ईरान और अमेरिका-इजराइल युद्ध का अंजाम चाहे जो हो, लेकिन पूरी दुनिया फिलहाल चिंता में डूबी है। इस समय भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर गहन मंथन करने की जरूरत है। एक दीर्घकालीन रणनीति की तत्काल आवश्यकता है। हमें अपने प्रतिद्वंद्वी चीन से भी सीख लेनी होगी। भले ही दुनिया इस युद्ध की विभीषिका से प्रभावित है और तेल तथा गैस का संकट धीरे-धीरे गहराता जा रहा है। मगर चीन निश्चिंत है। पड़ोसी देश की इस निश्चिंतता के पीछे उसका बड़ा फायदा भी छिपा हुआ है। यदि यह युद्ध और लंबा खिंचता गया, तो भारत सहित दुनिया के कई देशों में स्थिति बिगड़ सकती है। इस युद्ध को हम भारत के भविष्य से जोड़ कर देखें, तो हमें काफी पहले ही सचेत हो जाना चाहिए था।
जो स्थितियां अभी बन चुकी हैं, वह कोई अच्छी नहीं है। जितना लंबा युद्ध खिंचेगा, मुश्किलें उतनी ही बढ़ेंगी। पहले यह समझना होगा कि हम कहां हैं? फिर यह जानना चाहिए कि चीन कहां हैं। कोई दोराय नहीं कि हमें अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर रणनीति बनाने के लिए अब गंभीरता से विचार करना होगा। इस पर राष्ट्रव्यापी समर्थन और सुझावों की आवश्यकता है। इससे भी ज्यादा इस विषय पर राजनीति से इतर राष्ट्रनीति को आगे कर सबको एकजुट होने की जरूरत है। भू-राजनीति का सहारा लेकर हमें एक दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा नीति बनानी होगी, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। हालांकि अर्थव्यवस्था तभी सुदृढ़ हो सकती है, जब हमारी ऊर्जा नीति दूरदर्शी सोच वाली हो। भारत की जनसंख्या लगभग चीन के बराबर है। मगर दोनों के बीच आर्थिक असमानता साफ दिखती है। ऐसे में चीन के बराबर या उससे भी लंबी लकीर खींचने की जरूरत है। इसी सोच के साथ हमें आगे बढ़ना होगा।
अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध ने हमें क्या सबक दिया है? यह समझना होगा। चीन, भारत का पड़ोसी है। हम उससे कई मामलों में पीछे क्यों हैं, इन सभी स्थितियों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। तेल-गैस आपूर्ति में अस्थिरता ने पूरे विश्व के समक्ष बहुत बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा कर दिया है। अमेरिका की नजर ईरान के तेल-गैस भंडार पर है। सर्वविदित है कि तेल दुनिया की अर्थव्यवस्था की धुरी है। भौगोलिक दृष्टि से ईरान और उसके करीबी तेल उत्पादक देशों में अनाज नहीं उपजता। तेल-गैस के बदले उन्हें खाद्य सामग्रियों पर निर्भर रहना पड़ता है। उनके पास तेल के अकूत भंडार हैं। इसलिए वे इतने समृद्ध हैं कि उन्हें किसी भी तरह की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता। अमेरिका की आंखों में उनकी यही समृद्धि खटक रही है।
लगातार चल रहे युद्ध से स्थिति बिगड़ने लगी है। इसके पीछे आपूर्ति शृंखला का टूटना है। भारत को ही लें, तो खाड़ी देशों से चला कच्चा तेल, लगभग 27 दिनों के बाद बंदरगाह पहुंचता है। उसके बाद तेल शोधक कारखानों में जाता है। फिर वहां से तेल शोधित होकर डिपो और फिर पेट्रोल-पंपों तक पहुंचता है। इस पूरे चक्र में लगभग एक महीना लग जाता है। ऐसी स्थिति में आपूर्ति चक्र अगर ज्यादा बाधित हो गया, तो संकट आना तय है। मान भी लिया जाए कि युद्ध कुछ दिनों में समाप्त हो जाएगा, तो भी आपूर्ति की निरंतरता में कम से कम 25-30 या ज्यादा दिन लग जाएंगे। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच युद्ध से भारत का कोई लेना-देना नहीं, तो भी ऊर्जा संकट से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत में सबसे बड़ा संकट गैस आपूर्ति को लेकर है। प्रतिदिन महानगरों से लेकर कस्बों तक लोग रसोई गैस के लिए परेशान नजर आ रहे हैं।
