मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में वह बहुत सारे रिश्तों के साथ रहता है। हर व्यक्ति का रिश्ता किसी दूसरे के साथ अलग तरह का होता है। समाज में बहुत से रिश्ते हमें विरासत में मिलते हैं, जिन्हें हम कई बार पारिवारिक, तो कभी सामाजिक दबावों की वजह से निभाते हैं। ऐसे रिश्ते धीरे-धीरे मरते जाते हैं और फिर एक समय आता है कि जब वे टूट जाते हैं।
पहले ये रिश्ते झगड़ों के बाद भी बने रहते थे, जिसके अनेक कारण थे। मगर अब भौतिक साधनों के चलते परस्पर निर्भरता कम हुई है। कभी-कभी कुछ समय चलने के बाद रिश्तों में एक-दूसरे से कुछ नहीं कह पाने की ऊहापोह अबोलेपन में बदल जाती है और फिर दूरियां बढ़ते-बढ़ते रिश्तों की डोर कब टूट जाती है, पता ही नहीं चलता। किसी भी रिश्ते को खींच-खींचकर लंबे समय तक निभाया नहीं जा सकता है।
सामाजिक रिश्तों में दोस्ती का रिश्ता हम खुद चुनते हैं। एक जैसे आचार-विचार, पसंद-नापसंद और सम्मानजनक व्यवहार करने वाले दो व्यक्ति परिचय से आगे बढ़कर कब हाथ बढ़ाकर दोस्त बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता। यह दोस्ती एक-दूसरे के लगातार संपर्क से सुकून की तरफ जाने लगती है। दोस्ती का रिश्ता हमें खास महसूस करवाता है, जिसे हमने चुना होता है और जिसमें कोई बाध्यता नहीं, निभाने का कोई दबाव नहीं।
दोस्ती शब्द में पूरी दुनिया समाई
‘दोस्ती’ एक छोटा-सा शब्द है, लेकिन इसमें पूरी दुनिया समाई होती है। बिना दोस्ती के हमारा जीवन अधूरा-सा महसूस होता है, जहां हम दिल खोलकर बातें करते हैं और जहां मुश्किल समय में हम दोस्त के लिए खड़े रहते हैं। दोस्ती का रिश्ता अमीरी-गरीबी, अच्छे-बुरे या किसी भी भेदभाव को नहीं देखता। यह सच्चाई और समर्पण पर आधारित होता है।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मजबूत रिश्ते तनाव को कम करते हैं और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करते हैं। हाल के अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि जिन लोगों के पास अच्छे रिश्ते होते हैं, वे अधिक खुश और स्वस्थ होते हैं। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति जो अपने मित्रों के साथ नियमित रूप से समय बिताता है, वह अधिक संतुष्ट और खुश रहता है।
दो दोस्त बहुत कुछ समानता रखते हुए भी भिन्न होते हैं। इसलिए ‘‘दोस्ती एक कला है’’, जिसमें हर व्यक्ति एक-दूसरे की निजता का सम्मान करता है, उसे प्रेरित करता है, उसके सुख-दुख का साथी होता है। मगर बहुत निकटता होने के बावजूद हर व्यक्ति का एक निजी कोना भी होता है, जिसमें प्रवेश करना वर्जित होता है। इसलिए दूसरे को सुनना और समझना बहुत आवश्यक है। दूसरे की निजता का सम्मान करना बहुत जरूरी है। कई बार हम किसी दूसरे के अंदर की आवाज सुने बिना अपनी इच्छाएं उस पर लादने लगते हैं, जिससे व्यावहारिक समस्याएं पैदा होने लगती हैं।
मगर रिश्तों की मजबूत डोर तो दिलों से बंधी होती है, जिसे कोई भी अलग नहीं कर सकता। दोस्ती पर कितने ही गीत बने हैं, फिल्में बनी हैं, जिन्होंने दोस्ती की मिसाल पेश की है, मौन को पढ़ना सिखाया है।
दोस्ती महसूस करने का रिश्ता
दोस्ती कहने भर का शब्द नहीं, महसूस करने का रिश्ता है। यह एक गंभीर चिंतन का विषय है कि हमें अपने रिश्तों को कैसे सहेजना है? रिश्तों को नियमों में नहीं बांधा जा सकता। दोस्ती करना सिखाया नहीं जा सकता। एक समय के बाद हम कभी-कभी दूसरे दोस्त से पहले जैसे व्यवहार की अपेक्षा करने लगते हैं, जो व्यवहार हमें पहले मिलता था, हमें वही व्यवहार चाहिए होता है। हम यह क्यों भूल जाते हैं कि दोस्त भी एक व्यक्ति है, उसमें भी हर दिन बदलाव हो रहा है- शरीर का, भावनाओं का, उसकी स्थितियों का और आवश्यकताओं का। इसलिए पहले जैसी मांग की अपेक्षा कई बार हमें और दोस्त, दोनों को असमंजस में डाल देती है।
दो मित्रों के बीच संवाद एक-दूसरे को समझने और सामंजस्य स्थापित करने में मदद करता है। फिर भी कई बार जब हम किसी व्यक्ति से किन्हीं कारणों से दूर होना चाहते हैं, उसे भी सहजता से स्वीकार करना चाहिए। इसमें दूसरे की इच्छा सर्वोपरि है, लेकिन ऐसे में कई बार जब हम दूसरे पर अपना हक जताने लगते हैं, तो रिश्ते में दरार पड़ने लगती है और यह स्थिति कई बार इतनी बढ़ जाती है कि दोस्ती, दुश्मनी में बदल जाती है। जो आज हमारे दोस्त हैं, वही कल दुश्मन हो जाता है।
मगर हम यह क्यों यह भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की मानसिक स्थिति और आवश्यकता हमेशा एक-सी नहीं रहती। आज जो उसकी पसंद है, हो सकता है कल वह न हो। हमें रिश्तों के प्रति सहज रहना चाहिए। आपसी समझ और स्वतंत्रता बहुत जरूरी है। किसी भी रिश्ते में अगर कोई नहीं रहना चाहता हो, तो उसे सहजता से स्वीकार करना चाहिए। जब चुनने की स्वतंत्रता है, तो अलग होने की क्यों नहीं? बिना किसी को आहत किए हम खुद को उस रिश्ते से बाहर निकाल सकते हैं। यह दोनों के सम्मान को बनाए रखेगा और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देगा।
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