सुबह का समय है, शहर पूरी तरह जागा नहीं है, लेकिन किसी अनदेखे पेड़ की डाल से चहचहाहट बह रही है। क्या यह केवल पक्षियों की आवाज होगी, या फिर ऐसा लगता है कि प्रकृति हमसे संवाद करना चाहती है। यकीन किया जा सकता है कि इस कोलाहल भरी दुनिया में, जहां हर क्षण शोर, सूचना और जल्दबाजी से भरा है, पक्षियों को सुनना, उन्हें निहारना एक मौन उत्सव है।

आज का मनुष्य निरंतर दौड़ में है। उसे हर पल कहीं पहुंचना है, अंगुलियां मोबाइल की स्क्रीन पर फिसलती रहती हैं और आंखें नीली रोशनी में उलझी रहती हैं। ऐसे समय में, आकाश में फड़फड़ाते खग हमें ठहरना सिखाते हैं। पक्षी न बीते कल का बोझ ढोते हैं, न आने वाले कल की चिंता करते हैं। शायद सुनने में यह अजीब लगे, लेकिन पक्षियों को निहारना मानसिक तनाव को दूर करने में एक थेरेपी की तरह कार्य करता है। पक्षियों के क्रियाकलाप का अवलोकन एक सम्मोहन की तरह मन पर असर करता है।

जब आंखें रंगीन पंखों पर ठहरती हैं, चिड़िया की छोटी-सी फुदकन, उसकी गर्दन का हल्का-सा झुकाव, दाने की तलाश में इधर-उधर होती उसकी चंचल दृष्टि- ये सभी दृश्य मिलकर गहरे ध्यान का एक सहज रूप रचते हैं। यह वह ध्यान है, जिसमें कोई यम-नियम नहीं, कोई आसन नहीं, कोई सांसों का अभ्यास नहीं, बस देखने की फुरसत हो, तो मन जैसे किसी पृथक लोक का वासी हो जाता है, जैसे मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई पुराना संबंध फिर से जाग उठा हो।

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उपनिषदों में एक सांकेतिक कहानी आती है। एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं। नीचे की डाल पर बैठा पक्षी (मनुष्य) फल खाते-खाते ऊपर पहुंचता है और पाता है दूसरा पक्षी (ईश्वर), तो वह स्वयं ही है। यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच संबंध का प्रतीक है। यह कथा अपने आप में संपूर्ण है, यह जताने के लिए अपने अंदर के खग को टटोला जाए और प्रकृति के खग से उसका संवाद स्थापित किया जाए। फिर देखा जा सकता है कि कायापलट हो, न हो, मन-पलट अवश्य ही हो जाएगा।

भारतीय परंपरा में पक्षी दूर रहने वाले पक्षी नहीं हैं। वे मित्र हैं। वे ऋतुओं के आगमन का संकेत देते हैं। हमारे संदेश पहुंचाते हैं। जटायु के रूप में रक्षा करते हैं। जोड़े के रूप में जब अमरनाथ की गुफा में चिर निवास करते हैं, तो पूजे जाते हैं। लक्ष्मी का वाहन एक पक्षी है, पितर पक्षी के रूप में भोग लगाने आते हैं, राष्ट्रीय पक्षी मोर है।

करियर हो या व्यक्तित्व, बदलाव अपनाने वाले ही बनते हैं आत्मविश्वासी और सफल, आगे बढ़ना है तो ठहरना नहीं

सैमुअल टेलर कोलरिज द्वारा रचित ‘द राइम आफ द एन्शिएंट मैरिनर’ एक वृद्ध नाविक की कहानी है, जो बताता है कि कैसे उसने बिना वजह एक शुभ पक्षी ‘अल्बाट्रास’ को मार डाला। नाविक द्वारा पक्षी को मारने के बाद, उसका जहाज दक्षिणी ध्रुव के बर्फीले इलाके में फंस जाता है, जहां पीने लायक पानी उपलब्ध नहीं है। नाविक के साथी उसे दोषी मानकर उसके गले में मृत पक्षी लटका देते हैं। सभी साथी मर जाते हैं, सिवाय नाविक के। नाविक को जीवन भर अपनी कहानी सुनाकर प्रायश्चित करने का शाप मिलता है। नाविक को अपने कृत्य का अहसास होता है और वह ईश्वर की सभी रचनाओं के प्रति प्रेम और सम्मान सीखता है। मानव और पक्षी के बीच के संबंध को बताने वाली इससे सुंदर कोई गाथा नहीं।

आज भी अगर आत्मशुद्धि की किसी थेरेपी में धन खर्च करने की सामर्थ्य न हो, तो किसी भी पार्क या पक्षी-विहार में चले जाना चाहिए। पक्षियों को निहारना धैर्य सिखाता है। उनकी चुहलबाजी हमें सम्मोहित कर लेती है। अंत:करण की नकारात्मकता प्रक्षालित होने लगती है। पंख फैलाकर नृत्य करते मयूर को देखकर किसकी ध्यानावस्था सहज नहीं लग जाएगी? पक्षियों की चहचहाहट में कोई उपदेश नहीं होता, फिर भी वह बहुत कुछ सिखा जाती है। वह बताती है कि आनंद पाना जटिल प्रक्रिया नहीं है। मन का अच्छा होना, किसी बड़ी उपलब्धि पर निर्भर नहीं करता, कभी-कभी यह अनमोल अनुभूति बस डाल पर बैठे एक परिंदे के रूप में सामने आ जाती है।

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पक्षियों को निहारना हमें यह भी याद दिलाता है कि हम इस धरती के अकेले उपभोगी नहीं हैं। हम एक विशाल जीवन-जाल का हिस्सा हैं, जहां हर जीव का अपना स्थान है, अपनी भूमिका है। यह अनुभूति मनुष्य के भीतर करुणा जगाती है। वह उसे विनम्र बनाती है, उसे उसकी सीमाओं और जिम्मेदारियों का बोध कराती है। जब हम किसी छोटे से पक्षी के जीवन को ध्यान से देखते हैं, तो जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण भी थोड़ा कोमल हो जाता है।

आज जब अकेलापन एक आम अनुभव बनता जा रहा है, तो पक्षियों के साथ यह मौन संगति एक सहारा बन सकती है। वे हमारे दुख नहीं पूछते, हमारी सफलताओं से प्रभावित नहीं होते, फिर भी हमारे साथ होते हैं- एक चिकित्सक की तरह। और इसके लिए किसी विशेष भारी-भरकम तैयारी की आवश्यकता भी नहीं होती। किसी पक्षी विहार में नहीं जाया जा सकता हो, तो बस अपने कमरे की खिड़की खोल लेना चाहिए, बालकनी में खड़े हो जाना चाहिए, नजदीक के किसी पार्क में चले जाना चाहिए, छत पर कुछ देर रुक जाना चाहिए या फिर किसी पेड़ के नीचे बैठ जाना चाहिए। संभव है कि वहीं कहीं किसी डाली पर बैठा, किसी पत्ते के पीछे छिपा हमारा प्राकृतिक चिकित्सक आपकी प्रतीक्षा कर रहा हो।