दूसरी ओर, जहां हम अपने उपयोग की चालीस फीसद रसोई गैस का उत्पादन कर पाते हैं, वहीं हम साठ फीसद गैस के लिए ब्राजील सहित करीब नौ देशों पर निर्भर रहते हैं। इधर, देश में रसोई गैस उपभोक्ताओं की संख्या में भी अच्छी खासी वृद्धि हुई है। पहले चौदह करोड़ उपभोक्ता थे, आज करीब तैंतीस करोड़ से भी ज्यादा हैं। इसी तरह भारत में प्रतिदिन 56-57 लाख बैरल तेल की खपत है। जबकि आवक 52 लाख बैरल प्रतिदिन है। उसमें भी 93 फीसद तेल विदेशी जहाजों से आयात होता है, जिसका हमें भारी परिवहन व्यय भी उठाना पड़ता है। हालांकि, भारत ने रूस में अठारह बिलियन डालर निवेश कर तेल के कुएं खरीद रखे हैं। अभी थोड़ा बहुत तेल रूस से आ रहा है, लेकिन यह बेहद कम है। अमेरिका इसमें भी दखल देता रहा है।
इस दृष्टि से देखें, तो हमें अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा नीति पर गंभीरता से सोचना होगा। भारत सामान्य स्थिति में अलग-अलग देशों से तेल और गैस खरीदता है, लेकिन हमारे पास अपने तेल टैंकर बहुत कम है। यही हमारी रणनीतिक चूक है। पिछले दस वर्षों में जरूर हमने इस दिशा में थोड़ा काम किया है। मगर अभी हम केवल अपनी जरूरत का सात फीसद तेल अपने टैंकरों से ला पाते हैं। शेष 93 फीसद के लिए हमारी विदेशी जहाजों पर निर्भरता है। तेल के खेल में भी अर्थशास्त्र छिपा है। इसे समझना होगा और उसी के अनुसार हमें अपनी ऊर्जा नीति बनानी होगी। यदि आज हम कोई योजना बनाएंगे, तो तमाम तकनीकी और दूसरी बाधाओं को पार करते हुए तेल भंडार का पता लगाने में कम से कम नौ साल लग जाएंगे। वहीं भंडारों से तेल निकालने में कम से कम बारह वर्ष लगेंगे। अभी हमारे पास तेल जरूर है, लेकिन उनकी क्षमता केवल पच्चीस दिनों की है। अभी जो आपूर्ति रुकी है, उससे यह क्रम टूट रहा है। निश्चित रूप से इसका असर हमारे भंडारों पर भी पड़ रहा है।
आम तौर पर हम चालीस दिन का भंडार रखते हैं। वहीं हमें यह भी समझना होगा कि हमारा पड़ोसी चीन सामान्य परिस्थितियों में रोजाना दस लाख बैरल तेल जमा करता है। इस स्थिति में तेल के लिए हमें वैश्विक बाजार तलाशना होगा। अपने टैंकर बढ़ाने होंगे, ताकि परिवहन लागत घटे। चूंकि हम दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं, इसलिए यह भी सोचना होगा कि हमारे मामले में किसी भी देश का दखल न हो। इसके लिए एक स्पष्ट राष्ट्रीय ऊर्जा नीति जरूरी है। इसको लेकर पक्ष-विपक्ष देशहित में एक हों और एक ऐसी सर्वदलीय सोच बने, जिसमें राष्ट्रहित का पूरा ध्यान रखा जाए। जो नई ऊर्जा नीति बने, उसमें सभी की भागीदारी हो और उनमें ‘देश प्रथम’ की भावना हो। युद्ध तो होते रहेंगे, ये न कभी रुके थे और न रुकेंगे।
मौजूदा युद्ध रुकने के बाद हमें दुनिया भर में तेल भंडार खरीदने की योजना बनानी होगी। भारत एक ऐसा देश है, जो समुद्र से जुड़ी गतिविधियों, भूगोल और अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक निर्भर है। ऐसे राष्ट्रों की पहचान उनकी लंबी तटरेखा, बंदरगाहों, विशाल व्यापारिक बेड़े और मजबूत नौसेना से होती है। ऐसे में हम हर तरह से सक्षम जरूर हैं, लेकिन तेल-गैस और टैंकरों के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोपरि बनाना होगा। तभी चीन, अमेरिका और ब्राजील की तरह इस दिशा में हम भी आत्मनिर्भर होंगे और ऊर्जा चुनौतियों से जूझ सकेंगे। कम से कम हमारे पास इतना भंडार हो और खुद की परिवहन क्षमता हो कि युद्ध की स्थिति में भी कम से कम तीन-चार महीने का तेल और गैस रहे।
