रणनीतिक अवधारणाएं दीर्घकालीन राष्ट्रीय हितों और व्यापक भू-राजनीतिक दृष्टि पर आधारित होती हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र की अवधारणा भी ऐसी ही एक रणनीतिक पहल थी, जिसने चीन के बढ़ते समुद्री प्रभाव को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए अमेरिका, भारत, जापान और आस्ट्रेलिया जैसे समान हितों वाले देशों को गोलबंद किया था।
अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने इस दीर्घकालीन रणनीतिक नीति को आर्थिक सौदेबाजी और तात्कालिक लाभों की कसौटी पर रख कर इसकी विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका रणनीतिक प्रतिबद्धताओं की अपेक्षा तात्कालिक आर्थिक फायदों को अधिक महत्त्व दे रहा है। इससे उसकी हिंद-प्रशांत रणनीति के उद्देश्य कमजोर पड़ गए हैं। एक महाशक्ति के रूप में अमेरिका की साख एवं नेतृत्व क्षमता पर भी संकट खड़ा हो गया है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में हिंद प्रशांत क्षेत्र को रणनीतिक पहचान दी थी और जापान, आस्ट्रेलिया, यूरोपीय देशों तथा आसियान ने भी चीन से मुकाबला करने के लिए इसे व्यापकता दी। भारत ने इसे सैन्य रणनीति से कहीं ज्यादा समुद्री सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, आपदा प्रबंधन, संपर्क, व्यापार और क्षमता निर्माण से जोड़ कर इसे बहुआयामी बनाया।
हिंद-प्रशांत विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण और परस्पर जुड़े हुए क्षेत्रों में शुमार है। यह विशाल समुद्री क्षेत्र पूर्वी अफ्रीका के तट से लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट तक फैला हुआ है। विश्व की लगभग आधी जनसंख्या और वैश्विक व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
हिंदी-प्रशांत क्षेत्र से होता है साठ फीसद से अधिक व्यापार
अपने प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता तथा सांस्कृतिक विविधता के कारण यह क्षेत्र वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का केंद्र बन गया है। हिंद-प्रशांत केवल हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के भौगोलिक जुड़ाव का संकेत नहीं देता, बल्कि यह एशिया, अफ्रीका और आसियान के देशों के बीच बढ़ती रणनीतिक, आर्थिक तथा सुरक्षा साझेदारी का भी प्रतीक है। समुद्री मार्गों से वस्तुओं और ऊर्जा के साठ फीसद से अधिक व्यापार का आवागमन इसी क्षेत्र से होता है।
भारत हिंद प्रशांत की व्यापक अवधारणा के केंद्र में कई कारणों से है। भारत हिंद महासागर के केंद्र में स्थित है और मलक्का जलमार्ग, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों पर उसकी प्रभावी पहुंच है। विश्व के ऊर्जा व्यापार और समुद्री वाणिज्य का बड़ा हिस्सा इन्हीं मार्गों से होकर गुजरता है। यदि कभी संकट की स्थिति उत्पन्न होती है, तो भारत इन समुद्री मार्गों की सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
भारत के बिना ‘क्वाड’ अमेरिकी रणनीति तक सीमित
अमेरिका के लिए यह सामरिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है। भारत हिंद-प्रशांत का एक लोकतांत्रिक, स्थिर और विश्वसनीय साझेदार रहा है। अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के साथ भारत की भागीदारी ने ‘क्वाड’ को क्षेत्रीय स्थिरता का एक अहम मंच बना दिया है। यदि भारत इसका हिस्सा न हो, तो हिंद-प्रशांत की अवधारणा केवल अमेरिकी या पश्चिमी रणनीति तक सीमित दिखाई दे सकती है और इससे विकासशील देश आशंकित हो सकते हैं।
भारत की नौसैनिक क्षमता मजबूत है और यह हिंद महासागर में मानवीय सहायता, समुद्री सुरक्षा तथा आपदा राहत कार्यों में बड़ी भूमिका निभा रही है। भारत के अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलमार्ग के निकट है, जो चीन की समुद्री आपूर्ति शृंखला पर निगरानी रखने की दृष्टि से अहम है। यह सामरिक लाभ अमेरिका के पास नहीं है।
अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे
