हमारे अस्तित्व का समस्त ताना-बाना आगमन और प्रस्थान के दो ध्रुवों के बीच झूलता एक स्पंदन है। शून्य से निकलकर शून्य की ओर बढ़ते इन कदमों के बीच जो कुछ घटित हो रहा है, बस वही जीवन की पूर्णता है। जब चेतना इस सत्य को आत्मसात कर लेती है कि यहां कुछ भी मुट्ठी में भींचकर रखने योग्य नहीं है, वहीं से असीमित निर्भयता का जन्म होता है, जहां अभाव भी स्वभाव एवं उत्सव बन जाता है। यह किसी सांसारिक रिक्तता का नाम नहीं, बल्कि मोह के विसर्जन से उपजी एक आंतरिक संपन्नता है।

हम जिस अकिंचनता के साथ इस संसार की देहरी पर कदम रखते हैं, वही निर्भार स्थिति हमारे प्रस्थान का भी शाश्वत सत्य है। मनुष्य का अहंकार उसे संग्रह के लिए प्रेरित करता है, पर आत्मा सदैव विसर्जन में ही शांति पाती है।

अक्सर मनुष्य अपने चारों ओर दीवारों का एक मायाजाल बुनता है। वह ईंटों, पत्थरों और कंक्रीट से एक सुरक्षा कवच तैयार करता है, जिसे वह ‘और’ की संज्ञा देता है। मगर एकांत के क्षणों में यह सत्य उभरकर आता है कि ये घर केवल शरीर को शरण दे सकते हैं, चेतना को नहीं, क्योंकि शरीर तो खुद एक अस्थायी डेरा है।

वीराना बाहर का नहीं, बल्कि अंतर्जगत की मरुभूमि है

वैभव के उत्तुंग शिखरों पर विराजमान रहने वाले लोग भी अक्सर एक भयावह सूनेपन के साये में जीते हैं। यह वीराना बाहर का नहीं, बल्कि अंतर्जगत की मरुभूमि है। जब तक हृदय के भीतर संवेदनाओं का मधुर संगीत नहीं गूंजता, तब तक स्वर्ण-जड़ित प्रासाद भी एक निस्तब्ध मरघट की भांति ही प्रतीत होते हैं।

मनुष्य का वास्तविक निवास वह नहीं, जहां वह शरीर से उपस्थित है, बल्कि वह है जहां उसका मन विश्राम पाता है। बाहर की दुनिया में जिसे हम साम्राज्य विस्तार कहते हैं, वह अक्सर हमारे भीतर की संकीर्णता को ढकने का एक निष्फल प्रयास मात्र होता है। विशाल भवनों की छाया में अक्सर लघु हृदय सिसकते देखे जा सकते हैं।

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इस जगत के रंगमंच पर जिसे ‘धन’ मानकर पूजा जाता है, वह वास्तव में एक अदृश्य बोझ है, जिसे हम सुरक्षा के नाम पर ढोते रहते हैं। स्वर्ण और रजत की चमक केवल उन आंखों को सम्मोहित करती है, जो यथार्थ की ज्योति से अपरिचित हैं। वास्तविक संपदा तो वह है जो हृदय की उर्वर भूमि से उपजती है- वह निस्वार्थ अनुराग, जो किसी सौदेबाजी का मोहताज नहीं।

आत्माओं का विनिमय तो केवल प्रेम की भाषा में संभव है

व्यापार तो केवल वस्तुओं और मुद्राओं का होता है, आत्माओं का विनिमय तो केवल प्रेम की भाषा में संभव है। जहां लाभ और हानि के तराजू पर हर संबंध को तौला जाने लगे, वहां जीवन का नैसर्गिक छंद मौन हो जाता है। अपनी मंजिल केवल भौतिक संचय को मान लेने वाले लोग उस मृगतृष्णा के पीछे अंतहीन दौड़ लगाते हैं, जो कभी तृप्ति का एक घूंट भी प्रदान नहीं करती।

