हर सफल संस्था की रीढ़ ईमानदार और परिश्रमी लोगों से बनती है। किसी दफ्तर, विद्यालय या शासन व्यवस्था की गाड़ी उन गिने-चुने लोगों के श्रम, निष्ठा और जिम्मेदारी से चलती है, जो अपने कर्तव्य को धर्म समझते हैं। ऐसे लोग बिना किसी पुरस्कार या प्रशंसा की अपेक्षा के अपने हिस्से का काम पूर्ण मनोयोग से करते हैं। इन्हीं लोगों के परिश्रम के कारण ही कई खोटे सिक्के भी सहजता से चल जाते हैं। वे जानते हैं कि संस्था की साख इन ईमानदार लोगों से बनी है, इसलिए खोटे कर्मचारियों के दोष उसी उज्ज्वल साख की परछाई के पीछे छिप जाते हैं।
एक कहावत है कि खोटे सिक्के खरे सिक्कों की आड़ में चल पाते हैं। यह तथ्य केवल बाजार या मुद्रा तक सीमित नहीं, यह तो जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है। वैसे सरकारी दफ्तरों का उदाहरण देखा जा सकता है, जहां असंख्य खरे सिक्के भी हैं, ईमानदार, कर्मठ, जिम्मेदार कर्मचारी, पर इनको अक्सर खोटे सिक्कों के साथ सहअस्तित्व बना कर चलना पड़ता है। ये राष्ट्र की सेवा का भाव लेकर काम करते लोग, अपने काम को साधना समझते लोग, सुबह समय पर पहुंचते लोग, समय से फाइलें निपटाते लोग, घर लौटते समय यह संतोष रखते हैं कि आज का दिन निष्कलंक गया, फलदायी गया। मगर यथार्थ में ऐसे लोग ही धीरे-धीरे सबसे अधिक अकेले पड़ जाते हैं, क्योंकि वे व्यवस्था के ‘गैरलिखित नियमों’ को नहीं जानते। वह नियम, जो कहता है कि यहां काम से नहीं, जनसंपर्क से, कुशल व्यवहार से हर गति है।
धीरे-धीरे ये खरे सिक्के यह महसूस करते हैं कि उसकी चमक आसपास के लोगों की आंखों को चुभती है। उसके खिलाफ एक अनकही अस्वीकार्यता का वातावरण तैयार हो जाता है। नतीजतन, उसे अलग-थलग कर दिया जाता है। उसके उत्साह को ‘दिखावा’ उसके परिश्रम को बेमानी कहा जाता है। मनुष्य का मनोविज्ञान यही है, जिसके श्रम के कारण हमारी सुस्ती प्रकाश में आए, उसके श्रम को ही असहज बना दिया जाए। धीरे-धीरे वही होता है, जो नहीं होना चाहिए। औसतपन एक आदर्श बन जाता है और जिस आदर्श कार्यशैली से सबको प्रेरणा लेनी चाहिए थी, वह बुझती हुई खंभा-बत्ती बन कर रह जाती है। इस प्रवृत्ति की वजह से किसी भी संस्थान के संवेदनशील न होने का पता चलता है, एक विचित्र दांवपेच को बढ़ावा मिलता है, योग्य और सक्षम लोगों को दरकिनार होना पड़ता है, लेकिन इसका खमियाजा समूचे संस्थान को उठाना पड़ता है। इसके बावजूद समाज को इस प्रकृति से बहुत ज्यादा गुरेज नहीं होता।
सरकारी तंत्र में तो यह प्रवृत्ति और गहरी है। वहां समय के साथ ‘खोटे सिक्के’ एक-दूसरे के लिए कवच बन जाते हैं। वे एक-दूसरे की गलतियां ढकते हैं, एक-दूसरे की उपस्थिति को आवश्यक बनाते हैं। जबकि जो ‘खरे’ हैं, वे अपने ही ईमान की सजा भुगतते हैं। कोई भी उन्हें खुलकर बुरा नहीं कहता, बस उनके आसपास एक अजीब-सी चुप्पी बुन दी जाती है। यह एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक बहिष्कार है, सूक्ष्म और घातक। इसके असर का अंदाजा लगाना क्या इतना मुश्किल है?
