यह सच है कि सफल आर्थिक नीतियों का सबसे बड़ा आधार उनकी वैश्विक दूरदर्शिता और लंबे अरसे तक घरेलू बाजार में उनका स्थायित्व होता है। भारत इसी पक्ष पर पिछले कई दशकों से सभी को आश्चर्यचकित करता रहा है और इसी कारण आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था का तमगा भी हासिल कर चुका है। दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और वैश्विक संस्थान भारत की तेजी से बढ़ रही आर्थिक विकास दर से खासे प्रभावित हैं। साथ ही देश के घरेलू बाजार की क्रय क्षमता सभी बड़े वैश्विक उत्पादों और सेवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई है।

मगर सवाल है कि इन सबके बीच क्या देश की आर्थिक नीतियां एक ऐसे भ्रम से ग्रस्त हो गई हैं कि वे वैश्विक उथल-पुथल के पूर्वानुमानों को सही ढंग से समझ नहीं पा रही हैं? और समाज के उस तबके पर पड़ रहे आर्थिक दबाव को भी खत्म नहीं कर पा रही हैं, जो कि आर्थिक विकास की मुख्य धारा से अब तक छिटका हुआ है। देश की आर्थिक नीतियों में उसका पक्ष क्यों नहीं नजर आता है, जिसे ‘असंगठित क्षेत्र’ कहा जाता है, जबकि इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को किसी भी आर्थिक संकट से सबसे पहले सुरक्षित किया जाना चाहिए।

संकट की मार

आज जब भारत जीडीपी की रफ्तार में चार ट्रिलियन के मुकाम पर खड़ा है और तेजी से आगे बढ़ने का सपना देख रहा है, ऐसे में समाज का असंगठित क्षेत्र ही आर्थिक विषमता के संकट से सबसे ज्यादा त्रस्त नजर आता है और उसकी लगातार अनदेखी हो रही है। इसका कारण शायद यही है कि आर्थिक नीतियां तेजी से बढ़ रहे विकास के भ्रम में उलझ गई हैं।

सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि देश में वित्तीय वर्ष 2021-22 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार करीब 44 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों के रूप में कार्यरत थे। इनमें कृषि क्षेत्र, निर्माण और छोटे उद्योगों के श्रमिक तथा निजी प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, सड़क किनारे भोजन सामग्री बेचने वाले आदि सम्मिलित हैं। कोरोनाकाल में पूर्णबंदी का सबसे अधिक असर भी इसी वर्ग पर हुआ था।

वर्ष 2026 की शुरुआत वैश्विक स्तर की कुछ घटनाओं के कारण देश के असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए काफी चिंताजनक रही। मसलन, एक जनवरी, 2026 से जब चीन ने अपने यहां चांदी के निर्यात को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया, तो उससे भारत के घरेलू बाजार में चांदी के मूल्य अप्रत्याशित रूप से इतने बढ़ गए, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

देश के घरेलू बाजार में चांदी की खपत एकाएक कम हुई, तो उसके दुष्प्रभाव भी इसी असंगठित क्षेत्र पर सबसे ज्यादा दिखे। यह बहुत साधारण विश्लेषण है कि जब चांदी की पाजेब पांच से दस हजार रुपए के मूल्य से चार गुना महंगी हो जाएगी, तो उसे आम आदमी क्यों खरीदेगा? फिर इससे चांदी के व्यापार में श्रमिकों का रोजगार कैसे बना रहेगा? यह सब भले ही वैश्विक संकट की उपज थी, मगर देश की आर्थिक नीतियों में कोई भी दूरदर्शिता इस असंगठित क्षेत्र के कामकाजी श्रमिकों के पक्ष में नहीं दिखी।

कतार और इंतजार

कुछ इसी तरह की स्थिति वर्तमान में भी बनी हुई है, जब ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध के कारण रसोई गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई, तो इसकी सबसे अधिक मार असंगठित क्षेत्र से जुड़े लोगों पर ही पड़ रही है। उन्हें घरों में भोजन बनाने के लिए लंबी कतारों में खड़े होकर गैस सिलेंडर का इंतजार करना पड़ रहा है।

दूसरा, इस मार का आर्थिक दबाव भी उन्हीं पर पड़ रहा है, जो किसी को नहीं दिख रहा है। आंकड़ों के हिसाब से बड़े शहरों, राजधानियों और महानगरों की तंग गलियों में स्थापित छोटे भोजनालयों से लेकर कारखानों तक में एलपीजी की आपूर्ति में हुई कमी के कारण इसका असर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की आजीविका पर भी पड़ने लगा है।