इसके विपरीत, एक जागृत मन के लिए सफलता और विफलता का मूल्य भोर की उस ओस जैसा है, जो सूर्य की पहली रश्मि के स्पर्श के साथ ही शून्य में विलीन हो जाती है। संचय की इस अंधी दौड़ में हम अक्सर उसे खो देते हैं, जिसे पाने के लिए हमने यह सब संजोया था। प्रकृति के खुले विस्तार में बिना किसी कृत्रिम छत या सुरक्षा के जीना, समय के प्रवाह के साथ पूरी तरह एकाकार होना है। जब मनुष्य अपनी सीमाओं का विसर्जन कर देता है, तो यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही उसका अपना आंगन बन जाता है।

मर्यादाओं के तट और भावनाओं के घाट अलग-अलग होकर भी एक ही धारा के दो छोर हैं। एक पक्ष जहां संयम की कठोरता का बोध कराता है, वहीं दूसरा पक्ष समर्पण और कोमलता के माधुर्य का। एक सच्चा पथिक वही है, जो इन दोनों तटों के बीच समभाव से बहना जानता हो। उसके लिए आकाश से गिरती बूंदें कोई विपदा नहीं, बल्कि अस्तित्व का मधुर अभिषेक हैं। वह अपनी असुरक्षा की चरम अवस्था में ही सबसे अधिक अभेद्य अनुभव करता है, क्योंकि उसने ‘स्वयं’ को बचाने की व्याकुलता त्याग दी है। असुरक्षा का भय तभी तक है, जब तक कुछ खोने का डर है। जिसके पास खोने को कुछ शेष नहीं, वह सम्राट है।

समय एक ऐसा निर्मम प्रवाह है जो निरंतर पुराने को मिटाता और नए का सृजन करता चलता है। यहां कुछ भी अचल नहीं है- न हमारी पीड़ा के कांटे और न ही सुखों के पुष्प। लाभ और हानि की चिंता में वे घुलकर रीते होते रहते हैं, जिन्होंने समय को केवल अपनी आयु के खंडों में देखा है। मगर जिसने समय की अखंडता को पहचान लिया है, उसके लिए संसार का हर उतार-चढ़ाव एक क्रीड़ा मात्र है। जैसे पतझड़ के बाद वसंत का आगमन एक शाश्वत चक्र है, वैसे ही अभाव के बाद भाव और मृत्यु के बाद नूतन सृजन की प्रक्रिया चलती रहती है। इस चक्र में वही शांत रह सकता है, जो इसके केंद्र में स्थित है। और वह केंद्र अनासक्ति का बिंदु है।

यह समस्त वैचारिक यात्रा अंतत: हमें एक ऐसे शिखर पर खड़ा कर देती है, जहां से जगत की जटिल गुत्थियां अत्यंत सरल और तुच्छ दिखाई देने लगती हैं। इस धरती पर मनुष्य एक अतिथि के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, और एक विवेकशील अतिथि कभी सराय के सामान से अपना मोह नहीं जोड़ता।

अकिंचन होना दरिद्रता नहीं

मानवीय सार्थकता इस संचय में नहीं कि मुट्ठियों में क्या बंद रहा, बल्कि इसमें है कि प्रस्थान के क्षण कितने सहज और भारमुक्त रहे। जिस क्षण ‘ममत्व’ के संकुचित घेरे टूटते हैं और व्यक्ति समष्टि के भाव में स्थित होता है, उसी क्षण वह वास्तव में चैतन्य होता है। यही वह स्थिति है जहां व्यक्ति भीड़ में रहकर भी अपनी निजता के एकांत में प्रसन्न रहता है और अभावों के बीच रहकर भी अपनी पूर्णता का उत्सव मनाता है। अकिंचन होना दरिद्रता नहीं, बल्कि उस परम वैभव की प्राप्ति है, जहां इच्छाएं शांत हो जाती हैं और केवल कृतज्ञता शेष रह जाती है। यही जीवन का अंतिम सत्य और परम उत्सव है।

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