मनुष्य का मन सदैव समूह की स्वीकृति चाहता है। इसलिए वह अपने अंतर्मन की सच्चाई के बजाय समूह के मानदंडों को सत्य मानने लगता है। जब औसतपन एक आदर्श बन जाता हो, तो अपनी क्षमता पर संदेह होना स्वाभाविक है। मनुष्य सबसे अधिक सहज तब होता है, जब उसे अपने गलत होने का डर नहीं रहता। यही बात कार्यालयों पर भी लागू होती है। वहां जो व्यक्ति नियम तोड़ता है, यह जानता है कि वह अकेला नहीं। काम करने वालों की अपेक्षा काम न करने वाले सदैव संख्या में अधिक रहेंगे। यही संख्या बल का आत्मविश्वास उसे निर्भीक बनाता है, और यही निर्भीकता ईमानदारों की असहजता का कारण बनती है।
एक उदाहरण देखा जा सकता है। किसी दफ्तर में दो कर्मचारी हैं। पहला हर महीने समय पर फाइलें पूरी करता है, किसी से रिश्वत नहीं लेता। दूसरा काम टालता है, कभी किसी की फाइल रोक देता है, कभी ‘चाय पानी की भाषा’ में बात करता है। मगर जब अहम वक्त आता है, तो दूसरे वाले की ‘मिलनसार प्रवृत्ति’ और ‘सामाजिक बुद्धिमत्ता’ की तारीफ की जाती है। जबकि वास्तविक रूप में कार्य करने वाले की अच्छाई केवल तब तक अच्छी लगती है, जब तक वह दूसरों को आईना नहीं दिखाती।
खोटे सिक्के चल पाते हैं, क्योंकि उनका चलन सामूहिक समझौते से बनता है। कोई उन्हें रोकता नहीं, क्योंकि हर कोई कहीं-न-कहीं वैसा थोड़ा-थोड़ा बन चुका होता है। व्यवस्था में इसे ‘मौन सहमति’ प्राप्त होती जाती है। धीरे-धीरे यह स्थिति इतनी सामान्य हो जाती है कि खरे सिक्के स्वयं को अनुपयोगी समझने लगते हैं। वे या तो घर बैठ जाते हैं, या स्वयं को औसत बना लेते हैं। और यही वह क्षण है जहां हम देखते हैं कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। यह उक्ति केवल अर्थशास्त्र का ही नहीं, मनोविज्ञान का सबसे क्रूर सत्य उजागर करती है। जब समाज, संस्था, या व्यवस्था में खोटे सिक्कों का बोलबाला हो जाता है, तब खरे सिक्के अपने ही मूल्य से वंचित हो जाते हैं। वे चलन से बाहर हो जाते हैं, जैसे नैतिकता, आदर्श, सच्चाई, श्रम, लगन ये सब घिसी-पिटी बातें हों। और फिर धीरे-धीरे खोटे सिक्के ही असली मुद्रा बन जाते हैं- सबकी जेबों में, सबके मन में!
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हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां लोग एक-दूसरे के जीवन में बहुत रुचि लेते हैं। यह रुचि कई बार अपनापन लगती है, लेकिन कई बार यही दखलंदाजी बन जाती है। जब कोई सार्वजनिक जगह पर रिश्तों का सहारा लेकर किसी से उसके जीवन के फैसलों पर सवाल करता है, तो वह केवल एक साधारण बात नहीं होती। वह उस व्यक्ति के आत्मसम्मान को छू जाती है। हर इंसान का जीवन उसका अपना होता है। उसमें उसके सपने होते हैं, उसकी मेहनत होती है, उसकी विफलताएं होती हैं और उम्मीदें भी। हर किसी की गति अलग होती है। कोई जल्दी सफलता पा लेता है, कोई देर से। कोई अपनी राह खुद चुनता है, कोई परिवार की अपेक्षाओं के साथ चलता है। समस्या यह है कि समाज सबके लिए एक ही तरह के मापदंड बना देता है। ऐसे में जो उससे अलग चलता है, वह सवालों के घेरे में आ जाता है। पूरी खबरें पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