इसके अलावा यह पक्ष भी इस संकट की तस्वीर में नहीं दिख रहा है कि एलपीजी की किल्लत से भोजन व्यवसाय महंगा हो गया है और इसका आर्थिक दबाव सड़कों पर चलने वाले टैक्सी चालकों से लेकर ऐसे व्यक्तियों पर बहुत अधिक पड़ रहा है, जो दिन में एक दफा भोजन करके घर से बाहर रहते हैं।

इसी तरह कारखानों में कार्यरत श्रमिक न्यूनतम मूल्य पर कैंटीन में ही भोजन कर लिया करते थे, मगर अब यह भी बंद होने लगा है, क्योंकि कैंटीन में व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की कमी हो गई है।

भ्रम का असर

आर्थिक नीतियों में भ्रम का असर भारत के पूंजी बाजारों के प्रदर्शन पर भी देखने को मिला है। एक रपट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर तेजी से उभरने वाली अर्थव्यवस्थाओं के शेयर बाजारों में एक जनवरी, 2025 से फरवरी, 2026 के दौरान करीब पचास फीसद से अधिक का ‘रिटर्न’ देखा गया है और ब्राजील में तो यह आंकड़ा अस्सी फीसद था।

वहीं भारत के पूंजी बाजार में इसी अवधि के दौरान ‘रिटर्न’ एक फीसद के लगभग नकारात्मक रहा है। पूरे विश्व में सऊदी अरब के बाद भारत सबसे खराब प्रदर्शन वाला पूंजी बाजार रहा। कारण, भारत के शेयर बाजार की कंपनियों में आर्थिक निवेश बहुत महंगे हैं या वे वर्तमान में बहुत अधिक मूल्य पर मूल्यांकित हैं।

इस पक्ष पर क्या ये सोचना गलत है कि भारतीय आर्थिक नीतियां इस भ्रम में थीं कि देश तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है और यहां का घरेलू बाजार विश्व में सबसे अधिक क्रय क्षमता रखता है, जिसके चलते विदेशी निवेश भारतीय बाजारों में आएगा ही।

शायद इसी भ्रम की वजह से भारत विश्व का एकमात्र देश था, जिसने विदेशी पूंजी निवेश पर दीर्घकालिक पूंजीगत कर भी लगाया। मगर आज परिणाम बिल्कुल विपरीत हो गया है। इस सब में भी आर्थिक रूप से सबसे अधिक प्रभावित एक आम आदमी ही हुआ है, जो अपने निवेश को एसआइपी के माध्यम से पूंजी बाजारों को सौंप रहा है।

महंगाई की रफ्तार

पिछले कुछ समय से आर्थिक निवेश का प्रवाह म्युचुअल फंड के अंतर्गत बहुत अधिक प्रचलन में है। और यकीनन छोटे निजी क्षेत्रों में और असंगठित क्षेत्रों से जुड़े वे लोग जिनकी कमाई बहुत अधिक नहीं है, वे भी बड़े स्तर पर अपनी बचत को आकर्षक वापसी की चाहत में एसआइपी में निवेश कर रहे हैं।

उन पर भी इन्हीं आर्थिक वैश्विक उठापटक की मार पूंजी बाजार में देखने को मिली है। इसके अलावा ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध के चलते कच्चे तेल के मूल्यों में बढ़ोतरी और डालर के मुकाबले कमजोर होते रुपए की वजह से घरेलू बाजार में वस्तुओं के दाम बढ़ते जा रहे हैं।

अब सवाल है कि आर्थिक नीतियों के किस पक्ष से कोई राहत देने की कोशिश की जाएगी? क्या पिछले वर्ष दिवाली से पूर्व जीएसटी दरों में की गई कटौती का समय सही था? उस दौरान के बजाय अगर वर्तमान समय में कच्चे तेल के मूल्य में हुई बढ़ोतरी के कारण वस्तुओं के दाम बढ़ने से होने वाली महंगाई को नियंत्रण में करने के लिए जीएसटी दरों को तर्कसंगत बनाने के उपाय किए जाते, तो वे अपनी सार्थकता को सही ढंग से साबित कर पाते। अब तो वह विकल्प भी उपलब्ध नहीं होगा।