Budget 2026: इस बार के केंद्रीय बजट ने देश को एक नया आर्थिक मंत्र दिया है। इसे ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ (आरेंज इकोनोमी) का नाम दिया गया है। यह भारत के विकास की उस नई अवधारणा का प्रतीक है जो र्इंट-गारे या भारी मशीनों पर नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की असीम रचनात्मकता पर टिकी है।

दरअसल, जब हम इस अर्थव्यवस्था से देश के विकास की बात करते हैं, तो हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर रहे होते हैं जो दुनिया का कारखाना बनने की बजाय विश्व का ‘विचार-कक्ष’ बनने की ओर अग्रसर है। यह बदलाव भारत की आर्थिक तकदीर बदलने की क्षमता रखता है, क्योंकि यह हमारी सबसे बड़ी ताकत, हमारी युवा आबादी और समृद्ध संस्कृति का सीधा उपयोग करता है।

वैश्विक स्तर पर देखें, तो आज दुनिया के विकसित देश अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का बड़ा हिस्सा बौद्धिक संपदा और रचनात्मक उद्योगों से प्राप्त करते हैं। भारत का यह कदम उसे वैश्विक महाशक्तियों की कतार में खड़ा करने की एक सुविचारित रणनीति है। ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ का मूल सिद्धांत यह है कि एक विचार, एक डिजाइन या एक कहानी, तेल के कुएं या सोने की खदान से भी अधिक मूल्यवान हो सकती है।

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परंपरागत अर्थव्यवस्था में संसाधनों की एक सीमा होती है, लेकिन रचनात्मकता का स्रोत अनंत है। वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार ने एनिमेशन, गेमिंग और अन्य डिजिटल सामग्री निर्माण को जिस तरह प्राथमिकता दी है, वह इस बात का संकेत है कि भारत अब अपनी बौद्धिक संपदा से धन कमाना चाहता है। अब तक हम दुनिया के लिए ‘कोडिंग’ करते थे, विदेशी कंपनियों के लिए डेटा पर काम करते थे, लेकिन उत्पाद उनका होता था और असली मुनाफा भी उन्हीं का होता था। मगर ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ इस समीकरण को बदल देती है।

जब भारत में बना कोई वीडियो गेम, कोई फिल्म या कोई फैशन डिजाइन दुनिया भर में बिकता है, तो उसका मालिकाना हक भारत के पास रहता है। यह ‘सेवा प्रदाता’ से ‘मालिक’ बनने की यात्रा है, जो देश के आर्थिक स्वाभिमान को नई ऊंचाई देगी। जब हम किसी विदेशी कंपनी के लिए काम करते हैं, तो हमें एक बार भुगतान मिलता है, लेकिन जब हम किसी रचनात्मक उत्पाद के मालिक होते हैं, तो वह उत्पाद हमें वर्षों तक और कभी-कभी पीढ़ियों तक कमाई करके देता है। यही वह तरीका है जिसने अमेरिका और जापान की अर्थव्यवस्थाओं को इतना मजबूत बनाया है। अब भारत उसी राह पर चल पड़ा है।

देश के विकास में इस अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा योगदान रोजगार के स्वरूप को बदलने में होगा। भारत के पास दुनिया में सबसे अधिक युवा है, लेकिन हर युवा इंजीनियर या डाक्टर नहीं बन सकता। लाखों युवाओं के पास कलात्मक प्रतिभा है। कोई अच्छा चित्रकार है, कोई संगीतकार है, तो कोई कहानियां लिख सकता है। अब तक इस प्रतिभा को केवल शौक माना जाता था, जिससे आजीविका नहीं चलती थी। मगर ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ ने इन हुनर को उच्च भुगतान वाले करिअर में बदल दिया है।

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सरकार द्वारा स्कूलों और कालेजों में पंद्रह हजार ‘कंटेंट क्रिएटर लैब’ खोलने की घोषणा ने इस बदलाव को संस्थागत रूप दे दिया है। जब एक साधारण परिवार का बच्चा स्कूल में ही डिजिटल कला और डिजाइन की बारीकियां सीखेगा, तो वह भविष्य में नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि अपनी कला के दम पर दुनिया से काम लेने वाला बनेगा। ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ विकास को बड़े शहरों से निकाल कर छोटे शहरों और गांवों तक ले जाती है।