अब अमेरिका ‘इंडो-पैसिफिक’ जैसी व्यापक और स्थापित अवधारणा से हट कर इसे ‘यूएस-पैसिफिक’ कह रहा है, तो इसमें अमेरिकी वर्चस्व का स्पष्ट संकेत है और इससे स्वयं उसे रणनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हाल के वर्षों में अमेरिका की वैश्विक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठे हैं। ट्रंप की नीतियों के कारण अमेरिका अपने दीर्घकालीन रणनीतिक दायित्वों के बजाय अल्पकालिक आर्थिक और घरेलू राजनीतिक प्राथमिकताओं को अधिक महत्त्व दे रहा है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अनेक देश अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के बीच नया संतुलन तलाशने के लिए चीन के साथ संबंधों को और प्रगाढ़ कर सकते हैं। अमेरिकी प्रतिबद्धताओं पर अनिश्चितता बढ़ने की स्थिति में चीन का प्रभाव इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत बढ़ सकता है।
हिंद महासागर में भारत की केंद्रीय स्थिति
चीन की समुद्री विस्तारवादी नीति का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के पास भारत से अधिक विश्वसनीय और सक्षम साझेदार नहीं है। हिंद महासागर में भारत की केंद्रीय स्थिति, उसकी बढ़ती नौसैनिक शक्ति और स्वतंत्र विदेश नीति उसे हिंद-प्रशांत रणनीति का अपरिहार्य स्तंभ बनाती है। जापान और आस्ट्रेलिया इस भू-रणनीतिक सच्चाई को समझते हुए भारत के साथ रक्षा, समुद्री सुरक्षा और उच्च प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में लगातार अपने संबंधों को गहरा कर रहे हैं।
यदि अमेरिका इस वास्तविकता की अनदेखी करता है, तो वह पूरे हिंद-प्रशांत में अपनी रणनीतिक बढ़त को भी कमजोर करने का जोखिम उठाएगा। चीन ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना को साकार कर दुनिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और उसके केंद्र में हिंद प्रशांत क्षेत्र की अहम भागीदारी है। भारत अपनी सुरक्षा मजबूरियों के कारण अमेरिका का स्वभाविक सहयोगी बन गया है।
चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का प्रमुख भागीदार
चीन पाकिस्तान की बढ़ती साझेदारी ने भारत की सामरिक समस्याएं बढ़ाई हैं। चीन पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का प्रमुख भागीदार है। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह, बांग्लादेश का चटगांव बंदरगाह, म्यांमा की सितवे परियोजना समेत मालदीव के कई निर्जन द्वीपों पर चीनी कब्जे से भारत की समुद्री सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ गई हैं। दक्षिण चीन सागर का इलाका हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच है और चीन, ताइवान, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्रुनेई और फिलीपींस से घिरा हुआ है।
अमेरिका को यह समझना होगा कि महाशक्तियां केवल आर्थिक शक्ति से नहीं, बल्कि दीर्घकालीन रणनीतिक प्रतिबद्धताओं और विश्वसनीय साझेदारियों से अपना नेतृत्व कायम करती हैं। उसने हिंद-प्रशांत की अवधारणा को कमजोर कर अपने सबसे बड़े रणनीतिक निवेश को दांव पर लगा दिया है। उसका यह दृष्टिकोण उन रणनीतिक साझेदारियों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं को कमजोर कर रहा है, जिनके बल पर अमेरिका ने दशकों तक वैश्विक नेतृत्व बनाए रखा।
अमेरिका की नीतियों से अनिश्चितता बढ़ी
अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों से यूरोप से लेकर हिंद-प्रशांत तक अनिश्चितता बढ़ी है। अब भारत को हिंद महासागर में अपनी समुद्री कूटनीति और क्षेत्रीय साझेदारियों को नए सिरे से मजबूत करना होगा। जापान, आस्ट्रेलिया और आसियान देश भारत के स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार बन सकते हैं। भारत किसी एक महाशक्ति पर निर्भर हुए बिना अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को और सुदृढ़ कर सकता है। बहरहाल, अमेरिका की ‘यूएस पैसेफिक’ की नई रणनीति को भारत के लिए हिंद महासागर क्षेत्र में एक विश्वसनीय, स्थिर और नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को और प्रभावी बनाने के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
