अक्सर हम देखते हैं कि शिशु या अबोध बच्चे दिन या रात में सोते हुए, अचानक जागते हैं, वह भी रोते हुए तथा मां या पिता को पुकारते हुए। शायद वे कोई दुस्वप्न या बुरा सपना देख लेते हैं, लेकिन मां या पिता द्वारा सीने से लगा लेने या माथे पर, पीठ पर हल्की-सी थपकी देने के बाद वे फिर से निश्चिंत होकर सो भी जाते हैं। कई बार हम बच्चों को सोते हुए मुस्कुराते देखते हैं। अब बच्चे अच्छा या बुरा, क्या स्वप्न देखते हैं, यह वे बता तो पाते नहीं, लेकिन सिर्फ बच्चों की ही क्या बात की जाए। अच्छे-अच्छे वीर-बहादुर भी रात में सोते हुए कई बार कोई बुरा सपना देख कर मध्य रात्रि जाग उठते हैं, तब वे पसीने से नहाए हुए होते हैं।

ये सपने आखिर होते क्या हैं? कहा जा सकता है कि सपने या स्वप्न का मतलब रात सोते हुए देखे गए कुछ दृश्य, तस्वीरें या घटनाएं होती हैं, जो हमारा अवचेतन मन सोते समय देखता है। सामान्यतया हम दिन में जिस विषय पर ज्यादा बातें करते हैं या सोचते हैं, उसी से संबंधित बातें या चीजें हमें स्वप्न के रूप में दिखती हैं। यों हरेक उम्र के सपने भी अलग-अलग होते हैं, या कहा जाए कि व्यक्तिगत रुचि के अनुसार भी सपने अलग-अलग दिखते हैं।

बचपन में नई साइकिल या खिलौने मिलने के सपने दिखते हैं, तो स्कूली दिनों में कई बार परीक्षा में फेल हो जाने के सपने भी दिखते हैं। कई छात्रों को अक्सर एक-सा सपना दिखता है या डराता है कि वे परीक्षा के लिए देर से पहुंचे हैं या स्कूल बस उनके सामने से निकल गई और वे परीक्षा के लिए समय पर पहुंच नहीं पा रहे हैं। युवावस्था में कुछ लोगों को सिनेमा के मशहूर अभिनेताओं के या महंगी बाइक या कार आदि के सपने दिखते हैं, तो कुछ युवा सपने में खुद को अच्छी नौकरी या अधिकार वाला पद ग्रहण करते हुए देखते हैं। इसी प्रकार नेताओं को चुनाव जीतने के तो अभिनेताओं को फिल्म के सुपरहिट होने के सपने दिखते होंगे।

जब हम सपनों की बात करते हैं तो यह विचार भी मन में आता है कि क्या सपनों का भी कोई वैज्ञानिक आधार होता है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि अब तक के शोध कार्यों से ऐसा कुछ सिद्ध या साबित नहीं हो सका है, लेकिन सपनों पर अध्ययन अब भी किया जा रहा है, जिसे ‘वनिरोलाजी’ कहा जाता है। वैसे वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में पाया है कि जब हम सपना देखते हैं, तब हमारा दिमाग या मस्तिष्क उतना ही सक्रिय होता है, जितना जागते वक्त सक्रिय रहता है। मगर हमारे मस्तिष्क का तर्क और तर्क करने वाला हिस्सा कुछ कम ही सक्रिय होता है। इसीलिए सपनों में अक्सर अजीब और अतार्किक चीजें देखने को मिलती हैं।

सपने को लेकर कई कहावतें और मुहावरे भी प्रायः सुनने को मिलते हैं। मसलन, ‘सपना पूरा होना’, जिसका मतलब मनचाहा काम या इच्छा के पूरे होने से लगाया जाता है। इसी प्रकार अक्सर हम किसी के बारे में कहते भी हैं कि वह तो सपनों में ही जीता है, यानी काल्पनिक बातों में या कल्पनाओं में ही खोया रहता है। इसी संदर्भ में लोक के बीच सुनी-सुनाई जाने वाली एक कहानी का उल्लेख किया जा सकता है। किसी गांव में एक ख्यालीराज रहता था जो दिन भर स्वप्नरंजन में लगा रहता था, या कहें कि सपनों में ही जीता था। एक दोपहर वह अपने घर के सामने स्टूल पर एक छड़ी लेकर ऊंघते हुए बैठा हुआ था कि सामने रास्ते से जा रहे अंडों के एक विक्रेता को धूप में कुछ मूर्छा-सी आने लगी। ख्यालीराज ने उसे सहारा दे अपने स्टूल पर बिठाया और घर में से ठंडा पानी लाकर पिलाया। कुछ ही देर में वह व्यक्ति अच्छा महसूस करने लगा तथा वहां से निकलते हुए उसने धन्यवाद स्वरूप ख्यालीराज को बारह अंडे एक छोटी टोकरी में डाल कर दे दिए।

अंडे वाला तो चला गया और इधर ख्यालीराज अंडों की टोकरी सामने रख ख्यालों या स्वप्नरंजन में खो गया कि ये अंडे वह घास के पुले में रख देगा, ताकि इनमें से चूजे निकलें। बारह मुर्गियों के हर दिन बारह अंडे मिलने लगेंगे, जिन्हें वह फिर से घास के पुलों में रखता चलेगा और मुर्गियों की संख्या बढ़ाता चलेगा। फिर वह इसका व्यापार शुरू कर देगा और जब इससे बहुत पैसा कमा लेगा, तब वह शादी भी करेगा। उसके बच्चे भी होंगे, लेकिन वह बच्चों को अनुशासन में रखेगा और गलती करने पर छड़ी से उनकी पिटाई भी करेगा। यह सोचते हुए ख्यालीराज ने हवा में अपनी छड़ी फेंकी, जो पास रखी अंडों की टोकरी में जा लगी और सारे अंडे फूट गए। शायद इसीलिए कहा जाता है कि दिवास्वप्न या दिन में सपने नहीं देखने चाहिए।

अच्छे या बुरे सपने देखना हमारे हाथ में तो होता नहीं, लेकिन कुछ विद्वजन कहते हैं कि अच्छे विचार करते रहने से अच्छे सपने दिखते हैं और ऐसे अच्छे सपने देखना अच्छा भी होता है, क्योंकि सपने देखे जाएंगे, तभी उन्हें पूरा करने के बारे में सोचा जाएगा। मगर सबसे अच्छी बात हमारे पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार कही थी कि सपने वे नहीं जो हम सोते वक्त देखते हैं, सपने वे हैं, जो हमें सोने ही न दें।