एक बड़ी फैक्टरी लगाने के लिए जमीन, बिजली और परिवहन की जरूरत होती है, जो विशेष औद्योगिक क्षेत्रों में ही संभव है। मगर रचनात्मकता के लिए केवल एक कंप्यूटर, इंटरनेट और एक कुशल दिमाग की जरूरत होती है। आज भारत के एक छोटे शहर या कस्बे का कोई भी ग्राफिक डिजाइनर घर बैठे अमेरिका या यूरोप के ग्राहकों के लिए काम कर सकता है। यह भौगोलिक बाधाओं को पार कर आर्थिक अवसरों का विकेंद्रीकरण है।

जब छोटे शहरों में पैसा आता है, तो वहां के स्थानीय बाजार फलते-फूलते हैं और पलायन की मजबूरी कम होती है। इस तरह, ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ केवल जीडीपी के आंकड़े नहीं बढ़ाती, बल्कि यह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी वैश्विक बाजार से जोड़ती है। इस विकेंद्रीकरण का एक और लाभ महिला सशक्तीकरण के रूप में सामने आ रहा है। हमारे देश में कई प्रतिभाशाली महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण घर से बाहर जाकर सुबह नौ से शाम पांच बजे की नौकरी नहीं कर पाती थीं। अब उनके लिए भी राहें खुलेंगी।

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‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ केवल डिजिटल दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की हजारों साल पुरानी हस्तशिल्प और कारीगरी की परंपरा को भी पुनर्जीवित कर रही है। भारत के कोने-कोने में बांस की कलाकारी, मधुबनी पेंटिंग और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लाखों कारीगर हैं। यह अर्थव्यवस्था इन पारंपरिक कौशलों को आधुनिक डिजाइन और ई-कामर्स के साथ जोड़ती है। जब एक आदिवासी कलाकार की बनाई पेंटिंग को डिजिटल रूप में बेचा जाता है या जब खादी के कपड़ों को एक फैशन ब्रांड के रूप में दुनिया के सामने रखा जाता है, तो यह परंपरा और तकनीक का एक अनूठा संगम होता है।

यह ‘वोकल फार लोकल’ अभियान को ‘लोकल फार ग्लोबल’ में बदलने की शक्ति रखता है। इससे न केवल हमारी विरासत सुरक्षित रहती है, बल्कि उन कारीगरों को भी उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलता है जो अब तक बिचौलियों के कारण शोषण का शिकार थे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में, ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ भारत के लिए एक सुरक्षा कवच है। जैसे-जैसे मशीनें इंसानों के नियमित काम छीन रही हैं, यह सवाल उठता है कि भविष्य में इंसान क्या करेगा?

इसका उत्तर रचनात्मकता में छिपा है। मशीनें गणना कर सकती हैं, लेकिन वे मानवीय संवेदनाओं के साथ मौलिक सृजन नहीं कर सकतीं। इसलिए, रचनात्मक क्षेत्र में निवेश करना देश के भविष्य को सुरक्षित करना है। यह सुनिश्चित करता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ मानवीय रूप से भी प्रासंगिक बनी रहें। जब मानव मस्तिष्क की कल्पनाशीलता कृत्रिम मेधा की गति के साथ मिलती है, तो परिणामों की गुणवत्ता कई गुना बढ़ जाती है।

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भारत का युवा वर्ग, जो तकनीक को बहुत जल्दी अपनाता है, इस सह-अस्तित्व का सबसे अच्छा उदाहरण बन कर उभर सकता है। जब रचनात्मक उद्योग बढ़ता है, तो इसका फायदा सिर्फ कलाकारों को नहीं मिलता। इससे हार्डवेयर बनाने वाली कंपनियों की बिक्री बढ़ती है, इंटरनेट डेटा की खपत बढ़ती है और पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। इससे स्थानीय टैक्सी वालों, होटल वालों और दुकानदारों की भी आय बढ़ती है। यानी एक रचनात्मक विचार पूरी अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह बढ़ा देता है।

वास्तव में, ‘नारंगी अर्थव्यवस्था’ भारत के आत्मविश्वास की एक नई कहानी है। यह इस विश्वास की बहाली है कि भारतीय दिमाग केवल नौकरी करने के लिए नहीं, बल्कि नए आविष्कार और नई दुनिया रचने के लिए बना है। जब देश का युवा अपनी शर्तों पर, अपनी भाषा में और अपनी संस्कृति के रंगों में दुनिया को कुछ नया देगा, तो उसी से विकास की सार्थकता परिभाषित होगी। एसआईआर मामले में सीएम ममता बनर्जी की सुप्रीम कोर्ट में उपस्थिति के खिलाफ अर्जी दायर