कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है
-श्रीकांत वर्मा

2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया अब जाकर पूरी हुई लगती है। परिवारवाद के खिलाफ हुए युद्ध के अश्वमेध घोड़े पर चढ़ कर राजग ने बिहार में प्रवेश किया, तो घोड़े की लगाम पहले दीपक कुशवाहा ने पकड़ी और सीधे मंत्रिपद की शपथ ली। निराश अश्व आगे बढ़ा तो निशांत कुमार ने लगाम पकड़ ली। सम्राट चौधरी को देख कर घोड़ा खुद ही ठिठक गया। कभी कथित जंगलराज वाले दल के नेता, परिवारवाद की मिसाल, उम्र के मसले पर मंत्रिपद से बर्खास्त, और उनकी शैक्षणिक योग्यता पर चौतरफा सवाल। कभी विश्वविद्यालयों से छात्र-नेता निकलते थे, और अब नेताओं की स्कूली शिक्षा पर भी सवाल है। नीतीश कुमार से शुरू हुआ चुनाव सम्राट चौधरी पर खत्म हुआ। बिहार में सत्ता के शपथग्रहण में‘विद्या’ के विदाई समारोह पर बेबाक बोल

‘शिक्षा व्यक्ति को विनम्रता देती है। विनम्रता से पात्रता अर्थात योग्यता आती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है। धन से धर्म का पालन होता है। धर्म से ही परम सुख प्राप्त होता है।’ ‘हितोपदेश’ का यह श्लोक देश की कई जगहों की तरह आज बिहार में जाकर भी अपनी प्रासंगिकता खो बैठा है।

ऐसा पद मिला जिसके लिए आदर्श पात्रता की मांग होती है। यह पद तो राज्य के खजाने की चाबी है, यानी धन भी भरपूर मिला। और, धर्म के तो आप ध्वजवाहक हैं ही। धर्म को लेकर तो इतने उत्साही हो जाते हैं कि सम्राट अशोक और गौतम बुद्ध की बातचीत तक करवा देते है। पद, धन और धर्म रक्षक की तिकड़ी में जिस एक चीज की जरूरत बिल्कुल भी नहीं रही, वह है विद्या।

बिना विद्या के उस बिहार में आपने यह सब अर्जित किया, जिसे ज्ञान की धरती कहा जाता है। प्रवासियों की समस्या को भुलाने के लिए जहां के लोग दावा करते हैं कि हमारे यहां से सबसे ज्यादा आइएएस बनते हैं। (हालांकि यह दावा है, आंकड़ों से कोई नाता नहीं), वहां एक ऐसे व्यक्ति को राज्य की कमान सौंपी गई है, जिनकी स्कूली शिक्षा सवालों के घेरे में है, उच्च शिक्षा की बात तो छोड़ ही देते हैं।

बिहार ने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है कि आखिर राजनेताओं के लिए शैक्षणिक योग्यता जरूरी क्यों न बनाई जाए? जब देश आजाद हुआ था, संविधान का निर्माण हो रहा था, तब की हालत समझी जा सकती है, कि ऐसे प्रावधान करना एक बड़े तबके को चुनावी राजनीति से दूर कर देना था।

लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी आज हम उसी स्थिति में हैं तो शायद इसलिए कि राजनेताओं के लिए शैक्षणिक योग्यता जरूरी नहीं थी, तो उन्होंने पूरे देश के लिए शैक्षणिक योग्यता को अहमियत देनी बंद कर दी। सत्तर साल की पूर्ववर्ती और अभी बारह साल वाली सरकारों का हासिल है कि बिहार में मुख्यमंत्री के पद की शैक्षणिक योग्यता स्कूली स्तर तक की भी नहीं रही।

आम तौर पर देखा जाता है कि जहां भी जान-माल की सुरक्षा का सवाल होता है, वहां शिक्षा को अनिवार्य किया जाता है। यहां तक कि सड़क पर व्यावसायिक वाहन चालकों के लिए भी आठवीं से लेकर बारहवीं तक के शैक्षणिक प्रमाणपत्र से लेकर शारीरिक योग्यता के प्रमाणपत्र की दरकार होती है। इसके पीछे का तर्क यही है कि सड़क पर निकले वाहन चालक को साइन बोर्ड से लेकर अन्य निर्देशों को पढ़ना व समझना आना चाहिए।

उन्हें दस्तावेजों की समझ होनी चाहिए। स्कूल प्रशासन तक बारहवीं पास वाहन चालकों को ही रखते हैं, क्योंकि यह बच्चों की सुरक्षा का मामला है। जब एक वाहन चालक की शैक्षणिक योग्यता को आम लोगों की सुरक्षा के लिए इतना अहम माना जाता है तो फिर देश के लोगों के लिए नीति निर्माण करनेवाले राजनेताओं की शून्य शैक्षणिक योग्यता पर भी हम समझौता क्यों कर लेते हैं?

अति पिछड़े इलाके के लोगों के बारे में समझा जा सकता है कि जहां स्कूल ही नहीं पहुंचे, वहां शिक्षिति कैसे होंगे। लेकिन एक व्यक्ति जो राजनीतिक परिवारवाद का भी प्रतीक है, उसने सामान्य स्कूली शिक्षा क्यों पूरी नहीं की?

