने दिया गया। शायद वह भूल गया कि जब लोग पूछेंगे कि क्या कैंब्रिज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में भी नियुक्तियों में अनियमितताएं होती हैं, तो उसके पास क्या जवाब होगा। हालांकि, शिक्षाविदों का कहना है कि यह सब इतना आसान नहीं है कि इतनी बड़ी त्रासदी को कैंब्रिज प्रशासन चटाई के नीचे छिपाकर बैठ जाएगा।
विश्वविद्यालय की कुलपति ने इस घटना पर खेद जताकर भले ही मानवीय दृष्टिकोण रखा, लेकिन इसे न्याय की दृष्टि से कभी नहीं देखा जाएगा। इस मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई से न्याय सुनिश्चित हो पाएगा।
एक ब्रिटिश राजनेता का कहना है- ‘कुछ विश्वविद्यालयों ने प्रोफेसर जेसन को अपना पोस्टर ब्वाय बनाने के लिए उनकी कम उम्र और अश्वेत होने को ही नियुक्ति का आधार बना लिया’। फिर इस मामले में नस्लीय भेदभाव के आरोप तो और भी कई लोग लगा रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कैंब्रिज ने शोध, पठन-पाठन और प्राध्यापकों की नियुक्ति के उच्च आदर्श स्थापित किए हैं। मगर सैकड़ों वर्षों की इस सशक्त विरासत का अर्थ पारदर्शिता से मुंह मोड़ना नहीं हो सकता। संस्थान को जवाब तो देना होगा।
इस मामले में कैंब्रिज को अपनी चूक भी जगजाहिर करनी चाहिए। प्रोफेसर जेसन दोषी थे या नहीं, इसकी भी गहन जांच होनी चाहिए। अगर यह पीएचडी की उपाधि के बजाय नस्लीय भेदभाव का मामला है, तो भी उसकी तह में जाना होगा। विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैकिंग में दूसरे देशों के संस्थानों की व्यवस्था में खोट निकालने वालों को अपनी नैतिक रैकिंग का हिसाब भी देना चाहिए।
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