एक समय ऐसा था जब हम ‘दूरदर्शन’ पर प्रौढ़ शिक्षा अभियान का सबसे ज्यादा विज्ञापन देखते थे। जब पूरे देश के बच्चों तक ही स्कूली शिक्षा पहुंचाना मुश्किल लक्ष्य था, तब सरकारों ने प्रौढ़ शिक्षा के लिए संसाधन क्यों झोंके? क्योंकि शिक्षा ही बेहतर नागरिक बनाती है। बेहतर नागरिक ही देश को हर तरफ के विकास में आगे ला सकता है।

जिस देश ने आम नागरिकों तक की प्रौढ़ शिक्षा के बारे में सोचा, वह आज राजनेताओं की शैक्षणिक योग्यता पर क्यों चुप है? 2025 में हुए विधानसभा चुनाव के वक्त विपक्षी दल जनसुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का पूरा अभियान ही सम्राट चौधरी पर जाकर टिक गया था। प्रशांत किशोर ने तेजस्वी यादव से लेकर सम्राट चौधरी की शैक्षणिक योग्यता पर कड़े हमले किए।

उनके राजनीतिक अभियान को देख कर लगा था कि राजग जीते या हारे, लेकिन चुनाव के बाद सम्राट चौधरी की साख थोड़ी कम हो जाएगी। लेकिन उसी वक्त सत्ता पक्ष ने सम्राट चौधरी को ‘बड़ा आदमी’ बनाने का एलान कर दिया। अब सत्ता पक्ष ने साबित कर दिया कि ‘बड़ा आदमी’ बनने के लिए शिक्षा की कोई जरूरत नहीं होती है।

बिहार में ‘बड़ा आदमी’ की योग्यता के बरक्स सत्तर के दशक में चलते हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने कुछ ऐसा किया था कि उस वक्त दसवीं पास कुछ खास विद्यार्थियों को ‘कर्पूरी डिवीजन’ नाम दे दिया था। सत्तर के दशक में बहुत सारे विद्यार्थी अंग्रेजी में फेल हो जाने के कारण पूरी परीक्षा में फेल हो जाते थे। ग्रामीण व वंचित तबके के छात्रों को राहत देने के लिए कर्पूरी सरकार ने नई व्यवस्था बनाई। जिन छात्रों के कुल अंक पास होने लायक हों, लेकिन वे अंग्रेजी विषय में फेल हो भी जाएं तो उन्हें फेल घोषित नहीं किया जाता था।

शिक्षा में समान अवसर बढ़ाने के लिए ऐसा जरूरी समझा गया था, लेकिन तत्कालीन समय में इसे शिक्षा की गुणवत्ता के खिलाफ समझा गया। उस वक्त लोगों ने कहा कि बिना अंग्रेजी जाने पास करना छात्रों की कुल क्षमता को कमजोर कर सकता है। आगे चल कर कालेज, नौकरी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी की कमी इन विद्यार्थियों को पीछे कर देगी।

आगे जाने के बाद ये पीछे हो जाएं, इससे बेहतर है कि बुनियाद मजबूत हो। वंचित तबकों को भी अहसास हो गया था कि बिना अंग्रेजी जाने उनके बच्चों का भला नहीं होने वाला है, इसलिए धीरे-धीरे यह व्यवस्था समाप्त हो गई। सत्तर के दशक में जिस बिहार की कथित रूप से कमजोर आबादी ने भी अंग्रेजी के साथ ही दसवीं करने का हौसला दिखाया था, जो बीमारू, पिछड़ा होकर भी ज्ञान की धरती के नाम पर गर्व करता था, आज उसकी अगुआई के लिए एक ऐसे व्यक्ति को चुना गया है, जो सत्तर के दशक के ‘कर्पूरी डिविजन’ की अहर्ता भी नहीं रखते हैं।

‘बड़ा आदमी’ की डिग्री देनेवाले राजनीतिक विश्वविद्यालय से अपील है कि आपने स्कूली शिक्षा तक को मान्य नहीं माना है तो कम से कम पद की गरिमा देखते हुए इन ‘बड़े आदमियों’ के लिए कोई प्रौढ़ शिक्षा अभियान ही शुरू कर दीजिए। चुनावी हलफनामों में हम देखते हैं कि पांच से दस साल के अंदर किसी नेता की धन-संपत्ति कई गुना बढ़ जाती है। तो क्या राजनीति में आने के बाद शैक्षणिक स्तर को नहीं बढ़ाया जा सकता?

एक-दो अपवादों को छोड़ कर क्या कभी हमने सुना कि चुनाव जीतने के बाद फलां नेता ने फलां कोर्स में दाखिला लिया या दूरस्थ केंद्र से अध्ययन कर फलां डिग्री हासिल की? क्या चुनावी हलफनामे की तुलना ऐसे हो सकती है कि पिछले चुनाव तक ये सातवीं पास थे तो अब दसवीं पास हैं। बिहार में एक युग के बाद भाजपा ने बिहार में जिस तरह से ‘बड़ा आदमी डिवीजन’ का आगाज किया है, वह सत्तर के दशक से भी पीछे का है।